भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 97

९६ स्पन्दकारिका 'मालिनीविजय' में भी इसी मत की पुष्टि करते हुए कहा गया है कि 'जिस अवस्था में जीव अन्य आधारों से विनिर्मुक्त होकर स्वस्वरूप में लीन हो जाता है वही अवस्था मन्त्रों के उद्भव का स्थान है।' यह भी कहा गया है कि 'जब पुरुष का चित्त धर्माधर्म के संधिस्थल में निरुद्ध हो जाता है तब वह जो कुछ भी बोलता है वही 'मन्त्र' हो जाता है। स्वरवर्ण-मातृका से निर्मित मन्त्र ही मन्त्र नहीं होते ॥' १. रामकण्ठाचार्य ने तो 'स्पन्दकारिका विवृत्ति' (२ नि० १०-११) में मन्त्र को वर्ण-संनिवेश कहा है—'मन्त्रा आराध्यदेवतावाचका वर्णादिसंनिवेशः ॥' २. रामकण्ठ पुनः कहते हैं कि—यदि साधक का चित्त मन्त्रात्मक हो जाता है तो वर्णसंकल्प आदि स्वरूप धारण करके शिवशक्ति ही मन्त्र के रूप में उदित होती है— 'मन्त्रात्मकतया साधक चित्तात्मकतया च शिवशक्तिरेव वर्णसंकल्पादिरूपधारिणी उदिता ॥' क्योंकि मन्त्रचेता एवं शिव में अभेद स्थापित हो जाता है—'मन्त्रचेतसोः उदया- स्तमदशयोः परमकारणात् शिवाद्भेदः ॥' ३. 'कुलार्णव तन्त्र' में कहा गया है कि—'तत्त्वरूप', 'तेजस्वरूप' देवता का मनन करने से जो शक्ति समस्त भयों से मुक्त कर देती है उसे मन्त्र कहते हैं— 'मननात्तत्त्वरूपस्य देवस्यामिततेजसः । त्रायते सर्वभयस्तस्मान्मन्त्र इतीरितः ॥' 'यम भूतादि सर्वेभ्यो भयेभ्योऽपि कुलेश्वरि । त्रायते सततञ्चैव तस्मान्मन्त्र इतीरितः ॥' ४. जो मनन करने से त्राण करने वाले हैं वे 'मन्त्र' कहलाते हैं 'मननत्राणधर्माणो मन्त्राः' । ५. चित्तं मन्त्रः' (शिवसूत्रः ३।१) (मन्त्र का आध्यात्मिक स्वरूप) ६. संवित् तत्त्व ही मन्त्र हैं—संविद्देव्येय मन्त्रः (क्रमकेलि)। 'देव्ये मन्त्र'— भूतिराज । ७. चिदग्नि संहार मरीचिमन्त्रः संविद्विकल्पान् ग्लपयन्नुदेति (स्तोत्रभट्टारक) ८. वर्णात्मको न मन्त्रो दशभुजदेहो न पञ्चवदनोऽपि । संकल्पपूर्वकौटौ नादो- ल्लासो भवेन्मन्त्रः ॥ (स्तोत्रभट्टारक) ९. 'नास्ति नादात् परो मन्त्रः' । १०. मन्त्रः पदार्थादयसंरम्भात्मा परामर्शः ॥' (महार्थमंजरी परिमल) मन्त्र शक्ति एवं उसका स्वरूप—स्पन्दप्रदीपिकाकार का अभिमत— (क) मन्त्र में चार मुख्य तत्त्व होते हैं—१. 'बीज' २. 'पिण्ड' ३. 'पद' और ४. 'नाम' । (ख) मन्त्र का मुख्य धर्म है—१. मनन एवं २. त्राण ।