स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२ स्पन्दकारिका उपायों एवं समावेशों का 'तन्त्रालोक' (३ से १२ आ०) 'तन्त्रसार' (पृ० १०- ११४) 'महार्थमंजरी' (५६-५९) 'परिमल' (पृ० १३८-१५३) 'मालिनीविजयोत्तर तन्त्र' (द्वि० आ० १३-४४) में विवेचन किया गया है । सारांश—'आणव उपाय' : उच्चार, करण, ध्यान, वर्ण, स्थान-कल्पना का अभ्यास । 'आणव समावेश'—किसी एक अभ्यास से प्राप्त होने वाली एकाग्रता ॥ 'अणु' = मितप्रमाता, जीव, सकल । परिमित स्वरूप वाले बुद्धि, प्राण, देह, देश, ध्यान, करण आदि को उपाय के रूप में ग्रहण करने वाले ॥ इसीलिए इसके उपाय की संज्ञा है—'आणव उपाय' ॥ आणवोपाय में—'ध्यान' बुद्धि का व्यापार है । 'प्राण' स्थूल-सूक्ष्म भेद से द्विविध रूप वाला है । 'स्थूल प्राण' का व्यापार = 'उच्चार' प्राणवृत्तियों के रूप में अवस्थित, 'सूक्ष्मप्राण' = 'वर्ण' । 'करण'—शरीर के अंगों को किसी विशेष प्रकार की स्थिति में रखना ॥ 'स्थान-कल्पना' = घट-स्थापन, मण्डल-निर्माण, मन्दिर, मूर्ति, चित्र आदि की रचना आदि विधियों का समावेश ॥ 'ध्यान' = सगुण स्वरूप में चित्त की एकाग्रता । 'उच्चार' = प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान आदि के श्वास-प्रश्वास, छींक (क्षुत्) प्रभृति प्राण-वृत्तियाँ । 'वर्ण'—प्राणोच्चार के साथ स्वाभाविक रूप से उच्चरित 'सकार'-'हकार' ध्वनि = 'वर्ण' ॥ ये सभी वर्णों एवं मन्त्रों के बोधक हैं । 'वर्ण' पीत-अरुण आदि रंगों के भी बोधक ॥ 'करण' के भेद ('तन्त्रालोक' में 'त्रिशिरोभैरव' का उल्लेख करके उद्धृत ७ करण— ग्राह्य ग्राहक संवित्ति संनिवेश व्याप्ति आक्षेपं त्याग ('तन्त्रालोक' के ११, १५, १६, २९ एवं ३२ आह्निक में सविस्तृत विवेचन) 'स्थान-कल्पना'—हृदय के स्पन्दनात्मक प्राणशक्तिमूलक सामान्य व्यापार में शरीरस्थ नाड़ी-चक्र में एवं बाह्य लिंग, चत्वर, प्रतिमा आदि में स्थान-कल्पना की जाती है । सामान्य स्पन्द तत्त्व का उन्मेष → षडध्वं-स्फुरण । सबसे पूर्व परमेश्वर का 'काल' नामक स्वरूप भासित होता है और यह परमात्मस्वरूप अभेदावस्था में 'काली-शक्ति' एवं भेदावस्था में 'प्राणशक्ति' कहलाता है । संवित्स्वरूपा काली शक्ति में स्वेच्छानुसार क्रमाक्रम (क्रम+अक्रम) रूपों में भासनार्थ क्रिया शक्ति का उन्मेष । क्रियाशक्ति का प्रथमोन्मेष = प्राण-व्यापार । 'प्राक् संवित् प्राणे परिणता ।'