भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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परिचय एवं पृष्ठभूमि ८९ मन्त्र और परमेश्वर के साथ अभेद विमर्शन—क्षेमराजाचार्य—शिवसूत्र- विमर्शिनी' (२।१)— आचार्य क्षेमराज कहते हैं कि चूँकि 'चित्त' परतत्त्व का चिन्तन करता है— विमर्शन करता है अतः उसे 'चित्त' कहते हैं और यही चित्त उस परमेश्वर के साथ तादात्म्यभावापन्न होकर विमर्शन करता है अतः (मनु अवबोधने—'मन्त्र'; मन्त्र = तृ 'पालने' = मं + त्र) इस विमर्श रूप संवेदन को ही 'मन्त्र' कहा जाता = है। चूँकि चित्त विमर्शन रूप है अतः 'चित्त' भी मन्त्र कहा जाता है—'चित्तं मन्त्रः ।२।१।। चेत्यते विमृश्यते अनेन परं तत्त्वम् इति ।'¹ चित्तं, पूर्णस्फुरत्तासतत्त्वप्रासाद प्रणवादिविमर्शरूपं संवेदनम्, तदेव मन्त्र्यते गुप्तम्, अन्तर भेदेन विमृश्यते परमेश्वररूपम् अनेन इति कृत्वा मन्त्रः ।' सारांश यह कि— परमात्मा के साथ अपनी अभेदापत्तिपूर्वक परमात्मस्वरूप का विमर्शन, तत्स्वरूप आत्मस्फुरत्ता ही 'मन्त्र' है। मन्त्र के दो प्रधान अंग—मन्त्र के दो प्रसिद्ध एवं मुख्य अंग—आचार्य क्षेमराज 'शिवसूत्र विर्शिनी' में ही मन्त्र के दो प्रधान संघटक तत्त्वों पर भी प्रकाश डालते हैं और उनकी नूतन व्याख्या करते हैं। ये निम्न हैं— १. मनन = 'परस्फुरत्तात्मकमननधर्मार्थमता,² २. त्राण = 'भेदमयसंसार-प्रशमनात्मक त्राणधर्मता च अस्य निरुच्यते ।³ मन्त्र के दो पक्ष—१. मननात्मक, २. त्राणात्मक ॥ 'मन्त्र' की चित्त के साथ एकात्मता हो जाने पर चित्त परमेश्वर के साथ सामरस्य हो जाने से चित्त भी 'मन्त्र' है—'मन्त्र-देवता विमर्शपरत्वेन प्राप्ततत्सामरस्यम् आराधकचित्त- मेव मन्त्रः' विचित्रवर्णसंघट्टनमात्र मन्त्र नहीं है—'न तु विचित्रवर्णसंघट्टनमात्रकम् ।'⁴ 'शिवसूत्र' में 'मन्त्र' शाक्तोपाय है। इसीलिए शिवसूत्रकार ने 'मन्त्र' की व्याख्या द्वितीयोन्मेषः 'शाक्तोपाय' के अंतर्गत की है। 'संकेतपद्धति' में मन्त्र को मात्र मनन + त्राण लक्षणों के आधार पर परिभाषित करते हुए कहा गया कि—मननात्त्राणधर्माऽसौ मन्त्रोऽयं परिकीर्तिताः ।' दीपिकाकार (योगिनीहृदयदीपिका) ने भी इसी की पुष्टि की—'मननात्त्रायन्ते साधकमिति मन्त्राश्चि- न्मरीचयः ।' (यो० हृ० पटल २।१) 'योगिनीहृदय' में पराशक्ति को भी 'मन्त्र' का अभिधान दिया गया है। ज्ञातृज्ञानमयाकारमननान्मन्त्ररूपिणी । तेषां समष्टिरूपेण पराशक्तिस्तु मातृका ॥ (मन्त्रसंकेतः २०) मन्त्र के अवयव (प्रणव की कलायें) ┌─────┬─────┬─────┬─────┬─────┬─────┬─────┐ बिन्दु नाद अर्धचन्द्र निरोधिनी नादान्त व्यापिनी समना उन्मना ─────────────────────── १-४. शिवसूत्रविमर्शिनी ।