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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

परिचय एवं पृष्ठभूमि ६३ 'भेदावस्था' की दो दशायें हैं अन्यथा इसे साधना नहीं बंधन की अवस्था कहना अधिक उपपन्न होता ॥ स्वात्मास्था में विश्रान्त योगी की जो भेदावस्था होती है वह उसमें (भेदावस्था में) अभेदभावना का लाभ प्राप्त करता है और भेदमयता की स्थिति में भी योगी अभेद रूपात्मक स्थिति से विभूषित रहते हैं— 'बहिस्तत्तद्व्यवहारपरत्वेऽपि स्वात्ममात्रविश्रान्त्या परं चमत्कारातिशयमनुभवन्ति' १ 'भेदमयत्वेऽपि अभेदरूपतयावस्थान- मिति' । २ भेदमयत्वेऽपि अभेदरूपत्वमिति । ३ — आत्मनः स्वरूप प्रथनमेव मोक्षः (विवेक) । 'बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् । स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमव्ययमश्नुते ॥ (गी०५।२१)४ मुक्ति के उपाय— 'तन्त्रालोक' में मुक्ति के निम्न उपाय बताए गये हैं— (१) अनुपाय, (२) शांभावोपाय, (३) शाक्तोपाय, (४) आणवोपाय । शिवसूत्रों के तीन अध्यायों का नाम भी यही है— 'शांभवोपाय', 'शाक्तोपाय' एवं 'आणवोपाय' ॥ उपाय ┌─────────────┬─────────────┬─────────────┐ अनुपाय शांभावोपाय शाक्तोपाय आणवोपाय (१) 'अनुपाय'— यह मात्र गुरु या भगवान् के अनुग्रह पर ही आश्रित है । इसमें सकृत उपदेश के द्वारा अपनी आत्मा प्रकाशित हो उठती है । इसमें भावनाओं की पुनरावृत्तियाँ आवश्यक नहीं होतीं । सकृद्देशना ही इसका साधना-संसार है क्योंकि एक बार का उपदेश ही साधक को आत्मपरामर्शात्मक स्वरूपोपलब्धि का पर्याय बन जाता है । एक दीपक से दूसरे दीपक का जल उठना ही 'अनुपाय' है । इसे 'आनन्दोपाय' भी कहते हैं । किसी सिद्ध या योगिनी के संदर्शन मात्र से ही संवित्-संक्रमण की घटनायें भी दिखाई पड़ती हैं । ये 'अनुपाय' के उदाहरण हैं । शांभव मार्ग = 'इच्छोपाय', शाक्त समावेश = 'ज्ञानोपाय' एवं 'आणवोपाय' = क्रियोपाय कहलाते हैं— विभुशक्त्यणुसंबंधात् समावेशस्त्रिधा मतः । इच्छा-ज्ञान-क्रिया योगादुत्तरोत्तरसंभृतः ॥ (जयरथ) उत्कृष्टतम, अनुत्तर एवं तीनों उपायों से श्रेष्ठतर ज्ञान आनन्दशक्ति में विश्रान्त हैं— 'ततोऽपि परमं ज्ञानमुपायादिविवर्णितम् । आनन्दशक्तिविश्रान्तमनुत्तरमिहोच्यते' ॥ २४२ ॥ 'अनुपाय'— 'शांभवोपाय' दोनों अभेद के स्तर की साधनायें हैं । बिन्दु— अर्द्ध- चन्द्र-निरोधिनी-नाद-नादान्त-शक्ति-व्यापिनी-समना को अतिक्रान्त करना $\rightarrow$ ऊर्ध्वकुण्ड- लिनी पद की प्राप्ति—(जयरथ—'विवेक' आ०५। श्लोक ५६) । १. जयरथ—विवेक (पृ० ३०६, आ० ५) । २-४. जयरथ—'विवेक' ।

६४ स्पन्दकारिका अनुपाय—समावेश विश्रान्त योगी को यह प्रतीत होने लगता है कि यह निखिल समुल्लसित भावमण्डल पूर्णतः संवित्तिरूपी भैरवीभाव के प्रकाश में समाहित हो रहा है।१ 'शांभवोपाय' का चरम रूप ही 'अनुपाय' है— 'साक्षादुपायेन इति शांभवेन । तदेव हि अव्यवहितं परज्ञानावाप्तौ निमित्तं स एव परांकाष्ठां प्राप्तश्चानुपाय इत्युच्यते'' ।। (तन्त्रा० आ० १।१८२) (२) शांभवोपाय— हठपाक क्रम या शांभवोपाय—स्वात्मपरामर्श एवं स्वरूपोपलब्धि के लिए सर्वोत्कृष्ट उपाय शांभवोपाय है जो अभेदात्मक स्तर पर स्थित है। इसमें अभेदभावना का परामर्श आवश्यक है। 'संपूर्ण (प्रमाता-प्रमाण-प्रमेय रूप) जगत् मुझ परबोध शिव से ही उत्पन्न हुआ है। वह अनतिरिक्त होने पर भी अतिरिक्तवत् मुझ में अवस्थित् एवं मुझसे सर्वथा अभिन्न है।'—यही परामर्श 'शांभवोपाय' है— 'मत्त एवोदितमिदं मय्येव प्रतिबिम्बितम् । मदभिन्नमिदं चेति त्रिधोपायः स शांभवः' ।। (तन्त्रालोक आ० ३) अभिनवगुप्त इस शांभव परामर्श को और सुस्पष्ट करते हुए उसका परामर्श इस प्रकार निरूपित करते हैं— मैं अपने आत्मारूपी चिदाकाश में विश्वावभासन कर रहा हूँ अतएव मैं ही विश्व- स्रष्टा हूँ। संपूर्ण 'षडध्व' (वर्ण, पद, मन्त्र, कला तत्त्व, भुवन) मुझमें ही प्रतिबिम्बित है अतः मैं ही स्थिति का सूत्रधार हूँ। यह संसार मुझ महाज्ञानमय अग्नि में लीन होता जा रहा है। ऐसा सततानुसंधान करने से योगी शान्ति प्राप्त कर लेता है। अनन्त वैचित्र्या- त्मक संसार के स्वप्न-गृह को दग्ध करने वाला मैं हुताशन हूँ। यही तुरीय पद एवं शिवत्व प्रदान करता है।२ इसे 'शांभव समावेश' भी कहते हैं। शांभव समावेश में अनन्तः चिन्तन का भी त्याग कर दिया जाता है। यहाँ किसी विकल्प की उपयोगिता नहीं रह जाती। १. तन्त्रालोक (२ अ० ३५) । २. षडध्व जातं निखिलं मय्येव प्रतिबिम्बितम् । स्थितिकर्ताहमस्मीति स्फुटेयं विश्वरूपता ।। सदोदितमहाबोधज्वालाजटिलतात्मनि । विश्वं द्रवति मय्येवदिति पश्यन् प्रशाम्यति ।। अनन्तचित्रसद्दर्भसंसारस्वानसद्मनः ।। पोषकः शिव एवाहमित्युल्लासी हुताशनः । जगतः सर्वमत्त प्रभवति विभेदेन बहुधा ।। तथाप्येतद्रूढं मयि विगलितेत्वत्र न परः । तदित्यं यः सृष्टि-स्थिति-विलयमेकीकृतवशा- दनंशं पश्येत्स स्फुरति हि तुरीयं पदमिति ।।—तन्त्रालोक (आ० ३, २८३-२८७)

