स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६ स्पन्दकारिका वैष्णव, शैव एवं बौद्ध— १. वै० शैव = शुद्ध जगत् होता है । २. बौद्ध = अनाश्रव धातु शुद्ध जगत् है । (माहायानिक बौद्ध) विश्व = भूमित्रय ┌───────────────┬───────────────┐ अभेदभूमि भेदाभेदभूमि भेदभूमि │ │ │ अहं प्रत्यय (अहमिदम्) (इदमहम्) (अहमस्मि) (‘व्यपदेष्टुमशक्यासौ अकथ्या परमार्थतः ।’—वि०भै०) (न यहाँ शिव, न शक्ति न विश्वामयता और न विश्वोत्तीर्णता—किसी का भी पता नहीं है) यहाँ ‘इदम्’ का सर्वथा अभाव है । परतत्त्व और जगत— ‘यत् पर तत्त्वं तस्मिन् विभाति का षट्त्रिंशदात्म जगत् ।।—(‘परमार्थसार’) औन्मुख्य → इच्छाशक्ति → (परमेश्वर का विश्वचिकीर्षा रूप परामर्श या इच्छात्मक विमर्श)—(शिवदृष्टिवृत्ति) । ‘इच्छाशक्ति’—परमेश्वर की बहिरुल्लिलासयिषा = परमेश्वर के ऐश्वर्य (आनन्द) का चमत्कार या उसका विश्वात्मक भाव से उल्लसित होने की अभिलाषा! इच्छाशक्ति । इच्छाशक्ति का विकसित होकर विश्व रूपी कार्य के प्रकाशन की शक्ति बनने पर उसकी अभिख्या = ‘ज्ञानशक्ति’ ।। ज्ञान प्रक्रिया के दो रूप—१. ‘ज्ञानशक्ति’ ।। ज्ञान प्रक्रिया के दो रूप—१. ज्ञातृरूप । २. ज्ञेयरूप ।। (चिदात्मा ज्ञाता + ज्ञेय रूप । (चिदात्मा ज्ञाता
- ज्ञेय रूपों में अपना अवभासन करता है ।) ज्ञातृ + ज्ञेय दोनों रूपों का अव-भासन करके जो शक्ति ज्ञान कराती है वही ‘ज्ञानशक्ति’ है ।। शिव की इच्छा का अन्तर्मुख स्पन्द = ‘ज्ञानशक्ति’ और शिव का बहिर्मुख स्पन्द = ‘क्रियाशक्ति’ । शिव जिस शक्ति के द्वारा विश्वात्मकभाव से नाना पदार्थों का भेदावभासन करता है उस ‘भासना’ को ही ‘क्रियाशक्ति’ कहते हैं । समस्त विश्वस्फार = क्रियाशक्ति का स्वरूप है । इच्छा—शिव के विमर्श (स्वातंत्र्य) का प्रकाश (स्वरूप परामर्श) ही उसकी चिकीर्षारूपा इच्छा है । परमशिव का शक्ति पचक ┬ ┬ ┬ ┬ ┬ चित् आनन्द इच्छा ज्ञान क्रिया शक्ति शक्ति शक्ति शक्ति शक्ति (प्रकाश = (आनंद अंश चिदंश + प्रकाशांश (प्रकाश+ विमर्श) का चित् अंश) = विमर्श) सामरस्य = परमभाव (शिवभाव) (शक्तिभाव)