स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिचय एवं पृष्ठभूमि ५७ 'जगत' = परमशिव की शक्ति है। शिव की शिवता—इच्छारूपा स्वातंत्र्य शक्ति ही शिव की शिवता है। जो शिवता (शक्ति) है वही शिव है 'शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नं शक्तिमांस्तु महेश्वरः ।।' (तन्त्रा०) 'सृष्टि'—चिदात्मा की आनन्दोच्छलित स्वभाव क्रीड़ा ।। 'विश्व' = विश्वं शिवादिभूम्यन्तनामरूपात्मके' ('दीपिका:' अमृतानन्दनाथ) 'विश्व' = आत्मप्रच्छादन क्रीडा 'आत्मप्रच्छादनक्रीडां कुर्वतो वा कथंचन । मायारूपमितीत्यादि षट्त्रिंशत्तत्त्वरूपताम् ।।' (सोमानन्द—शिवदृष्टि) [६] सृष्टि-विधान जगत् का उपादान—१. 'विवर्त', २. 'परिणाम' । 'विवर्त' = अवस्थान्तरभानं तु विवर्तो रज्जुसर्पवत् । 'परिणाम' = अवस्थान्तीतापत्तिरेकस्य 'परिणामिता' । स्यात्क्षीरं दधिमृदं कुम्भः सुवर्णे कुण्डलं यथा ।। (पञ्चदशी) । 'आरम्भवाद' = आरंभवादिनोऽन्य अन्यस्योसन्तिभूचिरे । तन्तोः पटस्य निष्पत्तेभिन्नौ तन्तु पटौ खलु । आरम्भवादी (वैशेषिक न्याय वाले) कहते हैं कि अन्य (कार्य से सर्वथा भिन्न रहने वाले कारण) सामान्य (अर्थात् कार्य नामक) वस्तु उत्पन्न होती है जो उससे सर्वथा भिन्न होती है। वे कहते हैं कि तन्तु से पट की उत्पत्ति होती है। साँख्य को देखें तो उसकी सृष्टि की प्रक्रिया निम्नांकित है— सांख्य का सिद्धान्त— (पुरुष चेतन) प्रकृति विकृति प्रकृति-विकृति = (तत्त्वों के प्रकार) (जड़) (जड़) (जड़) | ज्ञ अव्यक्त व्यक्त महत्तत्त्व (Primordial Matters) = बुद्धि ↓ ↓ ↓ | शब्द अनुमान प्रत्यक्ष अहंकार → (षोडशक) प्रमाण प्रमाण प्रमाण (१) मन (५) ज्ञानेन्द्रियाँ (५) कर्मेन्द्रियाँ (५) तन्मात्रायें (तदेव हि तन्मात्रं) शब्द स्पर्श रूप रस गंध ↓ ↓ ↓ ↓ ↓ आकाश वायु अग्नि जल पृथ्वी