परिचय एवं पृष्ठभूमि ६५ गुरुप्रदत्त ज्ञान द्वारा विकल्प विगलित हो जाते हैं। इस अनुत्पन्नावस्था में भावना आदि की अपेक्षा न रखने वाली अविकल्परूपा संवित् शिव के साथ तादात्म्य स्थापित करने वाली अवस्था का उदय होता है। इसका साधन ही है— 'शांभवोपाय'। १. अकिंचिच्चिन्तकस्यैव गुरुणा प्रतिबोधतः । उत्पद्यते य आवेशः शांभवोऽसावुदीरितः ॥ (तन्त्रा० आ० १ । १६८) २. अकिञ्चिन्तकस्येति विकल्पानुपयोगिता । तथा च झटिति ज्ञेयसमापत्तिर्निरूप्यते ॥ (१७१) ३. तेनाविकल्पा संवित्तिर्भावनाद्यनपेक्षिणी । शिवतादात्म्यमापन्ना समावेशोऽत्र शांभवः ॥ (१७८)¹ समावेशों की संख्या ┌────────────────────────┴────────────────────────┐ ३ (शांभव । शाक्त । आणव) ५० भेद—'श्रीपूर्वशास्त्र' ┌──────┬──────┬──────┬──────┬──────┴──────┐ भूत तत्त्व आत्मा मन्त्र शक्ति (५ रुद्रशक्ति ५ ३० ३ १० २ समावेश) भेद भेद भेद भेद भेद = ५० भेद । (३) शाक्तोपाय— 'तन्त्रालोक' (आ० १ । २२०) 'भेदाभेदौ हि शक्तिता': 'शाक्तो- पाय, भेदाभेदात्मक है। इसे ही 'ज्ञानोपाय' भी कहा गया है। 'आत्मैवेदं सर्वं' का चिन्तन करने पर आत्मा और अनात्मा (आत्मा+इदम्) दो विकल्पांशों की विद्यमानता रहती है-'आत्मा ही अनात्मा के रूप से प्रकाशित हो रहा है।'-इस प्रकार पौनःपुन्येन अभ्यास करने पर अभेदपरामर्श प्राप्त होता है। विकल्प निर्विकल्पता में रूपान्तरित हो जाते हैं—यही ज्ञान है। इसीलिए इसे 'ज्ञानोपाय' भी कहते हैं। भूयो भूयो विकल्पांशान्निश्चयक्रमचर्चनात् । यत्परामर्शमभ्येति ज्ञानोपायं तु तद्विदुः ॥ उपायत्रय ┌──────────────────────┬──────────────────────┬──────────────────────┐ 'अभेदोपाय' │ 'भेदाभेदोपाय' │ 'भेदोपाय' │ ── अभेदोपायमन्त्रोक्तं शांभवं शाक्तमुच्यते । (शांभव उपाय) │ (शाक्त उपाय) │ (आणव उपाय) │ ├──────────────────────┼──────────────────────┼──────────────────────┤ 'इच्छोपाय' │ 'ज्ञानोपाय' │ 'क्रियोपाय' │ ── भेदाभेदात्मकोपायं भेदोपायं तदाणवम् ॥ └──────────────────────┴──────────────────────┴──────────────────────┘ —(तन्त्रालोक आ० १) ─────────────────────────────────────────────────────────── १. ज्ञान ┌──────────┼──────────┐ आणव शाक्त शाम्भव स्पं. भू. ४

६६ स्पन्दकारिका 'शाक्तोपाय' क्या है? उच्चाररहितं वस्तु चेतसैव विचिन्तयत् । यः समावेशमाप्नोति शाक्तः सोत्राभिधीयते ॥ 'इच्छोपाय' क्या है? तत्राद्ये स्वपरामर्शैर्निर्विकल्पैकधामनि । यत्स्फुरेत् प्रकटं साक्षात् तदिच्छाख्यं प्रकीर्तितम् ॥ १४६ ॥ 'शांभवोपाय' क्या है? एवं परेच्छाशक्त्यंशसदुपायमिमं विदुः । शांभावाख्यं समावेशं सुमत्यन्ते निवासिनः ॥ २१३ ॥ 'शाक्तोपाय' में बाह्योच्चार, करण, ध्यान, वर्ण एवं स्थान की कल्पना करके इनकी साधना नहीं की जाती । अतः यहाँ अभेदावस्था ही होने से शाक्तोपाय भेदाभेदमय है—(तन्त्रालोक)— 'उच्चाररहितं वस्तु चेतसैव विचिन्तयत् । यः समावेशमाप्नोति शाक्तः सोत्राभिधीयते ॥ (अ०१।१६९) (४) आणवोपाय—'आणवोपाय' यह भेदप्रधान है । 'अणुषु भेदिषूपायेषु भवः आणवः ॥' इसके अनेक साधन हैं— उच्चार ध्यान वर्ण करण स्थान (प्राणायाम एवं मन्त्र जप) इन पाँचों अंगों से समन्वित समावेश का उपाय 'आणवोपाय' कहा जाता है । यही 'क्रियोपाय' भी कहा जाता है । आणवोपाय के साधन एवं उनके उपसाधन१ उच्चार करण ध्यान वर्ण स्थान पञ्चप्राणात्मक चिदात्मक (प्राणात्मक उच्चारण में स्वस्फुरित अनाहत नाद । नाद -> वर्ण) (सृष्टि-संहार बीजात्मक वर्ण) प्राण ५ भेद देह २ भेद बाह्य ११ भेद चित्प्राधान्य विमर्शप्राधान्य ग्राह्य ग्राहक संवित्ति संनिवेश व्याप्ति आक्षेप त्याग १. उच्चारकरणं ध्यानं वर्णस्थानप्रकल्पनैः । यो भवेत् स समावेशः सम्यगाणव उच्यते ॥ —तंत्रालोक आ० १/१७०

परिचय एवं पृष्ठभूमि ६७ ग्राह्य ग्राहक चिद्व्याप्तित्यागाक्षेपवेशनैः । करणं सप्तधा प्राहुरभ्यासं बोधपूर्वकम् ॥ (तन्त्र० आ०५) शाक्तोपाय = ज्ञान-प्राधान्य ॥ आणवोपाय = क्रिया-प्रधान 'ज्ञान' → १. परज्ञान (सूक्ष्म) : (इच्छा शक्तिप्रधान) 'शांभव ज्ञान'—वैकल्पिक स्थूल, 'शाक्त' एवं 'आणव ज्ञान' । मलों की क्षीणता के तारतम्यानुसार ही आत्माओं की भगवद्रूपता होती है । शक्तिपात—१. तीव्र-तीव्र २. तीव्र-मध्य ३. तीव्र-मन्द ४. मध्यतीव्र ५. मध्य- मध्य ६. मध्य-मन्द ७. मन्द-तीव्र ८. मन्द-मध्य ९. मन्द-मन्द ॥ वर्ण— 'उक्तो य एष उच्चारस्तत्र योऽसौ स्फुरन् स्थितः । अव्यक्तानुकृतिप्रायो ध्वनिर्वर्णः स कथ्यते' ॥ (तन्त्रा०आ०५।१३१-१३२) क्रियोपाय → ज्ञानोपाय → इच्छोपाय → अनुपाय' ॥ —उपायत्रय 'तन्त्रालोक' में कहा गया है कि 'अज्ञान' संसृति का कारण एवं 'ज्ञान' मोक्ष का कारण हैं— 'इह तावत्समस्तेषु शास्त्रेषु परिमीयते । अज्ञानं संसृते हेतुर्ज्ञानं मोक्षैककारणम् ॥ (तन्त्रा०१।२२) मलमज्ञानमिच्छन्ति संसारांकुरकारणम् । १ इति प्रोक्तं तथा च श्रीमालिनीविजयोत्तरे ॥ (तन्त्रा०१।२३) आणवमल (अज्ञान) के दो रूप हैं । इसके द्वारा स्वरूप का बोध क्षीण हो जाता है । आणवमल के भेद । २ ┌─────────────────┬─────────────────┐ स्वात्मस्वातंत्र्य का बोध के स्वातंत्र्य की हानि होती है बोध नहीं होता क्योंकि संकोच-प्राधान्य रहता है । 'अज्ञान' का स्वरूप क्या है ? संसारांकुर कारण 'मायीय मल' = जिसमें वेद्य की भिन्नता की प्रतीति प्रमुख होता है । 'कार्ममल' = जिसके द्वारा संसार अंकुरित होता है—ये दोनों संसारांकुर के कारण हैं । कर्म का निमित्त भी 'मल' ही होता है— 'मलं कर्मनिमित्तं तु नैमित्तिकमतः परम्' ॥ अज्ञान के दो रूप हैं—१. पौरुष अज्ञान, २. बौद्ध अज्ञान । ३ यहाँ पौरुष अज्ञान ही विवक्षित है । पौरुष ज्ञान—मोक्ष ॥ बौद्ध अज्ञान = दुष्टाध्यवसायरूप ॥ यह कर्म का कारण नहीं है । यह कर्म ही १. उच्चारणे च प्राणाद्या व्यानान्ताः पंचवृत्तयः । आद्या तु प्राणनाभिख्या परोच्चारात्मिका भवेत् ॥ —तंत्रालोक आ० ४ २-३. तन्त्रालोक ।

