स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिचय एवं पृष्ठभूमि ५९ २. 'कल्पितकार्यकारणभाव'—'शुद्धाध्वा' (शिव । शक्ति । सदाशिव । ईश्वर । शुद्ध विद्या)—अशुद्धाध्वा' ।। महामाया—कला—पञ्चकंचुक ।—'मल' = आणव । मायीय कार्य मल । पशुपति पशु बन जाता है । आचार्य क्षेमराज कहते हैं— ‘चिदेव भगवती स्वच्छस्वतन्त्ररूपा तत्तदान्तजगदात्मना । स्फुरति इत्येतावतपरमार्थोऽयं कार्यकारणभावः ।। (प्र०हृदयम्) शब्द-सृष्टिवाद [ शक्ति (विमर्श) ] ——————————— [ शिव (प्रकाश) ] प्रकाशांश / विमर्शांश — [ अम्बिका / शान्ता ] — [ परावाक् ] प्रकाशांश / विमर्शांश — [ वामा / इच्छाशक्ति ] — [ पश्यन्ती वाक् ] प्रकाशांश / विमर्शांश — [ ज्येष्ठा / ज्ञानशक्ति ] — [ मध्यमा वाक् ] प्रकाशांश / विमर्शांश — [ रौद्री ] — [ वैखरी वाक् ] जगत् शब्द का विवर्त है—भर्तृहरि ॥ सारांश— (१) अम्बिका + शान्ता → परावाक् । (२) वामा + इच्छा का सामरस्य → पश्यन्ती वाक् । (३) ज्येष्ठा + ज्ञानशक्ति का सामरस्य → मध्यमा वाक् । (४) रौद्री + क्रियाशक्ति का सामरस्य → बैखरी वाक् ।