भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 519 में से

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पृष्ठ 85

८४ स्पन्दकारिका (ज) यदि मन्त्र को ‘परमेश्वराभेद’ प्राप्त न हुआ तो वे शक्तिहीन रहते हैं—यहाँ तक कि तिनके को भी टेढ़ा नहीं कर सकते— ‘एते हि अनासादित परमेश्वरा-भेददशा उत्पादविनाशधर्मकवर्णमात्रात्मकाः तृणमपि कुब्जयितुमशक्ताः’। ‘उक्त बलाक्रमणेन ... वृश्चिकविषाकर्षणान्त परापरस्वकार्यसंपादनाधिकारा प्रतिहत शक्तयो भवन्ति ॥’ (झ) मन्त्रा नियताधिकारा एव ॥ (ञ) यस्तु स्वस्वभावे एव सुदृढात्मप्रतिपत्तिः तस्य उदयास्तमयज्ञस्य सर्व मन्त्राः सर्वार्थसाधनाधिकारिणो भवन्ति तत्तदिति कर्तव्यता साहित्य नियमाद्यपेक्षां विना ॥ ‘मन्त्र’ और आत्मबल की प्राप्ति का अन्तर्सम्बन्ध— सारांश—१. पुस्तकों में लिखित मन्त्र (आत्मबल शून्य मन्त्र) निःशक्त होते हैं । २. मन्त्र वर्णरचना मात्र नहीं प्रत्युत् मन्त्रदेवता के साथ प्राप्त सामरस्य है । अतः इस देव-सामरस्य-प्राप्त चित को भी मन्त्र कहते हैं । ३. ‘मन्त्र’ सर्वज्ञत्वादिशक्तियों से तभी युक्त होते हैं जब वे निरावरणात्मक चिदु- ल्लास रूप पराशक्ति से अधिष्ठित होते हैं । अन्यथा नहीं क्योंकि ‘मन्त्राश्चिन्मरीचयः’ (‘मन्त्र’ आत्मा की रश्मियाँ हैं)। ४. मन्त्र में चार बातें मुख्य होती हैं—१. ‘बीज’ २. ‘पिण्ड’ ३. ‘पद’ ४. ‘नाम’ और उनका धर्म है (क) ‘मनन’ (ख) ‘त्राण’ । मन्त्र का बल है—निरावरण चित् शक्ति का उल्लास अर्थात् पराशक्ति इसी परा- शक्ति को ग्रहण करके ‘मन्त्र’ सहजनाद शक्ति से उद्बोधित होकर प्रदीप्त होते हैं । इसी के कारण वे सर्वज्ञता आदि शक्तियों से शक्तिमान बनते हैं । ५. ये ‘मन्त्र’ शिव से अभिन्नस्वरूप अर्थात् ‘शिवधर्मी’ हैं और इनमें परमेश्वर शिव के समस्त सर्वज्ञत्वादि गुण या शक्तियाँ समाविष्ट हो जाती हैं । ६. जब ये ‘मन्त्र’ आत्मबल (स्पन्द) को प्राप्त कर लेते हैं (अर्थात् आत्मबल को अपने से अभिन्नस्वरूप में ग्रहण कर लेते हैं) (‘अभेदोपपत्त्या स्वीकृत्य’—रामकण्ठा- चार्य)—तब वे सर्वज्ञ शिव के बल से श्लाघमान हो जाते हैं और नियत कार्यों को सम्पन्न करने की सामर्थ्य प्राप्त कर लेते हैं । ७. परमेश्वर से तादात्म्य न प्राप्त कर पाने पर ये मन्त्र एक तुच्छ तिनके को भी टेढ़ा नहीं कर सकते । ८. जो साधक स्वस्वभाव में दृढ़ रहकर मन्त्रों की सिद्धि करते हैं वे नियतकार्यों को ही नहीं प्रत्युत् परमेश्वरवत् समस्त कार्यों को निष्पादित करने में समर्थ होते हैं । ९. ‘त्रिकसार’—‘वर्णातीत निराकार परम तत्त्व का अवबोध हो जाने पर ‘मन्त्र’ मन्त्राधियों के साथ साधक के किंकर बन जाते हैं—

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