६८ स्पन्दकारिका अज्ञान का कारण है। बौद्ध अज्ञान = कर्मोत्पन्न शरीर में होता है शरीर ही संसार है और मायीय हैं शरीरभुवनाकारो मायीयः परिकीर्तित ।। 'सर्वो विकल्पों संसार:' ॥ = 'विकल्प' = संसार है । बौद्ध ज्ञान भी संसार का ही आविर्भावक है । दीक्षा—पौरुष अज्ञान निवृत्त । पौरुष ज्ञान का अधिक महत्त्व है (बौद्ध ज्ञान की अपेक्षा) । दीक्षा में पौरुष पाशों (मलों) का शोधन आवश्यक है । बौद्ध पाशों (मलों) का निराकरण विवेक से होता है ।१ मोक्ष का तो स्वभाव ही ज्ञान है । अख्याति के अभाव को ही पूर्ण ख्याति कहते हैं । प्रकाशानन्दघन आत्मा का तात्विक रूप पूर्ण ख्याति ही है । इसका प्रथन (संस्कार दृढ़ता) ही 'मोक्ष' है । इस अज्ञान के अभाव में ही मोक्ष संभव है । 'तच्च ज्ञान मात्रस्वभावम्' अख्यात्यभाव एव हि पूर्णाख्यातिः, सैव च प्रकाशानन्द घनस्यात्मन- स्तात्विक स्वरूपं तत्प्रथनमेव मोक्ष इति ॥२ १. अज्ञान का अर्थ ज्ञान का अभाव नहीं है । अज्ञान का अर्थ है—अपूर्ण ज्ञान ज्ञानाभाव नहीं— 'अतो ज्ञेयस्य तन्त्रस्य सामस्त्येनाप्रथात्मकम् । ज्ञानमेवं तदज्ञानं शिव-सूत्रेषु भाषितम् (तं०१।२६) । ज्ञेयस्य च परं तत्त्वं यः प्रकाशात्मक शिवः । शिवसूत्र का द्वितीय सूत्र है—'ज्ञानं बंध:' ज्ञाता, ज्ञान एवं ज्ञेय की त्रिपुटी में ही समस्त दर्शनविज्ञान स्थित है ।३ ज्ञेय का परमतत्त्व प्रकाशात्मक शिव ही है । यह द्विविध है— (क) वस्तु, स्थान, नाम आदि द्वैत की प्रथा पर आधृत । (ख) परतत्त्व, चिदानन्दघन परमशिव सर्वत्र समस्तता एवं समरसता से परिपूर्ण परमतत्त्व ।४ द्वितीय तत्त्व की एकान्त सत्ता के विपरीत जब नीले, पीले, सुखदुःख आदि द्वैत प्रथात्मक ज्ञान होते हैं तो ये ज्ञान ही अज्ञान बन जाते हैं, यही अपूर्णज्ञान है, ज्ञान का अभाव नहीं । यही अपूर्ण ज्ञान बंध बन जाता है । यही संसार के अंकुर का कारण है । यही संसृति का हेतु है । यही है शिवसूत्र का कथ्य ।५ 'चैतन्यमात्मा' + 'ज्ञानं बंधः' इसे दो प्रकार से लिखा जा सकता है— १. चैतन्यमात्माज्ञानं बंधः, २. चैतन्यमात्मा । ज्ञानं बंधः ॥ 'त्मा' + 'ज्ञा' के मध्य 'अ' का प्रश्लेष करने पर 'ज्ञानम्' ही 'अज्ञानम्' बन जाता है । अज्ञान का अर्थ है—अपूर्ण ज्ञान + ज्ञान का अर्थ है—द्वैत प्रथात्मक ज्ञान । १-३. विवेक । ४. तन्त्रालोक । ५. विवेक ।

परिचय एवं पृष्ठभूमि ६९ (तन्त्रालोक १।२६-२७) 'ज्ञानमेव तदज्ञानं शिवसूत्रेषु भाषितम् ॥' 'ज्ञानं बंधः अज्ञानं बंधः ।' 'अज्ञानशब्दस्य अपूर्णज्ञानाभिधानलक्षणः' 'द्वैतप्रथा तदज्ञानं तुच्छत्वात् बंध उच्यते' (तन्त्रालोक) ।¹ १. संविद्द्वैतात्मनः पूर्णस्य रूपस्य अख्यानात् 'द्वैतप्रथा' एवं 'अज्ञानम्' ।² २. अपूर्ण ज्ञानमपूर्णत्वाच्च तदेव अपूर्णमन्यता शुभाशुभ वासना शरीर-भुवनाकार स्वभावविविध संकुचितज्ञानरूपतया मलत्रयात्मा 'बंध' इति उच्यते ।³ ३. 'मलं कर्म च मायीय आणवमखिलं च यत् ।'⁴ ४. नन्वत्र द्वैतप्रथात्मकत्वादपूर्ण ज्ञानमेव 'अज्ञानम्' । ५. स्वातंत्र्य के अतिरिक्त तुच्छ एवं अतुच्छ रूप कोई अन्य मोक्ष नहीं है । (क) यदि तुच्छ मोक्ष है तो बंध है ।⁵ (ख) यदि अतुच्छ है तो पारमार्थिक होने के कारण स्वतन्त्रात्मा मोक्ष ही है ।⁶ क) स्वतन्त्रात्मातिरिक्तस्तु तुच्छोऽतुच्छोऽपि कश्चन । न मोक्षो नाम तन्नास्य पृथङ्नामापि गृह्यते ॥ (१।३१) ख) मोक्षो हि नाम नैवान्यः स्वरूप प्रथनं हि सः ।⁷ स्वरूपं चात्मनः संवित् ॥ ग) यत्तु ज्ञेयसतत्त्वस्य पूर्णपूर्णप्रथात्मकम् । यदुत्तरोत्तरं ज्ञानं तत्तत्संसारशान्तिदम् ॥ (१।३२) मोक्ष = स्वरूप प्रथन ॥ आत्मा = संविद्रूप ॥⁸ आत्मा एवं मोक्ष दोनों के एक लक्षण हैं— 'इह तावदात्मज्ञानं मोक्ष' 'यदेवात्मनोलक्षणस्तदेव मोक्षस्य ।' योगाचार— रागादिकलुशं चित्तं संसारस्तद्विमुक्तता । संक्षेपात्कथितो मोक्षः प्रहीनावरणैर्जिनैः ॥⁹ रागादि—कलुषित चित्त = 'संसार' है और उनसे विमुक्ति ही मोक्ष है । चित्त मल का आश्रय है । मल आगन्तुक है । मलों का क्षय—स्वतः प्रभास्वरता ॥ शैव इस मत को नहीं मानते ॥ सांख्य—सुखदुःखों आदि द्वन्द्वों से शून्य पौरुष ज्ञान ही मोक्ष है । अध्वा—बंधन ॥ पूर्णज्ञान—मुक्ति ॥१० 'ज्ञान'—अज्ञान अवच्छेदात्मक है । संकोच प्रवर्धक है । इदन्ता का परामर्श देता है । ज्ञान-अज्ञान के भेद—१. पौरुष ज्ञान, २. बौद्ध ज्ञान, १. पौरुष अज्ञान, २. बौद्ध अज्ञान । पुरुष का अज्ञान = 'मल' । शिव—मल ।¹¹ १-११. तन्त्रालोक—विवेक ।

