स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 88, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिचय एवं पृष्ठभूमि ८७ (क) ५ अवस्थायें—जागरण, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय, तुरीयातीत । (ख) ६ शून्य—तृतीयकूट के रेक, बिन्दु, रोधिनी, नादान्त, व्यापिका एवं उन्मनी में महाशून्य ॥ (ग) ७ विषुव—मन्त्रविषुव । नाडी विषुव । प्रशान्तविषुव । शक्तिविषुव । तत्त्वविषुव । (घ) ९ चक्र—चक्रभावन—१. सकल, २. निष्कल, ३. सकल-निष्कल । (१) अकुल सहस्रार (२) मूलाधार (३) स्वाधिष्ठान (४) मणिपूरक (५) अनाहत (६) विशुद्धाख्य (७) आज्ञा (८) सूक्ष्म जिह्वा (९) बिन्दु । (त्रैलोक्यमोहनादि ९ चक्र) । 'शून्यषट्कं सुरेशानि अवस्थापञ्चकं पुनः । विषुवत्सप्तरूपं च भावयन्मनसा जपेत् ॥' (ङ) मन्त्रार्थ—भावार्थ, संप्रदायार्थ, निगर्भार्थ, कौलिकार्थ, रहस्यार्थ, महातत्त्वार्थ, नामार्थ, शब्दरूपार्थ, नामैकदेशार्थ, शाक्तार्थ सामरस्यार्थ, समस्तार्थ, सगुणार्थ, महा- वाक्यार्थ आदि । ('पञ्चदशी' के उतने ही अर्थ हैं जितने उसके वर्ण हैं ।) 'अहं'—'अहं' भी एक मन्त्र है और उसका अर्थ निम्नांकित है— अहमित्येकमद्वैतं यत्प्रकाशात्मविभ्रमः । अकारः सर्ववर्णाग्र्यः प्रकाशः परमः शिवः ॥ हकारोऽन्त्यः कालरूपो विमर्शाख्यः प्रकीर्तितः । अनयोः सामरस्यं यत् परस्मिन्ब्रह्मणि स्फुटम् ॥' 'अ' = शिव । 'ह' = 'शक्ति' 'अहकारौ शिवशक्ती शून्याकारौ परस्पराश्लिष्टौ । स्फुरणप्रकाशरूपावुपनिषदुक्तं परं ब्रह्म ॥' (वरि०२० २।६९) 'अहं'—'प्रकाश' + 'विमर्श' का सामरस्य ॥ 'स्पन्दकारिका' में—'स्वबल' 'आत्मबल' शब्दों का बार-बार प्रयोग किया गया है । यही बल 'मन्त्र' की आत्मा है जिसका स्पन्द० में अनेक बार प्रयोग किया गया है— १. अपित्वात्मबलस्पर्शात् पुरुषस्तत्समो भवेत् ॥ ८ ॥ (स्पन्द का०) २. स्वबलोद्योगभावितः (३६) (स्पन्दकारिका) । ३. 'तत्तथा बलमाक्रम्य' (३७) ४. स्वात्मन्यधिष्ठानात् (३९) ५. 'स्वयमेवावबोत्स्यते' (४३) (स्पन्द का०) । ६. तदाक्रम्य बलं मन्त्राः (२६) (स्पन्द का०) । 'स्वभाव' 'तदात्मतापत्ति' भी आत्मा के वाचक हैं— 'स्वभावादुपलब्धृतः' (इ) 'स्वभावमवलोकयन्' (११) (स्पन्द का०) ।