भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 79

७८ स्पन्दकारिका संसार की सर्वोच्च सत्ता—सर्वकर्ता, सर्वज्ञ, सर्वस्थिति कारक, नित्य ॥ परमात्मा सिसृक्षा के स्तर (Creational Stage)—पर अपने को 'विज्ञानाकल' के रूप में प्रस्तुत करता है। परमात्मा उन्हें स्थिति, संहार एवं रक्षा का कार्य प्रदान करते हैं— क्रिया हेतु परमात्मा ७ करोड़ मन्त्रों को जन्म देते हैं। ये मन्त्र साधकों की इच्छाओं की पूर्ति प्रदान करते हैं। आत्मा अपने को चार रूपों में व्यक्त करती है—१. 'शिव' २. 'मन्त्रमहेश' ३. 'मन्त्रेश' ४. 'मन्त्र'। विज्ञानाकल एवं मन्त्र—विज्ञानाकल में—१. मल। 'प्रलयाकल' में—२ मल ॥ 'मल' = अपूर्ण ज्ञान ॥ रुद्र = ११८ 'रुद्र' ही मन्त्रेश्वरों के रूप में नियुक्त किये जाते हैं। (मालिनीविजयोत्तरतन्त्र)। [८] बंधन और मुक्ति शिवसूत्रकार तो कहते हैं कि 'ज्ञान' ही बंधन है—'ज्ञानं बंधः' (१।२) आत्मा में अनात्मा एवं अनात्मा में आत्माभिमानस्वरूप अख्याति अर्थात् अज्ञानात्मक ज्ञान ही बंधन है— (१) 'आत्मनि अनात्मताभिमानरूपाख्यातिलक्षणाज्ञानात्मकं ज्ञानं केवलं बंधो' तथा— (२) अनात्मनि शरीरादौ आत्मताभिमानात्मकम् अज्ञानमूलं ज्ञानमपि बंध एव ॥१ स्पन्दकारिका = 'शब्दराशि समुत्थस्य शक्ति वर्गस्य भोग्यताम् । कलाविलुप्त विभवो गतः सन् स पशुः स्मृतः ॥'—पशुत्व ही बंधन है। आचार्य क्षेमराज की दृष्टि—सारांश बंधन—१. आत्मा में अनात्मा का अभिमान रूप अज्ञान। २. अनात्मा में आत्मा का अभिमानरूप अज्ञान। ३. 'अपूर्णम्मन्यतात्मकआणवमलसतत्त्वसंकुचितज्ञानात्मा बंधः ॥' ४. 'मल' = 'मलमज्ञानमिच्छन्ति संसारांकुरकारणम्' ५. अज्ञानाद् बध्यते लोकस्ततः सृष्टिश्श्च संहतिः ।२ ६. आत्मप्रत्यभिज्ञा का अभाव (स्वस्वरूप का ज्ञानाभाव) ७. ज्ञानाभाव 'अज्ञान' नहीं है प्रत्युत अपूर्णज्ञान अज्ञान है और यही बंधन का कारण है। ८. जिस स्वस्वरूप का ज्ञान नहीं है उसका स्वरूप है क्या? 'आत्मनो भैरवं रूपम्'। 'स्पन्दकारिका' का मत—(१) इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् स पश्यन् सर्वतो युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ।


१-२. शिवसूत्रविमर्शिनी।