स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिचय एवं पृष्ठभूमि ९७ (ग) मन्त्र का बल है—निरावरण चित् का उल्लास अर्थात् पराशक्ति का उल्लास। उसी शक्ति को लेकर 'मन्त्र' सहज नाद शक्ति से उद्बोधित होकर प्रदीप्त हो उठते हैं और उनमें सर्वज्ञता आदि का बल आ जाता है। जब सिद्धमन्त्री उनका प्रयोग करता है तब वे अनुग्रह एवं निग्रह करने में भी समर्थ हो जाते हैं। आत्मा के पर तत्त्व का अवबोध होने के कारण मन्त्रज्ञ इच्छामात्र द्वारा मन्त्रो का यथेष्ट प्रयोग कर सकता है। 'त्रिकसार' में इसी संदर्भ में कहा गया है कि—'वर्णातीत निराकार परम तत्त्व का अवबोध हो जाने पर 'मन्त्र' मन्त्राधियों के साथ ही मांत्रिक के किंकर हो जाते हैं।' चिच्छक्ति के बल का संस्पर्श न होने पर वे मन्त्र केवल वर्ण मात्रा (जडअक्षर) मात्र बनकर रह जाते हैं और कठपुतली के समान निष्फलचेष्ट रहते हैं। (घ) 'हंस पारमेश्वर' नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—केवल वर्णरूपमन्त्र 'पशु- भाव' में स्थित हैं जबकि सुषुम्नामार्ग से उच्चारित होने पर वे 'पशुपति' बन जाते हैं और इस प्रकार मन्त्र की दो अवस्थायें है—१. 'पशु अवस्था' २. 'पशुपति अवस्था'। (ङ) शाक्तमार्ग में ही मन्त्रों की सफलता है—मन्त्र का प्रयोग केवल शक्ति के संदर्भ में ही करना चाहिए क्योंकि वही जप सफल होता है। (च) 'श्रीवैहायसी' नामक ग्रन्थ में निर्देश दिया गया है कि—'सन्धिसथल में नादोर्ध्वध्वनि द्वारा बोधित जप करना चाहिए। जिस प्रकार सूत्र में मणि पिरोये रहते हैं उसी प्रकार शक्ति के ताने-बाने से निर्मित मन्त्राक्षरों का ही ध्यान करना चाहिए। वह शक्ति परम व्योम में निवास करती है और परमामृत से समृद्ध है। उक्त पद्धति से जप करने पर 'मन्त्र' अपना स्वस्वरूप उद्घाटित कर देता है और अपने ऊपर से आवरण हटा देता है। (छ) 'श्रीकालपरा' नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—शब्द नादात्मक हैं अतएव उनके साथ प्रत्यय, संवित् संलग्न रहता है और उनमें वृद्धि करता रहता है मन्त्र बोध के स्वरूप में स्थित जो संवित् है वह मन्त्र से अभिन्न है। अतः वह आत्म बोध भी करा देती है। (ज) 'संकर्षण सूत्र' में कहा गया है कि—'चिद्रूपता स्वात्मैकनिष्ठ है। भाव एवं अभाव उसकी दशाएँ एवं परिष्कार हैं। वह स्वसंवेदनसंवेद्य है। वह प्रकृति का विषय भी है और प्रकृति से अतीत भी है यही मन्त्रों का प्रत्ययात्मक कारण है। मन्त्र बाहर एवं भीतर वर्णरूप से प्रकट होते हैं। वे शाश्वत पदरूप मन्त्र मनुष्य के करचरणादिक के समान हैं। वीर्य का योग होने पर प्रत्येक काल में (प्रयोग करने पर) सिद्ध होते हैं। शुद्ध बोधात्मक रूप से अन्तर्बाह्य दोनों में उदित मन्त्र का एक बार भी 'जप' कर लिए जाने पर वह लक्ष बार किये गए जप के समान फल वाला हो जाता है। इसीलिए 'जपसंहिता' में कहा गया है कि—जब एक ही मन्त्रनाथ अन्तर एवं बाह्य दोनों में उदित होकर एक हो जाता है तब ऐसे जप को लक्षसंख्या से भी अधिक महनीय समझना चाहिए।। इन समस्त भावों एवं सिद्धान्तों को स्पन्दकारिकाकार मे इस प्रकार व्यक्त किया है— 'तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञबलशालिनः । प्रवर्तन्तेऽधिकाराय करणानीव देहिनः ॥' स्पं.भू. ६