भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 89, कुल 519 में से

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पृष्ठ 89

८८ स्पन्दकारिका 'तदाक्रम्य बलं मन्त्रा (३१) इयमेवात्मनो ग्रहः (३२) (स्पन्द का०) । २०. मन्त्रदेवता और साधक के साथ उसका तादात्म्य—'स्पन्दकारिका' (३१) में कहा गया है कि ध्याता साधक के चित्त में ध्येय देवता का प्रत्यक्ष साक्षात्कार इसी को कहते हैं कि ध्याता के चित्त की मन्त्रोच्चारण करने की इच्छा मात्र से तत्काल उसका देवता के साथ तादात्म्य हो जाता है— अयमेवोदयस्तस्य ध्येयस्य ध्यायिचेतसि । तादात्मतासमापत्तिरिच्छतः साधकस्य या ॥ (३१) 'तादात्म्यं तत्स्वभावत्वप्राप्तिः मन्त्रदेवतया सह साधकस्य मन्त्रोच्चारणेच्छया संपादिता ।' (भट्टकल्लटः 'स्पन्दसर्वस्व') २१. मन्त्रसाधना एवं अमृत प्राप्ति, आत्मग्रह, निर्वाण दीक्षा, शिवसद्भाव— 'स्पन्दकारिका' में कहा गया है— इयमेवामृतप्राप्तिरयमेवात्मनो ग्रहः । इयं निर्वाण दीक्षा च शिवसद्भावदायिनी ॥ (३२) [११] मन्त्र और नाद 'मन्त्र' अनाहतनाद का स्थूल विग्रह है । समस्त मन्त्रों में यह शब्द ब्रह्मस्वरूप 'नाद' माला की मनकाओं से ग्रथित सूत्र की भाँति है । यही कारण है कि 'नाद' (उद्गीथ, प्रणव, ओंकार, ॐ) को परम मन्त्र कहा गया है । 'विज्ञानभैरव' में मन्त्र के जप को भी नादात्मक कहा गया है— भूयोभूयः परे भावे भावना भाव्यते हिया । जपः सोऽत्र स्वयं नादो मन्त्रात्मा जप्य ईदृशः ॥ (१४२) 'नाद' क्या है? 'शक्ति' ही नाद है— 'यत्किंचिन्नादरूपेण श्रूयते शक्तिरेव सा' (हठयोग० प्र० ४।१०२) १ नाद का प्रभाव— १. पापक्षय २. चित्त एवं प्राण का निरंजन में विलय १. सदानादानुसंधानात् क्षीयन्ते पापसंचयाः । निरंजने विलीयेते निश्चितं चित्तमारुतौ ॥ (हठयोग० ४।१०५) २. शंखदुन्दुभिनादं च न शृणोति कदाचन । काष्ठवज्जायते देह उन्मन्यावस्थया ध्रुवम् ॥ (४।१०६) नाद— १. काष्ठवत् स्थैर्य २. उन्मनी (असंप्रज्ञात समाधि) ३. सर्वावस्थाविनिर्मुक्ति ४. सर्वचिन्ताक्षय ५. मृतवत् अवस्थान ६. काल वंचन ७. कर्म-मुक्ति ८. पञ्चविषयों से मुक्ति ९. जाग्रत् स्वप्न-सुषुप्ति आदि से मुक्ति १०. समस्त द्वन्द्व-सुखदुःख, शीत-ऊष्ण, मान-अपमान आदि से मुक्ति ११. जाग्रत् में भी सुषुप्ति १२. श्वासोच्छ्वास विवर्जित १३. असम्प्रज्ञात समाधि । १. हठयोगप्रदीपिका (उप० ४/१०५-११२) ।

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