७० स्पन्दकारिका ‘मल’ = शिवता का आवरक, स्व का चिदात्मक उल्लास का आवरक, शिव के दृक् (ज्ञान) क्रिया शक्तियों को संकुचित करने वाला ।। पशुपति → पशु । शिव के ६ रूप—१. भुवन, २. विग्रह, ३. ज्योति, ४. आकाश, ५. शब्द, ६. मन्त्र । भुवनं विग्रहो ज्योतिः खं शब्दो मन्त्र एव च । बिन्दुनादादिसंभिन्नः षड्विधः शिव उच्यते ॥ (१।६३)१ बिन्दुनादस्तथा व्योम मन्त्रो भुवनविग्रहो । षडवस्वात्मा शिवो ध्येयः फलभेदेन साधकैः ॥ इस शिव का एक ही स्वभावभूत धर्म है—‘अहंप्रत्यवमर्श’ ‘अहंप्रत्यवमर्शाख्यो हि स्वभावभूतो धर्मोऽस्ति ॥’२ ‘स्वातंत्र्यमेतन्मुख्यं तदैश्वर्यं परमात्मनः (प्र०१। अ०५। आ०१३) परमात्मा का स्वातंत्र्य ही उसका मुख्य ऐश्वर्य है । यही उसकी शक्तिमत्ता का द्योतक है । उसकी शक्ति इच्छा है— या सा शक्तिर्जगद्धातुः कथिता समवायिनी । इच्छात्वं तस्य सा देवि सिसृक्षोः प्रतिपद्यते ॥३ परमात्मा की यह शक्ति केवल एक है फिर भी नानारूपावभासित है । पुरुष का अज्ञान = ‘मल’ है । ‘मल’ = शिव से उद्भूत है । यह मल स्व के चिदात्मक उल्लास का अवच्छेदक या आवरक है । आत्मा मलिन कैसे होती है ? (नेत्रतन्त्र)— तत्संबंधात्समलिनो ह्रस्वतन्त्रोऽप्यशक्तिमान् । अविशुद्धो ह्यसौ तस्मान्मलत्रय निरोधतः ॥ १४६ ॥ (नेत्रतन्त्र)४ ‘आणव मल’—चिन्मय के साथ मल योग कैसे ? निर्मलो वा कथं सक्तो भोगेषु एतद्विरुध्यते । शुद्धो भोगी न सिद्धयेत्तु विकल्पो भोग उच्यते ॥ (१४७ नेत्रतन्त्र)५ विकल्पमात्र संसारः पशोः संसरणं सदा । संसार्यस्य च बद्धस्य निर्मलत्वं न युज्यते ॥ (१४८) (ने०तं०) १. पूर्णचिदानन्दघनस्य विशुद्धस्य कथमशुद्धभोगाकांक्षा स्यात् ? २. माया शक्त्या उल्लासित अपूर्णामन्यतात्मकं आणवमलभाज एव ‘किचिन्मे- स्यात्’ इति रागत्वात्मा अभिलाषो घटते । (ने०तं०) ३. शुद्धस्य चिदानन्दघनस्य न सुखदुःखप्रतिपत्यात्मा विकल्प परमार्थो भोगः संस- रणसतत्व उपपद्यते ।

१-३. तन्त्रालोक—विवेक । ४-५. नेत्रतन्त्र ।

परिचय एवं पृष्ठभूमि ७१ 'पशु' कौन है ? यही मलयोग संपृक्त चेतन । 'आणवमल' क्या है? आणवोऽयं मलः सूक्ष्मः कार्यतो ह्युपपद्यते । अभिलाषस्ततः कार्यों भोगादौ स प्रवर्तकः ? (नेत्रतन्त्र १९।१४९)१ 'स्वच्छन्दतन्त्र' में कहा गया है—विशेष-सामान्य विषयालम्बनाभिलाषात्मा, वैराग्यराग तत्त्वलक्षणोऽपूर्णमन्यतात्मा, निष्कर्माभिलाष आणवोमलोऽभिप्रेतः ।। 'कार्म मल' एवं 'मायीय मल'—१. भोगः सुखादिसंवित् कार्यं यस्य तत् कार्मं मलम्, तद्देशकाल शरीरेभ्यः प्राच्येभ्यो हेतुभ्यो भवति । २. कलादिक्षित्यन्तं तु त्रिंशत्तत्वात्म माया कार्यं मायाख्यं मलम्—'उद्योत' ।२ मलावृत होता कौन है? व्यापकःपुरुषः सूक्ष्मो निर्गुणो निष्क्रियोऽचलः । किन्त्वाणवावस्था कार्मो मायीयस्त्रिविधो मलः ।। (नेत्रतन्त्र १।१४७) कार्म यद्योग कार्यं तु देशकालशरीरतः । कलादि यत्पृथिव्यन्तं मायाकार्यं विदुर्बुधाः ।। (ने०तन्त्र १।१५०) एवं मलत्रयोपेतः संसारे संसरेदणुः । कोशकारः कृमिर्यद्वदात्मानं वेष्टयेद्द्दढम् ।। (ने०तं० १।१२१)३ 'कोशकार' क्यों कहा गया ? कोशकारदृष्टान्तेन स्वशक्त्यैव अस्य अणु- भूमिका ग्रहणं न तु व्यतिरिक्तद्रव्यरूपानादिमलशक्तिनिरुद्धत्वम् ।। (उद्योत) ।। पशुत्व रूप बंधन कब तक रहता है ?—अनुग्रह प्राप्ति के पूर्व तक स्वशक्तिगूह-नावभासिताणुभूमिकः परमेश्वरो यावत् न निज शक्ति विकासेन अनुगृह्णाति अणुभूमिं तावत् स्वमायाशक्त्यावगूहनेन गूहतिः पशुस्तिष्ठति ।।४ सारांश—(मालिनीविजयोत्तर तन्त्र के शब्दों में)— १. 'आणव समावेश'— उच्चारकरणध्यानवर्णस्थानप्रकल्पनैः । यो भवेत्स समावेशः सम्यगाणव उच्यते ।। (२ अधि०।२१) २. 'शाक्तसमावेश'— उच्चाररहितं वस्तु चेतसैव विचिन्तयन् । यं समावेशमाप्नोति शाक्तः सोऽत्राभिधीयते ।। (अधि०२।२२) ३. 'शांभव समावेश'— अकिंचिच्चिन्तकस्यैव गुरुणा प्रतिबोधतः । जायते यः समावेशः शांभवोऽसावुदाहृतः ।। (अधि०२।२३)


१. उद्योत । २. नेत्रतन्त्र । ३. नेत्रोद्योत । ४. मालिनीविजयविजयोत्तरतन्त्र ।

७२ स्पन्दकारिका उपायों एवं समावेशों का 'तन्त्रालोक' (३ से १२ आ०) 'तन्त्रसार' (पृ० १०- ११४) 'महार्थमंजरी' (५६-५९) 'परिमल' (पृ० १३८-१५३) 'मालिनीविजयोत्तर तन्त्र' (द्वि० आ० १३-४४) में विवेचन किया गया है । सारांश—'आणव उपाय' : उच्चार, करण, ध्यान, वर्ण, स्थान-कल्पना का अभ्यास । 'आणव समावेश'—किसी एक अभ्यास से प्राप्त होने वाली एकाग्रता ॥ 'अणु' = मितप्रमाता, जीव, सकल । परिमित स्वरूप वाले बुद्धि, प्राण, देह, देश, ध्यान, करण आदि को उपाय के रूप में ग्रहण करने वाले ॥ इसीलिए इसके उपाय की संज्ञा है—'आणव उपाय' ॥ आणवोपाय में—'ध्यान' बुद्धि का व्यापार है । 'प्राण' स्थूल-सूक्ष्म भेद से द्विविध रूप वाला है । 'स्थूल प्राण' का व्यापार = 'उच्चार' प्राणवृत्तियों के रूप में अवस्थित, 'सूक्ष्मप्राण' = 'वर्ण' । 'करण'—शरीर के अंगों को किसी विशेष प्रकार की स्थिति में रखना ॥ 'स्थान-कल्पना' = घट-स्थापन, मण्डल-निर्माण, मन्दिर, मूर्ति, चित्र आदि की रचना आदि विधियों का समावेश ॥ 'ध्यान' = सगुण स्वरूप में चित्त की एकाग्रता । 'उच्चार' = प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान आदि के श्वास-प्रश्वास, छींक (क्षुत्) प्रभृति प्राण-वृत्तियाँ । 'वर्ण'—प्राणोच्चार के साथ स्वाभाविक रूप से उच्चरित 'सकार'-'हकार' ध्वनि = 'वर्ण' ॥ ये सभी वर्णों एवं मन्त्रों के बोधक हैं । 'वर्ण' पीत-अरुण आदि रंगों के भी बोधक ॥ 'करण' के भेद ('तन्त्रालोक' में 'त्रिशिरोभैरव' का उल्लेख करके उद्धृत ७ करण— ग्राह्य ग्राहक संवित्ति संनिवेश व्याप्ति आक्षेपं त्याग ('तन्त्रालोक' के ११, १५, १६, २९ एवं ३२ आह्निक में सविस्तृत विवेचन) 'स्थान-कल्पना'—हृदय के स्पन्दनात्मक प्राणशक्तिमूलक सामान्य व्यापार में शरीरस्थ नाड़ी-चक्र में एवं बाह्य लिंग, चत्वर, प्रतिमा आदि में स्थान-कल्पना की जाती है । सामान्य स्पन्द तत्त्व का उन्मेष → षडध्वं-स्फुरण । सबसे पूर्व परमेश्वर का 'काल' नामक स्वरूप भासित होता है और यह परमात्मस्वरूप अभेदावस्था में 'काली-शक्ति' एवं भेदावस्था में 'प्राणशक्ति' कहलाता है । संवित्स्वरूपा काली शक्ति में स्वेच्छानुसार क्रमाक्रम (क्रम+अक्रम) रूपों में भासनार्थ क्रिया शक्ति का उन्मेष । क्रियाशक्ति का प्रथमोन्मेष = प्राण-व्यापार । 'प्राक् संवित् प्राणे परिणता ।'

