स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 80, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिचय एवं पृष्ठभूमि ७९ २. अयमेवोदयस्तस्यध्येयस्यध्यायि चेतसि तदात्मतासमापत्तिमिच्छतः साधकस्य वा। ३. इयमेवाऽमृतप्राप्तिरयमेवाऽत्मनो ग्रहः। इयं निर्वाणदीक्षां च शिवसद्भावदायिनी। ४. यदा त्वेकत्रसंरूढस्तदा तस्य लयोद्भवौ। नियच्छन् भोक्तृतामेति ततश्चक्रेश्वरो भवेत् ॥—‘स्पन्दकारिका’ ५. कलाविलुप्त विभव ही पशु है। मुक्ति क्या है? ‘जीवन्मुक्ति’ ही मुक्ति है— चिदानन्दलाभे देहादिषु चेत्यमानेष्वपि चिदैकात्म्यप्रतिपत्तिदार्ढ्यं जीवन्मुक्तिः। अविचला चिदेकत्वप्रथा सैव जीवन्मुक्तिः। —(प्र०हृ०सू० १६ ‘स्पन्दकारिका’ में कहा गया है कि जगत् को अपनी क्रीड़ा मानना ही ‘जीवन्मुक्ति’ है— ‘इति वा यस्य संवितिः क्रीड़ात्वेनाखिलं जगत्। स पश्यन् सततं युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥’ समस्त ज्ञायमान पदार्थ जीव के अपने अंगसदृश हैं—‘भोक्तैव भोग्यभावेन सदा सर्वत्र संस्थितः ॥ (स्पन्द का० २४) पारमार्थिक दृष्टि से बंधन एवं मुक्ति—परमात्मा स्वयमेव अपनी इच्छा से स्व- स्वरूप का आच्छादन करके पशु बन जाता है और स्वेच्छा से ही इस आच्छादन का त्याग करके शिव भी बन जाता है अतः पशु का पशुत्वरूप बंधन एवं इस बंधन का त्याग रूप शिवत्व या मुक्ति तो कल्पित ही है अतः कैसा बंधन कैसी मुक्ति?— न मे बंधो न मोक्षो मे भीतस्यैता विभीषिकाः। प्रतिबिम्बमिदं बुद्धेर्जलेष्विव विवस्वतः ॥ (१३२)१ आचार्य सोमानन्द का कथन है कि प्रतीतिमात्र ही बंधन-मोक्ष दोनों हैं— विभिन्न शिवपक्षे तु सत्ये दार्ढ्यं परत्र नो। प्रतीतिमात्रमेवात्र तावता बंधमोक्षता ॥२ अर्थात् ‘शिवाभेदप्रतीतिमात्रं मोक्षस्तदप्रतीतिस्तु बंध इति।’३ [९] अद्वैत भक्ति ‘स्पन्द’ एवं ‘प्रत्यभिज्ञा’ में अद्वैतभक्ति स्थापित है। ‘अनुभवसूत्र’ में भी यही दृष्टि प्रतिपादित है— १. द्वैतभक्तिः प्रपञ्चाख्या केनचित् कल्पिता मृषा। अद्वैतभक्तिरचला निर्विकल्पा निरञ्जना ॥ (८ अधिकरणः ४८) १. विज्ञानभैरव। २. शिवदृष्टि (सोमानन्द)। ३. शिवदृष्टिवृत्ति (उत्पलदेव)।