भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 74

परिचय एवं पृष्ठभूमि ७३ 'प्राणशक्ति' (प्राणापानादिक ५ रूपों में) जीवों को व्याप्त रखता है → इसीलिए 'चेतन' है। क्रियाशक्ति = अध्वा पूर्वभाग (कालाध्वा) उत्तरभाग (देशाध्वा) परवर्ण सूक्ष्मवर्ण स्थूलवर्ण मन्त्र पद कला तत्त्व भुवन 'वर्ण' = शब्दार्थ स्वरूप का शिव-शक्ति में व्याप्यव्यापकभाव से 'पर' सूक्ष्म एवं स्थूल रूप से स्थित वर्ण, पद, मन्त्र, कलातत्त्व, भुवन 'षदध्व' स्थित हैं। समस्त षडध्वात्मक जगत् 'क्रियाशक्ति' का उन्मेष है। प्राणशक्ति का स्पन्दन = समस्त षडध्वात्मक जगत् के बाह्य-अन्तर सर्वत्र अनवरत प्रवाहित किन्तु इसकी अनुभूति मात्र हृदयादिक में। हृदयादिक स्थानों में स्पन्दमान प्राणशक्ति में चित्त का विलय— 'स्थान-कल्पना' (आणवोपाय का अंग) है। 'स्थान कल्पना' = शरीर के नाड़ीचक्र, चक्र आदि स्थानों में, लिंग, चत्वर, प्रतिमा आदि चित्त का नियोजन = स्थान कल्पना। देह, बुद्धि, प्राण आदि अपारमार्थिक साधनों (विकल्प) विकल्पात्मक स्थूलोपाय = आणवोपाय। 'अपारमार्थिकेऽप्यस्मिन् परमार्थः प्रकाशते। (तन्त्रालोक ५।७) बुद्धौ प्राणे तथा देहे देशे वा जडता स्थिता। तां विरोध्याय मेधावी संविद्रश्मिमयो भवेत् ॥ (तन्त्रालोक ५।१०) जब साधक 'शाक्तोपाय' में सतर्क, सदागम एवं सद्गुरु की सहायता से उच्चार, करण आदि विकल्प-व्यापारों का शोधन कर लेता है (सभी में स्वात्मस्वरूप का साक्षात्कार करने लगता है) तब उसके चित में 'विश्वाहन्ता' का विकास होता है। दो प्रकार की अनुभूतियाँ— १. समस्त जगत् मेरा ही स्वरूप है। २. मेरा शुद्ध स्वरूप (स्वात्मस्वरूप) इससे भी परे हैं। एतत्र्कारक 'सार्वात्म्य भावना'—चित्त में शुद्ध विकल्पों की सृष्टि (समस्त जागतिक पदार्थों में अपने शुद्ध स्वरूप की भावना एवं उनसे अपृथकत्व-दृष्टि) ॥ 'शांभवोपाय' में जगत् को (दर्पण-प्रतिबिम्बित मुख की भाँति) बोधगगन विज्ञान भैरव में स्थित माना जाता है। 'प्रतिबिम्ब'— १. जिसकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। २. अन्य पदार्थ में संक्रान्त होकर ही प्रकाशित। ३. बिम्ब की स्वतन्त्र सत्ता होती है। यह स्वतः प्रकाश्य है यथा मुख स्वयं भासित। 'यद् भेदेन भासितुमशक्तमन्याव्यामिश्रत्वेनैव भाति तत् प्रतिबिम्बं मुखरूपमिव दर्पणे। (तन्त्रसार) अन्यामिश्रं स्वतन्त्रसद्भासमानं मुखं यथा। (तन्त्रालोकः ३।५३)