भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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९० स्पन्दकारिका 'अहंकार' मन्त्र और शिवशक्ति—अद्वयसम्पत्तिकार वामननाथ (विज्ञानभैरव ८८ की व्याख्या)— १. बुद्धि भूमि से ऊपर अहंकार भूमि है। अहंकार—समस्त जगत् में अहन्ता व्याप्त । २. अहंकार भूमि का ज्ञान—मुक्ति ३. अहंकार ही संवित्स्वरूप 'पराशक्ति' है और यही 'ज्ञानशक्ति' भी है। 'मन्त्रशक्ति' के रूप में भी प्रतीत होने लगती है। ४. शिव एवं शक्ति से अभिन्न 'अहंकार' ही 'मन्त्र' है। यही अहंकार अपरिमित अहन्ता के रूप में 'पूर्णाहन्ता' के रूप में विकसित हो जाता है। यहाँ अहंकार सांख्य सम्मत अहंकार से पृथक् है क्योंकि वहाँ क्रम इस प्रकार है—मन-अहंकार—बुद्धि (आरोह क्रमानुसार) । यहाँ 'विमर्शदशा' के अर्थ में ही 'अहंकार' प्रयुक्त है। प्रकाशरूप शिव की इसी विमर्शदशा में समस्त जगत् अन्तर्लीन है। विमर्श शक्ति—अखिल जगत् का उन्मीलन ।। 'विश्वाहन्ता' (विरूपाक्षपञ्चाशिका) = 'पूर्णाहन्ता' का मन्त्र से सम्बन्ध है। योगिनी हृदय एवं मन्त्र—'योगिनी हृदय' में कहा गया है कि इन्द्रियों को संयमित करके आन्तर नाद की भावना करना ही 'जप' है। जप तो मन्त्र का होता है अतः यदि इस अनाहत नाद का ही जप जप है तो सिद्ध हुआ कि 'मन्त्र' अनाहत नाद है— संयमेन्द्रिय संचार प्रोच्चरेन्नादमान्तरम् । एष एव जपः प्रोक्तो न तु बाह्य जपो जपः ॥ हंसः मन्त्र सोऽहं मन्त्र—जीव दशा का स्वाभाविक मन्त्र—'हंसः हंसः' (अजपा गायत्री) जब सुषुम्णा नाड़ी में जब प्राण हृदयाकाश से ऊपर की ओर आरोहण करता है तब 'हम्' वर्ण उत्पन्न होता है और जब वह 'द्वादशान्त' से नीचे की ओर अवरोहण करता है (उतरता है) तब उसकी अपान अवस्था से 'सः' वर्ण उत्पन्न होता है। इन दोनों वर्णों के उच्चारण से प्राणी 'जीवित' कहलाता है। परिमित अहन्ता में स्थित यह जीव अहर्निश 'हंसः हंसः' मन्त्र का जप करता रहता है— सकारेण बहिर्याति हकारेण विशेत् पुनः । हंस हंसेत्यमुं मन्त्रं जीवा जपति नित्यशः ॥ (विज्ञानभैरव ५३) महेश्वरानन्द—सोम और सूर्य (हंकार + सःकार) के अस्त एवं गमन के काल के मध्यवर्ती क्षण का उद्धार करना चाहिए—'अहं सः' के विमर्श का उदय = अहं सः = 'सोऽहं' मन्त्र बन जाएगा। 'मैं वही शिव हूँ' की प्रत्यभिज्ञा (संवित् का स्वस्वरूप) संवित्क्रम में—'अहं सः' 'सोऽहं' मन्त्र बन जाएगा। 'मध्यत्रुटिखुटितव्याऽस्तंगतयोः सोमसूर्ययोस्तर्हि ।' (५६) शैवागमों में षडध्व का क्रम एवं मन्त्र—'वर्ण' 'पद' 'मन्त्र' 'कला' 'तत्त्व' भुवन। यह जगत् वाचक (ग्राहक) के रूप में—'पर' 'सूक्ष्म' एवं 'स्थूल' रूप में क्रमशः—'वर्ण' 'मन्त्र' एवं 'पद' के रूप में विभक्त हो जाता है। जयरथ 'तत्स्वरूपं जपः प्रोक्तो भावाभावपदच्युतः (१।९०) की व्याख्या में कहते