स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८ स्पन्दकारिका 'स्पन्दशास्त्र में प्रकृति की सहायता के बिना ही परमात्मा = पञ्चकृत्य विधायक है। 'स्पन्दशास्त्र' = 'स्वेच्छया स्वभित्तौ विश्वमुन्मीलयति' = जगत् का कारण चिति शक्ति ॥ यह भी मान्यता है कि—पञ्चभूतों का सात्त्विक अंश -> ज्ञानेन्द्रियाँ । पञ्चभूतों का राजस अंश -> कर्मेन्द्रियाँ । पञ्चभूतों का तामस अंश -> ५ प्राण ॥ 'स्पन्दशास्त्र'—सृष्टि का कारण—'भगवती चिति'—'पराशक्तिः चितिः एव भगवती स्वतन्त्रा अनुत्तरविमर्शमयी शिवभट्टारिका भिन्ना हेतुः कारणम् ॥ (प्र०हृ०) नित्य तत्त्व = (१) 'पुरुष' (चेतन), (२) 'प्रकृति' (जड़) । 'प्रकृतेर्महांस्ततोऽहंकारस्तस्माद्गणश्चषोडशकः । तस्मादपि षोडशकात्पञ्चभ्यः पञ्चभूतानि ॥' अभिमानोऽहंकारस्तस्माद् द्विविधः प्रवर्तते सर्गः । एकादशकश्च गणस्तन्मात्रपञ्चकश्चैव ॥ —सांख्यकारिका पुरुष + प्रकृति का संयोग—सृष्टि | महत्तत्त्व (बुद्धि) | सात्त्विक अहंकारः (११) तामस अहंकार (५) | | १ मन ५ ज्ञानेन्द्रियाँ ५ कर्मेन्द्रियाँ ५ तन्मात्रायें | | | | श्रोत्र त्वक् चक्षु जिह्वा घ्राण शब्द स्पर्श रूप रस गंध तन्मात्रा तन्मात्रा तन्मात्रा तन्मात्रा तन्मात्रा पाणि पाद पायु उपस्थ वाक् ↓ ↓ ↓ ↓ ↓ (गुदा) (लिंग आकाश वायु अग्नि जल पृथ्वी योनि) तत्त्व तत्त्व तत्त्व तत्त्व तत्त्व 'सात्विक एकादशक प्रवर्तते वैकृतादहंकारात् । भेतादेस्तन्मात्रः स तामसस्तैजसादुभयम् ॥ सांख्य का कार्यकारणवाद का सिद्धान्त—'सत्कार्यवाद' 'स्पन्द' एवं 'प्रत्य- भिज्ञा' का कारणकार्यवाद—इन दर्शनों में दो प्रकार का 'कार्यकारणवाद' है—१. 'कल्पित कार्यकारणवाद' २. पारमार्थिक कार्यकारणवाद । १. 'पारमार्थिक कार्यकारणवाद'—'कारण' = परसंवित् । कार्य = अनन्त विश्व वैचित्र्य भगवती चिति (पूर्णांहं विमर्शात्मक तत्त्व) जो कि अनन्तरूपात्मक जगत् के रूप में स्फुरित होती है पारमार्थिक कार्यकारणभाव है ।