परिचय एवं पृष्ठभूमि ७३ 'प्राणशक्ति' (प्राणापानादिक ५ रूपों में) जीवों को व्याप्त रखता है → इसीलिए 'चेतन' है। क्रियाशक्ति = अध्वा पूर्वभाग (कालाध्वा) उत्तरभाग (देशाध्वा) परवर्ण सूक्ष्मवर्ण स्थूलवर्ण मन्त्र पद कला तत्त्व भुवन 'वर्ण' = शब्दार्थ स्वरूप का शिव-शक्ति में व्याप्यव्यापकभाव से 'पर' सूक्ष्म एवं स्थूल रूप से स्थित वर्ण, पद, मन्त्र, कलातत्त्व, भुवन 'षदध्व' स्थित हैं। समस्त षडध्वात्मक जगत् 'क्रियाशक्ति' का उन्मेष है। प्राणशक्ति का स्पन्दन = समस्त षडध्वात्मक जगत् के बाह्य-अन्तर सर्वत्र अनवरत प्रवाहित किन्तु इसकी अनुभूति मात्र हृदयादिक में। हृदयादिक स्थानों में स्पन्दमान प्राणशक्ति में चित्त का विलय— 'स्थान-कल्पना' (आणवोपाय का अंग) है। 'स्थान कल्पना' = शरीर के नाड़ीचक्र, चक्र आदि स्थानों में, लिंग, चत्वर, प्रतिमा आदि चित्त का नियोजन = स्थान कल्पना। देह, बुद्धि, प्राण आदि अपारमार्थिक साधनों (विकल्प) विकल्पात्मक स्थूलोपाय = आणवोपाय। 'अपारमार्थिकेऽप्यस्मिन् परमार्थः प्रकाशते। (तन्त्रालोक ५।७) बुद्धौ प्राणे तथा देहे देशे वा जडता स्थिता। तां विरोध्याय मेधावी संविद्रश्मिमयो भवेत् ॥ (तन्त्रालोक ५।१०) जब साधक 'शाक्तोपाय' में सतर्क, सदागम एवं सद्गुरु की सहायता से उच्चार, करण आदि विकल्प-व्यापारों का शोधन कर लेता है (सभी में स्वात्मस्वरूप का साक्षात्कार करने लगता है) तब उसके चित में 'विश्वाहन्ता' का विकास होता है। दो प्रकार की अनुभूतियाँ— १. समस्त जगत् मेरा ही स्वरूप है। २. मेरा शुद्ध स्वरूप (स्वात्मस्वरूप) इससे भी परे हैं। एतत्र्कारक 'सार्वात्म्य भावना'—चित्त में शुद्ध विकल्पों की सृष्टि (समस्त जागतिक पदार्थों में अपने शुद्ध स्वरूप की भावना एवं उनसे अपृथकत्व-दृष्टि) ॥ 'शांभवोपाय' में जगत् को (दर्पण-प्रतिबिम्बित मुख की भाँति) बोधगगन विज्ञान भैरव में स्थित माना जाता है। 'प्रतिबिम्ब'— १. जिसकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। २. अन्य पदार्थ में संक्रान्त होकर ही प्रकाशित। ३. बिम्ब की स्वतन्त्र सत्ता होती है। यह स्वतः प्रकाश्य है यथा मुख स्वयं भासित। 'यद् भेदेन भासितुमशक्तमन्याव्यामिश्रत्वेनैव भाति तत् प्रतिबिम्बं मुखरूपमिव दर्पणे। (तन्त्रसार) अन्यामिश्रं स्वतन्त्रसद्भासमानं मुखं यथा। (तन्त्रालोकः ३।५३)

७४ स्पन्दकारिका यह विश्व भी दर्पणप्रतिबिम्बित नगरी के समान शिवमय दर्पण में अवभासित है। शिवस्वभाव है कि अपने में ही अपने विज्ञानमय स्वरूप को जगत् के रूप में भासित करता है। शिवमय दर्पण में बिना किसी बिम्ब की सत्ता के भी यह जगत् स्वातन्त्र्य शक्ति के चमत्कार द्वारा जगत् रूप प्रतिबिम्ब अवभासित होता है। प्रश्न—यदि शिव 'दर्पण' है तो उसमें प्रतिबिम्बित जगत् का यह 'प्रतिबिम्ब' जगद्रूप किसी पृथक् 'बिम्ब' पर आधृत है क्या ? नहीं। निर्विकल्प शिव से पृथक् किसी स्वतन्त्र जगत् का कोई अस्तित्व नहीं है। इसी निर्विकल्प शून्य स्वरूप परम सत्ता में चित्त को समाहित करना 'शांभवोपाय' है। 'आणव' 'शाक्त' एवं 'शांभव' उपायों से पृथक् है—'अनुपाय' ॥ 'अनुपाय'—उपायों से परतत्त्व प्रकाशित नहीं होता । क्या घट सूर्य को प्रकाशित कर सकता है? उपायजालं न शिवं प्रकाशयेत् घटेन किं भाति सहस्रदीधितिः । विवेचयन्नित्यमुदारदर्शनः स्वयं प्रकाशं शिवमाविशेत् क्षणात् ॥ (अभिनवगुप्त) उदार दृष्टि वाला व्यक्ति उपाय-निरर्थकता पर विचार करते-करते स्वप्रकाश शिव- स्वरूप में समाविष्ट हो जाता है। ठीक भी है—उपाय सार्थक नहीं है। 'अपरोक्षे भवत्तत्त्वे सर्वतः प्रकटे स्थिते । यैरूपायाः प्रतन्यन्ते नूनं त्वां न विदन्ति ते ॥ (संवित्प्रकाश) 'आणवोपाय' में—क्रम एवं कुल दर्शनों से भिन्न समस्त तांत्रिक एवं यौगिक विधियों का समावेश किया गया है। तन्त्रशास्त्र की विभिन्न कोटियाँ एवं उपाय—'शाक्तोपाय' में—क्रम दर्शन एवं 'शांभवोपाय' में कुल दर्शन एवं 'अनुपाय' में प्रत्यभिज्ञा दर्शन की ही (अभिनवगुप्त प्रभृति द्वारा) विवेचना की गई है। उपाय भी तो शिव से पृथक् नहीं है अतः उपायोपेय की स्वतन्त्र कल्पना भी सार्थक नहीं है। 'तन्त्रालोक' में अभिनवगुप्त ने तन्त्रशास्त्र को चार कोटियों में विभक्त किया है—१. 'अनुपाय' २. 'शांभवोपाय' ३. 'शाक्तोपाय' ४. 'आणवोपाय' । 'अनुपाय' = त्रिक या प्रत्यभिज्ञादर्शन । 'अनुपाय' कोटि के शास्त्र = त्रिकदर्शन या प्रत्यभिज्ञा ('तन्त्रालोक' : अभिनव) 'अनुपाय' सिद्धसाहित्य के 'सहज' के निकटस्थ है। 'अनुपाय' = अल्पोपाय (जयरथ) विज्ञानभैरव में अनुपाय पद्धति का ही सविस्तार विवेचन किया गया है। 'अनुपाय पद्धति' योग-प्रक्रिया-सापेक्ष है। अनुपाय— आचार्य अभिनवगुप्त 'तन्त्रसार' में कहते हैं—साधक गुरु के एक बार के उपदेश से ही नित्योदित समावेश दशा में संलीन हो जाता है। वह उपाय के रूप में षडंग योग के 'तर्क' का आश्रय ग्रहण करता है। उसकी दृष्टि यह है कि स्वप्रकाश

