स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 86, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिचय एवं पृष्ठभूमि ८५ विदिते तु परे तत्त्वे वर्णातीते ह्यविग्रहे । किंकरत्वं तु गच्छन्ति मन्त्रा मन्त्राधिपैः सह ॥ १०. 'हंसपारमेश्वर' — 'केवल वर्णरूप मन्त्र पशुभाव में स्थित है सुषुम्णामार्ग से उच्चारण करने पर वे पशुपति बन जाते हैं 'पशुभावे स्थिताः मन्त्राः केवला वर्णरूपिणः । सौषुम्णेध्वन्युच्चरिताः पतित्वं प्राप्नुवन्ति ते ॥ सौषुप्तपदवन्मूढः प्रबुद्धः स्यादनावृतः ।। (स्पन्द का० २५) ११. 'मन्त्र' शाक्त मार्ग में सफल होते हैं—'एष शाक्तो मार्गोऽत्र च मन्त्राणां साफल्यम्' (स्पन्दप्रदीपिका उत्पलाचार्य) ।। १२. 'तत्त्वरक्षाविधान' में कहा गया है—'आत्मसंवित् या परमपद में मन्त्र का प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि वह शक्ति एवं क्रिया से रहित है । शक्ति के विषय में ही मन्त्र का प्रयोग करना चाहिए क्योंकि मन्त्र का जप वहीं सफल होता है ।' १३. 'श्रीवैहायसी'—'संधिस्थल में नादोर्ध्वध्वनि से बोधित जप करना चाहिए । यथा सूत्र में मणिग्रथित होते हैं तद्वत् शक्ति के ताने-बाने से निर्मित ही मन्त्राक्षरों का ध्यान करना चाहिए । वह 'शक्ति' परम व्योम में अवस्थित रहती है और परामृत समृद्ध है । उक्त पद्धति से जप करने पर ही 'मन्त्र' स्वस्वरूप को प्रकट करता है और तब अपने को आच्छादित नहीं करता'— 'विष्णुवक्तं जपं कुर्यान्नादोर्ध्वध्वनिबोधितम् । मन्त्राक्षराणि मणिवच्छक्तौ प्रोतानि भावयेत् ।। तामेव च परे व्योम्नि परामृत बृंहितम् । दर्शयत्यात्मसद्भावमेवं मन्त्रो हृतिं विना ।।' १४. 'श्री कालपरा' में कहा गया है—'शब्द नादात्मक हैं अतः उसके साथ प्रत्यय संवित्-संलग्न रहकर बढ़ाती है । मन्त्र बोध के स्वरूप में स्थित संवित् अभिन्न है अतः वह आत्मबोध भी करा देती है'— शब्दो नादात्मकस्तस्मात् प्रत्ययेनोपबृंहितः । मन्त्रबोधस्वरूपस्थमभिन्नो बोधयत्यपि ।। १५. 'संकर्षणसूत्र' में कहा गया है—'चिद्रूपता स्वात्मैकनिष्ठ है । भावाभाव उसकी दशाएं एवं परिष्कार हैं । वह स्वसंवेदन संवेद्य है । प्रकृति से अतीत भी वही है और प्रकृति का विषय भी वही है । यही मन्त्रों का प्रत्ययात्मक कारण है । मन्त्र बाहर एवं भीतर वर्णसप से प्रकट होते हैं । वे शाश्वत पद रूप में होते हैं । वे मनुष्य के कर चरण आदि के समान हैं । वीर्य का योग होने पर किसी भी काल में प्रयोग करने पर वे सिद्ध होते हैं ।'— 'स्वात्मैकनिष्ठं चिद्रूपं भावाभावपरिष्कृतम् । स्वसंवेदनसंवेद्यं प्रकृत्यातीतगोचरम् ।।