श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४० ) जायगी तो उस धर्म का स्वरूप से भी भेद मानना पडेगा (क्योकि धर्म और धर्मी मे भेद होता है), अन्यथा भेद ही वस्तु का स्वरूप हो जायेगा, और फिर भेद मे भेद होते चले जायेगे जिससे अव्यवस्था (गडबड़ घोटाला) हो जायगी। घट आदि एक जाति मे शुक्लना आदि विशेष गुणो के आधार पर ही उनके स्वरूपगत भेद की प्रतीति होती है उस भेद प्रतीति से ही जाति विशिष्ट वस्तु का ज्ञान होता है—इस प्रकार अन्योन्याश्रय दोष घटित होता है। इस तरह भेद का विवेचन दुरूह है, [स्वरूप, जाति आदि भेदो को एक मिथ्या भ्रान्ति ही मानना चाहिए] वस्तुतः सत् वस्तु ही प्रत्यक्ष लब्ध है [समस्त विभिन्नताये उसी की रूपान्तरमात्र है] किं च—घटोऽस्ति पटोऽस्ति, घटोऽनुभूयते पटोऽनुभूयते इति सर्वे पदार्थाः सत्तानुभूतिघटिता एव दृश्यन्ते । अत्र सर्वासु प्रतिपत्तिषु सन्मात्रमनुवर्तमानं दृश्यत इति तदेव परमार्थं । विशेषास्तु व्यावर्त्त- मानतया अपरमार्था. रज्जुसर्पादिवत् । यथा रज्जुरधिष्ठानतयाऽनु- वर्त्तमाना परमार्थसती; व्यावर्त्तमानास्सर्फभूदलनाम्बुधारादयो अपरमार्था. । घट है-पट है, घट की अनुभूति होती है-पट की अनुभूति होती है इस प्रकार सभी पदार्थ अस्तित्व और अनुभवगम्य प्रतीत होते है। इन सबकी प्रतीति मे एक अस्तित्ववान् सन् वस्तु अनुस्यूत है, ऐसा निश्चित है; वह अनुस्यूत सत् ही परमार्थ है, यह मानना चाहिए। बाकी जो वस्तु- गत विशेषतायें है, जो कि एक दूसरे से भिन्न प्रतीति कराने वाली है; वे सब, रज्जु सर्प की तरह मिथ्या है। जैसे कि सर्प की अधिष्ठान रज्जु सत्तावाली होने से सत्य मानी जाती है तथा परिवर्तन शील सर्प, भू भ्रं श रेखा और जलधारा आदि भ्रामक होने से असत्य माने जाते हैं। ननु च रज्जुसर्पादौ रज्जुरियं न सर्प इत्यादिरज्वाद्यधिष्ठा- नयाथाथ्र्यज्ञानेन बाधितत्वात् सर्पादिरपारमार्थ्यम्, न व्यावर्तमान- त्वात्, रज्वादेरपि पारमार्थ्यं नानुवर्त्तमानतया, किन्तु अबाधितत्वात्। अत्र त घटादीनामबाधितानां कथमपारमार्थ्यम् ?