भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 519 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 92

परिचय एवं पृष्ठभूमि ९१ हैं कि शिव के परावाक्स्वभाव, अनाहतनादमय हो वह शक्तिमूलक एवं नादात्मक विशिष्ट वर्ण-संरचना 'मन्त्र' है । मन्त्र और देवता तथा जगत—'वातुलशुद्धाख्यतन्त्र' (५ पटल) में कहा गया है कि मन्त्र देवता एवं जगद्रूप है—मन्त्रस्तु देवता रूपं मन्त्ररूपमिदं जगत्' (५।१) । मन्त्र का स्वरूप क्या है ? 'मननं सर्वपक्षेषु त्राणं संसारसागरात् । मननत्राणधर्मत्वाद् 'मन्त्र' इत्यभिधीयते ।।' (५।७) मन्त्र का प्रभाव—शिव-साक्षात्कार— आह्वानतः स्वनाम्ना तु जनः सन्निहितो यथा । तथा मन्त्रप्रयोगेण शिवः सन्निहितो भवेत् ।। (५।८) क्या 'मन्त्र' वर्ण-रचित पदों की समष्टि है? आचार्य भास्करराय कहते हैं—१. 'माता, विद्या, चक्र, स्वगुरु एवं साधक' इन पाँचों के भेद का अभाव ही मन्त्र का 'कौलिकार्थ' है । इत्थं माता विद्या चक्रं स्वगुरुः स्वयं चेति । पञ्चानामपि भेदाभावो मन्त्रस्य कौलिकार्थोऽयम् ॥ (२।१०२) २. पराभट्टारिका (इष्टदेवी) विद्या, कुण्डलिनी एवं साधक एक दूसरे से अभिन्न हैं—यह विमर्श श्रीविद्या का 'रहस्यार्थ' है । ३. 'चक्र' विद्या के अक्षरों से निर्मित होने के कारण विद्या से अभिन्न है । (९६) ४. अवाङ्मनसगोचर, तत्त्वातीत, महत्तम, अणुतम, व्योमातीत, विश्वाभिन्न चिदानन्द ब्रह्म में अपनी आत्मा का नियोजन ही मन्त्र का 'महातत्त्वार्थ' है । (१०९) ५. प्रत्येक मन्त्राक्षर में अचिन्त्य शक्ति है तथा अक्षरों एवं वामा, इच्छा तथा अन्य शक्तियों में अभेद है यह विमर्श ही मन्त्र का 'शाक्तार्थ' है । (११८) ६. शिव एवं शक्ति के सामरस्य के कारण 'ब्रह्म हीं शिव एवं शक्ति दोनों ही हैं'—यह मन्त्रविद्या का सामरस्यार्थ है । (१२०) मन्त्र के अंग (क) आन्तरिक अंग— मन्त्र के वर्णों की संख्या, उद्धार, मात्रा (काल) उच्चारण, स्थान, प्रयत्न, रूप, स्थितियाँ आकार आदि । (ख) मन्त्र के बाह्यांग—ऋषि, छन्द, देवता, विनियोग, बीज, शक्ति, कीलक, न्यास, ध्यान, नियम एवं पूजा । (वरिवस्यारहस्यम्ः २ अंश।१६१) मन्त्रोत्पत्ति—'कामकला बीज'—मूल मन्त्र का विकास और मूल—शरीर के आन्तरिक एवं बाह्यांगों का विकास (२।१६४) विद्या (मन्त्र) एवं देवी में अभेद है । (वरि० २।९१)