स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 64, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिचय एवं पृष्ठभूमि ६३ 'भेदावस्था' की दो दशायें हैं अन्यथा इसे साधना नहीं बंधन की अवस्था कहना अधिक उपपन्न होता ॥ स्वात्मास्था में विश्रान्त योगी की जो भेदावस्था होती है वह उसमें (भेदावस्था में) अभेदभावना का लाभ प्राप्त करता है और भेदमयता की स्थिति में भी योगी अभेद रूपात्मक स्थिति से विभूषित रहते हैं— 'बहिस्तत्तद्व्यवहारपरत्वेऽपि स्वात्ममात्रविश्रान्त्या परं चमत्कारातिशयमनुभवन्ति' १ 'भेदमयत्वेऽपि अभेदरूपतयावस्थान- मिति' । २ भेदमयत्वेऽपि अभेदरूपत्वमिति । ३ — आत्मनः स्वरूप प्रथनमेव मोक्षः (विवेक) । 'बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् । स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमव्ययमश्नुते ॥ (गी०५।२१)४ मुक्ति के उपाय— 'तन्त्रालोक' में मुक्ति के निम्न उपाय बताए गये हैं— (१) अनुपाय, (२) शांभावोपाय, (३) शाक्तोपाय, (४) आणवोपाय । शिवसूत्रों के तीन अध्यायों का नाम भी यही है— 'शांभवोपाय', 'शाक्तोपाय' एवं 'आणवोपाय' ॥ उपाय ┌─────────────┬─────────────┬─────────────┐ अनुपाय शांभावोपाय शाक्तोपाय आणवोपाय (१) 'अनुपाय'— यह मात्र गुरु या भगवान् के अनुग्रह पर ही आश्रित है । इसमें सकृत उपदेश के द्वारा अपनी आत्मा प्रकाशित हो उठती है । इसमें भावनाओं की पुनरावृत्तियाँ आवश्यक नहीं होतीं । सकृद्देशना ही इसका साधना-संसार है क्योंकि एक बार का उपदेश ही साधक को आत्मपरामर्शात्मक स्वरूपोपलब्धि का पर्याय बन जाता है । एक दीपक से दूसरे दीपक का जल उठना ही 'अनुपाय' है । इसे 'आनन्दोपाय' भी कहते हैं । किसी सिद्ध या योगिनी के संदर्शन मात्र से ही संवित्-संक्रमण की घटनायें भी दिखाई पड़ती हैं । ये 'अनुपाय' के उदाहरण हैं । शांभव मार्ग = 'इच्छोपाय', शाक्त समावेश = 'ज्ञानोपाय' एवं 'आणवोपाय' = क्रियोपाय कहलाते हैं— विभुशक्त्यणुसंबंधात् समावेशस्त्रिधा मतः । इच्छा-ज्ञान-क्रिया योगादुत्तरोत्तरसंभृतः ॥ (जयरथ) उत्कृष्टतम, अनुत्तर एवं तीनों उपायों से श्रेष्ठतर ज्ञान आनन्दशक्ति में विश्रान्त हैं— 'ततोऽपि परमं ज्ञानमुपायादिविवर्णितम् । आनन्दशक्तिविश्रान्तमनुत्तरमिहोच्यते' ॥ २४२ ॥ 'अनुपाय'— 'शांभवोपाय' दोनों अभेद के स्तर की साधनायें हैं । बिन्दु— अर्द्ध- चन्द्र-निरोधिनी-नाद-नादान्त-शक्ति-व्यापिनी-समना को अतिक्रान्त करना $\rightarrow$ ऊर्ध्वकुण्ड- लिनी पद की प्राप्ति—(जयरथ—'विवेक' आ०५। श्लोक ५६) । १. जयरथ—विवेक (पृ० ३०६, आ० ५) । २-४. जयरथ—'विवेक' ।