परिचय एवं पृष्ठभूमि ७५ स्वात्मस्वरूप ही तो परमात्मा है अतः किसी उपाय की सार्थकता क्या है? नित्य, स्वप्रकाश, निरावरण तत्त्व स्वात्मस्वरूप की प्राप्ति के लिए उपाय की क्या आवश्यकता है ? ‘स्वात्मस्वरूप में लीन होना’—भी निरर्थक है क्योंकि उसके अतिरिक्त अन्य (प्रवेश करने वाले) की सत्ता ही नहीं है । जगत् चिन्मय है—चिन्मात्रसार है । यह देश, काल, उपाधि, आकृति, से परे, शब्दागम्य, प्रमाणागम्य, स्वतन्त्र, आनन्दघन यह स्वात्मस्वरूप सभी सत्ताओं का केन्द्र है । मैं इस स्वात्म स्वरूप से भिन्न नहीं हूँ । इस अहमात्मक स्वात्मस्वरूप में ही यह समस्त जगत् प्रतिबिम्बित हो रहा है । इस प्रत्यभिज्ञा के उदित होने पर साधक नित्योदित परमात्मस्वरूप में प्रविष्ट हो जाता है— १. अनन्यचेताः प्रत्यन्ते परव्योमवपुर्भवेत् ॥ (वि०भै० ४१) २. अतश्च तन्मयं सर्वं भावयन् भवजिज्जनः (वि० भै० ९७) ३. बुद्धिं निस्तिमितां कृत्वा तत्तत्त्वमवशिष्यते ॥ (वि० भै० ९९) ४. क्षोभशक्ति विरामेण परा संजायते दशा । (वि० १०९) ५. तत्र-तत्र शिभावस्था व्यापकत्वात् क्व यास्यति । (वि० भै० ११३) ६. सर्वत्र भैरवो भावः समान्येष्वपि गोचरः । न च तद्व्यतिरेकेण परोऽस्तीत्यद्वया गतिः ॥ (१२१ वि० भै०) इस उपायशून्य 'अनुपाय' में मन्त्र, पूजा, ध्यान एवं चर्या आदि सभी साधन व्यर्थ हैं क्योंकि—‘उपायजालं न शिवं प्रकाशयेत्' । 'त्रिक दर्शन' में 'बंधन' एवं 'मुक्ति' तथा मुक्ति के उपायों के संदर्भ में भी नव्य दृष्टि प्रस्तुत की गई है यथा— 'बंधन' परमात्मा का अवरोहणात्मक व्यापार है । आत्मा का सम्यक् ज्ञान 'मुक्ति' है और अज्ञान ही 'बंधन' है— क) शिवजीवयोरभेद एव (मुक्तिः) उक्ता (आचार्य क्षेमराज) । ख) एतत्तत्त्वपरिज्ञानमेव मुक्तिः (आचार्य क्षेमराज) । ग) एतत्तत्त्वापरिज्ञानमेव बंधः (आचार्य क्षेमराज) । 'मालिनीविजयोत्तर' तन्त्र में 'मल' को ही 'अज्ञान' एवं 'संसारांकुर कारण' कहा गया है—'मलमज्ञानमिच्छन्ति संसारांकुरकारणम् ।' समावेश के पाँच भेद— १. जाग्रत्स्वप्नादिभेदेन सर्वाविशक्रमो बुधैः । पञ्चभिस्तु परिज्ञेयः स्वव्यापारात्पृथक् पृथक् ॥ (अधि २।२६) २. तत्र स्वरूपं शक्तिश्च सकलश्चेति तत्त्रयम् । इति जाग्रदवस्थेयं भेदे पञ्चदशात्मके ॥ (अधि० २।२७) ३. अकलौ द्वौ परिज्ञेयौ सम्यक् स्वप्नसुषुप्तयोः । मन्त्रादितत्पतीशान वर्गस्तुर्यः इति स्मृतः ॥ (२।२८)

७६ स्पन्दकारिका ४. शक्तिशांभू परिज्ञेयौ तुर्यातीते वरानने । त्रयोदशात्मके भेदे स्वरूपसकलावुभौ ॥ (२।२९) मोक्ष—Tantric view of Moksha—Moksha, in the tantric sense of the word, is the unfoldment of powers brought about by the self- realisation. रुद्रशक्ति ┌─────────────┬─────────────┐ आणव शाक्त शांभव १. रुद्रशक्ति समावेशः पञ्चधा परिपठ्यते । २. रुद्रशक्ति समावेशस्तत्र नित्यं प्रतिष्ठितः (अधि० २।१३,१७) १. भूत २. तत्त्व ३. आत्मा ४. मन्त्रेश ५. शक्ति—इन ५ भेदों तथा उपभेदों के अनुसार रुद्रशक्ति के ५० भेद हैं । आणव—१. 'जाग्रत्' २. 'स्वप्न' ३. 'सुषुप्ति' ४. 'स्वप्नातीत'-'तुरीय' ५. 'तुर्यातीत' । पृथ्‍वी से पदार्थ तक (१) स्वरूप सकल स्तर— (क) स्वरूप सकल शक्ति—जाग्रत् अवस्था । (ख) प्रलयाकल—स्वप्नावस्था । (ग) विज्ञानाकल—सुषुप्ति अवस्था । (घ) मन्त्र, मन्त्रेश—मन्त्रमहेशः तुरीयावस्था । (ङ) शिव-शक्ति—तुरीयातीतावस्था । पुरुष से कला पर्यन्त (२) स्वकल स्तर— (क) सकल = जाग्रतावस्था । (ख) यथा पूर्वोक्त । (ग) यथा पूर्वोक्त । (घ) यथा पूर्वोक्त । (ङ) यथा पूर्वोक्त । माया तत्त्व (३) प्रलयाकल स्तर— (क) प्रलयाकल-जाग्रतावस्था । (ख) विज्ञानाकल शक्ति-स्वप्नावस्था । (ग) यथा पूर्ववत् । (घ) यथा पूर्ववत् । (ङ) यथा पूर्ववत् । मायोर्ध्व (४) विज्ञानाकल स्तर— (क) विज्ञानाकल-जाग्रतावस्था ।

परिचय एवं पृष्ठभूमि ७७ (ख) मन्त्र-स्वप्नावस्था । (ग) मन्त्रेश-स्वप्नातीतावस्था । (घ) मन्त्रमहेश-तुरीयावस्था । (ङ) यथा पूर्वोक्त । शुद्धविद्या (५) मन्त्रस्तर— (क) मन्त्र-जाग्रतावस्था । (ख) मन्त्रेश-स्वानावस्था । (ग) मन्त्रमहेश-स्वप्नातीतावस्था (घ) शक्ति-तुरीयावस्था । (ङ) शिव-तुरीयातीतावस्था । ईश्वर (६) मन्त्रेश स्तर— (क) मन्त्र-जाग्रतावस्था । (ख) मन्त्रेश-स्वानावस्था । (ग) मन्त्रमहेश-स्वप्नातीतावस्था । (घ) शक्ति-तुरीयावस्था । (ङ) शिव-तुरीयातीतावस्था । सदाशिव (७) मन्त्रमहेश स्तर— (क) मन्त्रमहेश-जाग्रतावस्था । (ख) क्रियाशक्ति-स्वप्नावस्था । (ग) ज्ञानशक्ति-स्वप्नातीतावस्था । (घ) इच्छाशक्ति-तुरीयावस्था । (ङ) शिव-तुरीयातीतावस्था । अव्यक्त स्तर (८) शिव स्तर (Undifferentiated stage)— (क) क्रिया-जाग्रतावस्था । (ख) ज्ञान-स्वप्नावस्था । (ग) इच्छा-स्वप्नातीतावस्था । (घ) आनन्द-तुरीयावस्था । (ङ) चित् तुरीयातीतावस्था अवस्थाओं के पर्याय— (क) जाग्रत्-पिण्डस्थ—सर्वतोभद्र । (ख) स्वप्न-पदस्थ—व्याप्ति । (ग) सुषुप्ति-रूपस्थ—महाव्याप्ति । (घ) तुर्य-प्रचय—रूपातीत । (ङ) तुरीयातीत—महाप्रचय ।

