स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिचय एवं पृष्ठभूमि ८३ शक्तिसम्पन्न हो उठते हैं और मन्त्र उनके समस्त अभीष्टो को उसी प्रकार पूर्ण कर देते हैं जैसे इन्द्रियाँ ॥ ये मन्त्र शान्तरूप एवं निरंजन (शुद्ध संविद्रूप एवं मायिक उपरागों से शून्य) होकर आराधक के चित्त के साथ चिदाकाश में विलीन हो जाते हैं । ये समस्त मन्त्र शिवधर्मा (शिवस्वरूप) हैं । ये मन्त्र द्विविध प्रकारक हैं—१. भोगरूप, २. मोक्षरूप । अर्थात् साञ्जन एवं निरञ्जन ॥ (क) मन्त्र का साञ्जन स्वरूप—(सांसारिक भोगों के रूप में फल प्रदान करने हेतु प्रयुक्त मन्त्र) उदा० मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण स्तंभन एवं द्वेषण आदि अभिचार-सिद्धि हेतु, रोग-निवारण हेतु निग्रहानुग्रह हेतु या किसी अन्य सांसारिक फलेच्छा हेतु प्रयुक्त मन्त्र 'साञ्जन मन्त्र' कहलाते हैं । (ख) निरञ्जन मन्त्र का स्वरूप—जिन मन्त्रों को अपने शिवत्व की अभिव्यक्ति हेतु प्रयुक्त किया जाता है वे मन्त्र मायीय उपरागों, दूषणों, एवं ऐहिक फलाकांक्षाओं से शून्य होने के कारण 'निरंजन' कहलाते हैं । इस प्रकार मन्त्रों के उपयोग की दो विधियाँ हुईं १. 'सांजन विधि', २. 'निरंजन विधि' । वर्णरचना के रूप में विरचित मन्त्र को ही मन्त्र का स्वस्वरूप मानना असंगत है—अभिनवगुप्त एवं क्षेमराज कहते हैं— (क) 'लिपिस्थितस्तु यो मन्त्रो निर्वीर्यः सोऽत्र कल्पितः । (तन्त्रालोक ४.६६) (ख) 'मन्त्रदेवताविमर्शपरत्वेन प्राप्ततत्सामरस्यम् आराधकचित्तमेव, न तु विचित्र- वर्णसंघटनामात्रम् ॥ (शिवसूत्र वि० २-१) अर्थात् वर्ण समुदाय की विशिष्ट संरचना मात्र 'मन्त्र' नहीं है प्रत्युत् देवता के विमर्श के कारण प्राप्त सामरस्य युक्त (आराधक का) चित्त ही 'मन्त्र' है—'चित्तं मन्त्रः' (शि.सूत्र)। (ग) आचार्य उत्पल (स्पन्दप्रदीपिका में) कहते हैं— 'तद् बलं निरावरण चिदुल्लासरूपं परशक्त्याख्यमाक्रम्य अधिष्ठाय मन्त्राः बीज- पिण्ड-पदनामरूपा मननत्राणधर्मिणः सहजनादशक्त्युद्बोधदीप्तत्वात् सर्वज्ञत्वादिन बलेन श्लाघा युक्ता मंत्रिप्रयुक्ता अधिकारायानुग्रहादौ प्रवर्तते ॥' (घ) आचार्य रामकण्ठ ('स्पन्द का०वि०') में कहते हैं— 'शिवस्य परमेश्वरस्यानन्यसाधारणः सर्वज्ञत्वादिर्गुणो सविद्यते येषां ते तथा शिवाद- भिन्नस्वरूपा' 'शिवधर्मिणाः' । (ङ) 'तद्बलं'—'तत्' समनन्तर प्रतिपादितस्वरूपस्य शिवस्य संबंधि 'बलं सामर्थ्य शक्तिम्' । (च) 'आक्रम्य'—उच्चिचारयिषावस्थायां तद्भेदोपपत्या स्वीकृत्य । (छ) सर्वज्ञस्य शिवस्य बलेन शक्त्या श्लाघमाना सन्तः यथास्वं प्रतिनियतकार्य- संपादनस्वाम्यार्थ्यं प्रसरन्ति ॥