भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 75

७४ स्पन्दकारिका यह विश्व भी दर्पणप्रतिबिम्बित नगरी के समान शिवमय दर्पण में अवभासित है। शिवस्वभाव है कि अपने में ही अपने विज्ञानमय स्वरूप को जगत् के रूप में भासित करता है। शिवमय दर्पण में बिना किसी बिम्ब की सत्ता के भी यह जगत् स्वातन्त्र्य शक्ति के चमत्कार द्वारा जगत् रूप प्रतिबिम्ब अवभासित होता है। प्रश्न—यदि शिव 'दर्पण' है तो उसमें प्रतिबिम्बित जगत् का यह 'प्रतिबिम्ब' जगद्रूप किसी पृथक् 'बिम्ब' पर आधृत है क्या ? नहीं। निर्विकल्प शिव से पृथक् किसी स्वतन्त्र जगत् का कोई अस्तित्व नहीं है। इसी निर्विकल्प शून्य स्वरूप परम सत्ता में चित्त को समाहित करना 'शांभवोपाय' है। 'आणव' 'शाक्त' एवं 'शांभव' उपायों से पृथक् है—'अनुपाय' ॥ 'अनुपाय'—उपायों से परतत्त्व प्रकाशित नहीं होता । क्या घट सूर्य को प्रकाशित कर सकता है? उपायजालं न शिवं प्रकाशयेत् घटेन किं भाति सहस्रदीधितिः । विवेचयन्नित्यमुदारदर्शनः स्वयं प्रकाशं शिवमाविशेत् क्षणात् ॥ (अभिनवगुप्त) उदार दृष्टि वाला व्यक्ति उपाय-निरर्थकता पर विचार करते-करते स्वप्रकाश शिव- स्वरूप में समाविष्ट हो जाता है। ठीक भी है—उपाय सार्थक नहीं है। 'अपरोक्षे भवत्तत्त्वे सर्वतः प्रकटे स्थिते । यैरूपायाः प्रतन्यन्ते नूनं त्वां न विदन्ति ते ॥ (संवित्प्रकाश) 'आणवोपाय' में—क्रम एवं कुल दर्शनों से भिन्न समस्त तांत्रिक एवं यौगिक विधियों का समावेश किया गया है। तन्त्रशास्त्र की विभिन्न कोटियाँ एवं उपाय—'शाक्तोपाय' में—क्रम दर्शन एवं 'शांभवोपाय' में कुल दर्शन एवं 'अनुपाय' में प्रत्यभिज्ञा दर्शन की ही (अभिनवगुप्त प्रभृति द्वारा) विवेचना की गई है। उपाय भी तो शिव से पृथक् नहीं है अतः उपायोपेय की स्वतन्त्र कल्पना भी सार्थक नहीं है। 'तन्त्रालोक' में अभिनवगुप्त ने तन्त्रशास्त्र को चार कोटियों में विभक्त किया है—१. 'अनुपाय' २. 'शांभवोपाय' ३. 'शाक्तोपाय' ४. 'आणवोपाय' । 'अनुपाय' = त्रिक या प्रत्यभिज्ञादर्शन । 'अनुपाय' कोटि के शास्त्र = त्रिकदर्शन या प्रत्यभिज्ञा ('तन्त्रालोक' : अभिनव) 'अनुपाय' सिद्धसाहित्य के 'सहज' के निकटस्थ है। 'अनुपाय' = अल्पोपाय (जयरथ) विज्ञानभैरव में अनुपाय पद्धति का ही सविस्तार विवेचन किया गया है। 'अनुपाय पद्धति' योग-प्रक्रिया-सापेक्ष है। अनुपाय— आचार्य अभिनवगुप्त 'तन्त्रसार' में कहते हैं—साधक गुरु के एक बार के उपदेश से ही नित्योदित समावेश दशा में संलीन हो जाता है। वह उपाय के रूप में षडंग योग के 'तर्क' का आश्रय ग्रहण करता है। उसकी दृष्टि यह है कि स्वप्रकाश