भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 96, कुल 519 में से

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पृष्ठ 96

परिचय एवं पृष्ठभूमि ९५ समस्त मन्त्रों की मूल एवं सर्वोच्चप्रकृति ॐकार है। अर्धमात्रादिक में जो प्रतिफलित चैतन्य है वही ‘मन्त्र’ है, प्रणव या मन्त्र के निम्न अवयव हैं—अकार, उकार, मकार, बिन्दु, अर्धचन्द्र, निरोधिका, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिनी, समना एवं उन्मना। समग्र विश्व की उत्पत्ति शब्द द्वारा ही हुई है एवं समस्त विश्व शब्द में ही विधृत है। शब्दातीत परमपद का साक्षात्कार करने के लिए भी शब्द का आश्रय लेकर ही शब्द राज्य का भेदन करना पड़ता है। सृष्टि से बाहर जाने के लिए भी शब्द ही एक मात्र आलम्बन है। इसीलिए शब्द को पकड़कर शब्दातीत परब्रह्म पद में जाने का विधान किया गया है। प्रश्न—यदि ‘अहंविमर्श’ आत्मस्फुरण, ‘परावाक्’ चित् तत्त्व की मरीचि ही ‘मन्त्र’ है तब तो समस्त बैखरी वाक् भी आत्मस्फुरण, आत्मा, प्रत्यक् चैतन्य एवं परावाक् का विकास है। फिर सारे वर्ण ही मन्त्र पद वाच्य हैं। बैखरी वाक् भी आन्तर विमर्श का ही कार्य है अतः बैखरी के प्रत्येक वर्ण ‘मन्त्र’ हैं। समस्त वर्ण शिवरूप हैं, परस्वरूप हैं और शक्तिस्वरूप हैं ‘सर्वे वर्णात्मका मन्त्रास्ते च शक्त्यात्मकाः प्रिये’। मन्त्रों की आत्मभूता शक्ति होती है उसके बिना मन्त्र निरर्थक होते हैं—‘मन्त्राणां जीवभूता तु या स्मृता शक्तिरव्यया। तया हीना वरारोहे निष्कलाः शरदभ्रवत् ।। (तं० स०, शि० सू० २.१)। ‘स्वात्मरूपतया स्फुरणं भवति’ मन्त्र इसी आत्मस्फुरण का अपर पर्याय है। भट्टकल्लट ‘स्पन्दकारिकावृत्ति’ में कहते हैं कि स्पन्दतत्त्व नामक आत्मबल से तादात्म्य प्राप्त मन्त्र सर्वज्ञता आदि समस्त माहेश्वर बलों से युक्त हो जाते हैं—‘तत् बलं निरावरणचिद्रूपमधिष्ठाय मन्त्राः सर्वज्ञत्वादिन बलेन श्लाघायुक्ताः प्रवर्तन्ते अनुग्रहादौ स्वाधिकारे ।।’ ‘स्पन्दकारिका’ (सहज० २६) मे भी यही कहा गया है— ‘तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञबलशालिनः । प्रवर्तन्तेऽधिकाराय करणानीव देहिनाम् ।। २६ ।।’ ये मन्त्र शान्त (शुद्धसंवित्‌रूप) एवं निरञ्जन (मायिक दूषणों से रहित) होकर आराधकों के साथ-साथ चिदाकाश में ही लीन हो जाते हैं। अतः सारे मन्त्र शिवरूप (शिवधर्मा) हैं— ‘तत्रैव सम्प्रलीयन्ते शान्तरूपाः निरञ्जनाः । सहाराधकचित्तेन तेन ते शिवधर्मिणः ।।’ (२७) मन्त्र देवता विमर्श स्वभाव हैं—‘तद्विमर्शस्वभावा हि वाच्या मन्त्रदेवता ।’ ‘महा- संवित् सम्पन्ना’ ‘मन्त्र’ प्रमातृभूमिगत है—प्रमातृभूमिगता मन्त्राः ।। (मतंगटीका) ‘बौद्धायन संहिता’ नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि ‘चन्द्रमा शान्त हो जाय और सूर्य का उदय भी न हो उस समय समस्त देवताओं (इन्द्रियों) का विलय और समस्त मन्त्रों का उदय होता है।’

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