७८ स्पन्दकारिका संसार की सर्वोच्च सत्ता—सर्वकर्ता, सर्वज्ञ, सर्वस्थिति कारक, नित्य ॥ परमात्मा सिसृक्षा के स्तर (Creational Stage)—पर अपने को 'विज्ञानाकल' के रूप में प्रस्तुत करता है। परमात्मा उन्हें स्थिति, संहार एवं रक्षा का कार्य प्रदान करते हैं— क्रिया हेतु परमात्मा ७ करोड़ मन्त्रों को जन्म देते हैं। ये मन्त्र साधकों की इच्छाओं की पूर्ति प्रदान करते हैं। आत्मा अपने को चार रूपों में व्यक्त करती है—१. 'शिव' २. 'मन्त्रमहेश' ३. 'मन्त्रेश' ४. 'मन्त्र'। विज्ञानाकल एवं मन्त्र—विज्ञानाकल में—१. मल। 'प्रलयाकल' में—२ मल ॥ 'मल' = अपूर्ण ज्ञान ॥ रुद्र = ११८ 'रुद्र' ही मन्त्रेश्वरों के रूप में नियुक्त किये जाते हैं। (मालिनीविजयोत्तरतन्त्र)। [८] बंधन और मुक्ति शिवसूत्रकार तो कहते हैं कि 'ज्ञान' ही बंधन है—'ज्ञानं बंधः' (१।२) आत्मा में अनात्मा एवं अनात्मा में आत्माभिमानस्वरूप अख्याति अर्थात् अज्ञानात्मक ज्ञान ही बंधन है— (१) 'आत्मनि अनात्मताभिमानरूपाख्यातिलक्षणाज्ञानात्मकं ज्ञानं केवलं बंधो' तथा— (२) अनात्मनि शरीरादौ आत्मताभिमानात्मकम् अज्ञानमूलं ज्ञानमपि बंध एव ॥१ स्पन्दकारिका = 'शब्दराशि समुत्थस्य शक्ति वर्गस्य भोग्यताम् । कलाविलुप्त विभवो गतः सन् स पशुः स्मृतः ॥'—पशुत्व ही बंधन है। आचार्य क्षेमराज की दृष्टि—सारांश बंधन—१. आत्मा में अनात्मा का अभिमान रूप अज्ञान। २. अनात्मा में आत्मा का अभिमानरूप अज्ञान। ३. 'अपूर्णम्मन्यतात्मकआणवमलसतत्त्वसंकुचितज्ञानात्मा बंधः ॥' ४. 'मल' = 'मलमज्ञानमिच्छन्ति संसारांकुरकारणम्' ५. अज्ञानाद् बध्यते लोकस्ततः सृष्टिश्श्च संहतिः ।२ ६. आत्मप्रत्यभिज्ञा का अभाव (स्वस्वरूप का ज्ञानाभाव) ७. ज्ञानाभाव 'अज्ञान' नहीं है प्रत्युत अपूर्णज्ञान अज्ञान है और यही बंधन का कारण है। ८. जिस स्वस्वरूप का ज्ञान नहीं है उसका स्वरूप है क्या? 'आत्मनो भैरवं रूपम्'। 'स्पन्दकारिका' का मत—(१) इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् स पश्यन् सर्वतो युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ।


१-२. शिवसूत्रविमर्शिनी।

परिचय एवं पृष्ठभूमि ७९ २. अयमेवोदयस्तस्यध्येयस्यध्यायि चेतसि तदात्मतासमापत्तिमिच्छतः साधकस्य वा। ३. इयमेवाऽमृतप्राप्तिरयमेवाऽत्मनो ग्रहः। इयं निर्वाणदीक्षां च शिवसद्भावदायिनी। ४. यदा त्वेकत्रसंरूढस्तदा तस्य लयोद्भवौ। नियच्छन् भोक्तृतामेति ततश्चक्रेश्वरो भवेत् ॥—‘स्पन्दकारिका’ ५. कलाविलुप्त विभव ही पशु है। मुक्ति क्या है? ‘जीवन्मुक्ति’ ही मुक्ति है— चिदानन्दलाभे देहादिषु चेत्यमानेष्वपि चिदैकात्म्यप्रतिपत्तिदार्ढ्यं जीवन्मुक्तिः। अविचला चिदेकत्वप्रथा सैव जीवन्मुक्तिः। —(प्र०हृ०सू० १६ ‘स्पन्दकारिका’ में कहा गया है कि जगत् को अपनी क्रीड़ा मानना ही ‘जीवन्मुक्ति’ है— ‘इति वा यस्य संवितिः क्रीड़ात्वेनाखिलं जगत्। स पश्यन् सततं युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥’ समस्त ज्ञायमान पदार्थ जीव के अपने अंगसदृश हैं—‘भोक्तैव भोग्यभावेन सदा सर्वत्र संस्थितः ॥ (स्पन्द का० २४) पारमार्थिक दृष्टि से बंधन एवं मुक्ति—परमात्मा स्वयमेव अपनी इच्छा से स्व- स्वरूप का आच्छादन करके पशु बन जाता है और स्वेच्छा से ही इस आच्छादन का त्याग करके शिव भी बन जाता है अतः पशु का पशुत्वरूप बंधन एवं इस बंधन का त्याग रूप शिवत्व या मुक्ति तो कल्पित ही है अतः कैसा बंधन कैसी मुक्ति?— न मे बंधो न मोक्षो मे भीतस्यैता विभीषिकाः। प्रतिबिम्बमिदं बुद्धेर्जलेष्विव विवस्वतः ॥ (१३२)१ आचार्य सोमानन्द का कथन है कि प्रतीतिमात्र ही बंधन-मोक्ष दोनों हैं— विभिन्न शिवपक्षे तु सत्ये दार्ढ्यं परत्र नो। प्रतीतिमात्रमेवात्र तावता बंधमोक्षता ॥२ अर्थात् ‘शिवाभेदप्रतीतिमात्रं मोक्षस्तदप्रतीतिस्तु बंध इति।’३ [९] अद्वैत भक्ति ‘स्पन्द’ एवं ‘प्रत्यभिज्ञा’ में अद्वैतभक्ति स्थापित है। ‘अनुभवसूत्र’ में भी यही दृष्टि प्रतिपादित है— १. द्वैतभक्तिः प्रपञ्चाख्या केनचित् कल्पिता मृषा। अद्वैतभक्तिरचला निर्विकल्पा निरञ्जना ॥ (८ अधिकरणः ४८) १. विज्ञानभैरव। २. शिवदृष्टि (सोमानन्द)। ३. शिवदृष्टिवृत्ति (उत्पलदेव)।

८० स्पन्दकारिका २. एवमद्वैतभक्त्यैव प्रसादः सर्वतोमुखः । प्रसिद्ध्यति ततः सर्वमात्मरूपेण दृश्यते ॥ (८।३६)१ ३. इसका प्रभाव क्या है ? (क) कर्ता कारयिता कर्म करणं कार्यमेव च । सर्वमात्मतया भाति प्रसादात् पारमेश्वरात् ॥ (८।३७) (ख) भोक्ता भोजयिता भोगो भोगोपकरणानि च । सर्वमात्मतया भाति प्रसादात् पारमेश्वरात् ॥ (८।३८)२ (ग) ग्राहकश्च तथा ग्राह्यं ग्रहणं सर्वतोमुखम् । सर्वमात्मतया भाति प्रसादात् पारमेश्वरात् ॥ (८।३९) (घ) शरीरमिन्द्रियं प्राणा मनो बुद्धिरहंकृतिः । सर्वमात्मतया भाति प्रसादात् पारमेश्वरात् ॥ (८।४१) (ङ) विधयश्च निषेधाश्च निषिद्धकरणान्यपि । सर्वमात्मतया भाति प्रसादात् पारमेश्वरात् ॥ (८।४२)३ (च) कामक्रोधादयः सर्वे तथा शान्त्यादयोऽपि च । सर्वमात्मतया भाति प्रसादात् पारमेश्वरात् ॥ (८।४३) निष्कर्ष— १. तस्मादद्वैतगां भक्तिमाश्रयेत् सर्वसिद्धिदाम् । न च द्वैतात्मिकां भक्तिं क्लेशहेतुप्रदायिनीम् ॥ (८।४४)४ २. अद्वैतपदरूढा या भक्तिरद्वैतलक्षणा । सैवाद्वैताभिधा भक्तिरन्या केवल कल्पिता । (८।४६)५ (क) द्वैतभक्ति—संसार-वर्धन-भेद बुद्धि—संसरण चक्र ॥ (ख) अद्वैतभक्ति—अभिन्नरूप—भेदहीन—संसार-विनाश ॥ द्वैतभक्त्या हि संसारवर्धनं भिन्नरूपतः । अभिन्नरूपतोऽद्वैतभक्त्या संसारनाशनम् ॥ (८।४७)६ अद्वैतभक्ति—द्वैतभक्ति की निवृत्ति । द्वैतभक्तिनिवृत्तौ हि साक्षादद्वैतलक्षण । भक्तिर्गरीयसी भाति निजर्वाण निरूपिणी ॥ (८।४९) भक्ति की शक्ति एवं उसका विमर्श-स्वरूप— १. भक्तिरेव परमार्थदायिनी भक्तिरेव परतत्त्ववेदिनी । भक्तिरेव भवदोषहारिणी भक्तिरेव शिवभावकारिणी ॥ (८।८३) १-६. अनुभवसूत्र ।

