स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९८ स्पन्दकारिका (झ) ये मन्त्र साधक चित्त की प्रवृत्ति-निवृत्ति के निमित्त (साधक की इच्छा होने पर) शक्ति स्वस्वभाव में लीन हो जाते हैं क्योंकि मन्त्र स्वस्वभाव के अनुगामी एवं शक्तिरूप हैं । 'कालपरा' नामक ग्रन्थ भी इसकी पुष्टि करता है । तदनुसार पर अक्षर रूप विटप में अनेक शक्तियाँ विद्यमान हैं । उनके विवर्त शक्ति के रूप में वर्णों के माध्यम से प्रकट होते हैं (वर्णों में प्रकट होते हैं) । ये शक्तियाँ कृतकृत्य होने के कारण शान्त एवं निरञ्जन (कालुष्यरहित) हैं । मन्त्र सर्वज्ञ एवं सर्वकर्ता हैं । मन्त्र शिवधर्मी हैं । आचार्य कल्लट ने 'स्पन्दकारिका' में इसकी पुष्टि की है— 'तत्रैव सम्प्रलीयन्ते शान्तरूपाः निरञ्जनाः । सहसाधकचित्तेन तेन ते शिवधर्मिणः ॥' (ञ) 'साधक के चित्त में मन्त्र लीन हो जाते हैं'—'तत्रैव सम्प्रलीयन्ते' कहने का तात्पर्य यह है कि आत्मा ही शिव है । यह आत्मा सर्वमय, सर्वात्मक विश्वरूप है क्योंकि यह बोद्धा है । संवित् ही मन्त्रात्मा है अतः मन्त्र शिवरूप है । स्पन्दप्रदीपिकाकार कहते हैं कि—१. मन्त्रों में स्पन्दात्मक बल स्वभाव से ही अन्तर्निहित है । अशुभविकल्प—स्वात्मशक्तियों का लोप या अज्ञान । २. आत्मबल की विस्मृति की अवस्था में मन्त्र वीर्यहीन हो जाते हैं । ३. स्वरूप की स्पन्दमयता का निरन्तर अनुसंधान करने से ही मन्त्र शक्ति की अनुभूति होती है । ४. आन्तर अनुसंधान में प्रगाढ़ता आने पर मन्त्रोच्चारण मात्र से अभीष्ट सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं । ५. मन्त्रशक्ति स्वात्मस्वरूप में ही स्फुरित होती है । ६. चित्त-नैर्मल्य—आन्तर अनुसंधान की शक्ति-प्राप्ति और निर्मल चित्त में ही स्वरूप का प्रकाश प्रतिबिम्बित । विकल्प संस्कार— भावशुद्धि, शुद्धविद्योदय, अशुभ विकल्पों का नाश, —मन्त्रशक्ति की अनुभूति । ७. समस्त वर्ण ही मन्त्र हैं और वे शक्त्यात्मक है—सर्वे वर्णात्मकाः मन्त्रास्ते च शक्त्यात्मकाः प्रिये (तं०स०) ८. मन्त्रों में एक शक्ति निहित होती है । जो मन्त्र शक्ति- रहित होते है वे निष्फल होते हैं—मन्त्राणां जीवभूता तु या स्मृता शक्तिरव्यया । तया हीना वरारोहे निष्फलाः शरदभ्रवत् ॥ ९. शक्ति मन्त्रवीर्यस्फार है—'शक्तिः मन्त्रवीर्यस्फाररूपा' (शिवसूत्र) मन्त्रशक्ति स्वात्मरूप में ही स्फुरित होती है । 'मन्त्र'— आत्मस्फुरण के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है । आत्मस्पन्दन ही मन्त्र भी है । आत्मस्पन्दन या 'विमर्श' प्रत्येक भाव की आत्मा (हृदय) है—'हृदयं च नाम प्रतिष्ठा स्थानमुच्यते, तच्च उक्तनीत्या जडानां चेतनम्' तस्यापि प्रकाशात्मकम्, तस्यापि विमर्शशक्तिः इति विश्वस्य परमे पदे तिष्ठतो विश्रान्तस्य इदमेव हृदयं विमर्शरूपं परमन्त्रात्मकं यत्र यत्र अभिधीयते (ई०प्र०वि०) ।