परिचय एवं पृष्ठभूमि ८१ २. नाहमनात्मा पश्चात्कोऽहं योऽहं पदस्थ आत्मा साक्षी । सोऽहं तत्पति शिवदासोऽहं दासोऽहमिति चरेदुपरि ॥ (८।८५)१ —वातूलोत्तरतन्त्र शिवानुभवसूत्र ‘विज्ञानभैरव’ में कहा गया है कि भक्ति के उद्वेक से विरक्त मल के हृदय में जिस प्रकार की मानसिक दशा (मति) उत्पन्न होती है वही ‘शांकरीशक्ति’ है और ऐसा साधक ‘शिव’ हो जाता है । भक्त्युद्रेकाद्विरक्तस्य यादृशी जायते मतिः । सा शक्तिः शांकरी नित्यं भावयेत् तां ततः शिवः ॥ (विज्ञानभैरव ११८) ‘गीतानिष्यन्द’ में क्षेमेन्द्र ने कहा है कि—सर्वत्र सर्वव्यापक भगवान् के श्रीचरणों में साष्टांग प्रणाम करना ही भक्ति नहीं है प्रत्युत् यथार्थ भक्ति तो यह है कि भाव स्वभाव के सभी पदार्थों में एक ही भगवान् का अनुचिन्तन किया जाय । समस्त जगत् को भगवन्मय समझा जाय । न पादपतनं भक्तिर्व्यापिनः परमेशितुः । भक्तिर्भावस्वभावानां वदेकीभावभावनम् ॥ उत्पलदेवाचार्य (‘श्री शिवस्तोत्रावली’ के पञ्चम स्तोत्र में) कहते हैं ‘हे भगवन् । आपके अद्वयानन्द को प्राप्त करके और इस जगत् को अपनी ही आत्मा की झलक से युक्त देखते हुए भी मैं भक्तिरस के चमत्कारों से वंचित न रहूँ— ‘अपि लब्धभवद्भावः स्वात्मोल्लासमयः जगत् । पश्यन् भक्तिरसाभोगैर्गर्भवेयमवियोजितः ॥ १६ ॥ आचार्य उत्पलदेव पुनः कहते हैं—‘शिव बनकर शिव की पूजा करनी चाहिए— ऐसा भक्त जनों से कहा जाता है क्योंकि पारमार्थिक सारभूत स्वरूप वाले आप भक्तों द्वारा ही अभेद दृष्टि से ढूँढ़े जाते हैं— ‘शिवा भूत्वा यजेतेति भक्तो भूत्वेति कथ्यते । त्वमेव हि वपुः सारं भक्तैर्हृदयशोधितम् ॥ (१।१४) ‘हे पूर्णाहन्ता स्वरूप स्वामी ! मैं ईश्वर हूँ’ मैं ही सुन्दर (चिदात्मा के प्रकाश से उज्ज्वल) हूँ । मैं ही सौभाग्यवान् हूँ । ज्यादा क्या कहूँ ? ‘इस जगत् में मेरे समान अन्य कौन है ?’—ऐसे स्वात्माभिमान की भावना आपके भक्त को अत्यन्त शोभा देती है— ईश्वरोऽहमेव रूपवान् पण्डितोऽस्मि सुभगोऽस्मि कोऽपरः । मत्समोऽस्ति जगतीति शोभते, मानिता त्वदनुरागिणः परम् ॥ ४ ॥ यहाँ समावेशमयी भक्ति स्पृहणीय है— ‘हे उमापति! अथाह, निर्विकल्प, अभेदरूप स्वात्मस्वरूप और सभी भेदमय १. अनुभवसूत्र । स्पं.भू. ५

८२ स्पन्दकारिका पदार्थों को निगल डालने वाले आप चिद्रूप में समावेश करते हुए मैं सदैव आपकी पूजा करता हूँ— 'त्वामगाधमविकल्पमद्वयं, स्वं स्वरूपमखिलार्थघस्मरम् । आविशन्नहमुमेश सर्वदा, पूजयेयमभिसंस्तुवीय च ॥' 'भक्त्यावेशस्तु मे सदा' (१६।६) 'जहाँ इस अलौकिक चिदात्मा महादेव की पूजा की जाती है वहाँ कौन सी शोभा नहीं होती, कौन सा आनन्द नहीं होता, कौन सी उत्कृष्ट सुखसम्पत्ति नहीं होती और कौन सा मोक्ष नहीं होता ?' का न शोभा न को ह्लादः का समृद्धिर्न वापरा । को वा न मोक्षः कोऽत्येष महादेवे यदर्च्यते ॥ (१७।२५) 'प्रत्यभिज्ञाकारिका' के ज्ञानाधिकार में उत्पलदेवाचार्य भगवान् की दास्य भक्ति की चर्चा करते हुए प्रत्यभिज्ञा के प्रतिपादन की बात करते हैं— 'कथं चिदासाद्य महेश्वरस्य, दास्यं जनस्याप्युपकारमिच्छन् । समस्त सम्पत्समवाप्ति हेतुं, तत्प्रत्यभिज्ञामुपपादयामि ॥' (प्र०का०) यहाँ 'भक्ति' को भगवान् की 'आह्लादिनी शक्ति' माना जाता है। 'भक्ति' भगवान् की 'आनन्द शक्ति' है । यहाँ 'भक्ति' भावना, गलदश्रुभावुकता या 'चित्त का द्रवीभाव' मात्र नहीं है प्रत्युत् यह भगवान् में अपृथक् रूप से समवेत आनन्द शक्ति का उल्लास है । यह परमात्मा की शाश्वत आनन्द शक्ति का उसके अपरिमेय आनन्दोल्लास की अभिव्यञ्जना है । यह परमात्मा की अचिन्त्य शक्ति की (भक्त के हृदय में) अभिव्यक्ति है । [१०] मन्त्रविज्ञान और स्पन्दशास्त्र 'स्पन्दशास्त्र' ज्ञान-साधना, योग-साधना, मन्त्र-साधना एवं समावेशमयी भक्ति- साधना—इन सभी में आस्था रखता है । मन्त्र विज्ञान के विषय में स्पन्दशास्त्र में मुख्यतः 'सहजविद्योदय स्पन्द निष्यन्द' में प्रकाश डाला गया है । इसमें कहा गया है— १. 'तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञ बल शालिनः । प्रवर्तन्तेऽधिकाराय करणानिव देहिनाम् ॥ २६ ॥ (स्पन्दकारिका) २. 'तत्रैव संप्रलीयन्ते शान्तरूपा निरञ्जनाः । सहाराधकचित्तेन तेन ते शिवधर्मिणः ॥ २७ ॥ (स्पन्दकारिका) अर्थात् स्पन्दरूप आत्मबल के साथ तद्रूपता प्राप्त करने से प्रत्येक प्रकार के मन्त्र में सर्वज्ञता, सर्वकर्तृत्वता, पूर्णता, सर्वव्यापकता, अमित तृप्ति, नित्यता, अप्रतिहत स्वातंत्र्य आदि षडात्मक माहेश्वर बलों का संचार हो जाता है अतः वे इन बलों से अनन्त