श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(आपत्ति) आपने जो रज्जुसर्प का उदाहरण प्रस्तुत किया उसमें तो-"यह रज्जु है सर्प नही" इत्यादि अवगति मे रज्जु आदि अधिष्ठान के यथार्थ ज्ञान हो जाने पर सर्प आदि सबंधी असत्य भ्रान्ति का निरा करण हो जाता है,परिवर्तन शील होने से उक्त भ्रान्ति का निराकरण होता हो सो तो है नही । रज्जु आदि की जो यथार्थ रूप से सर्व प्रतीति है,वह सत्तात्मक नही है अपितु अबाधित है (अर्थात सर्पाकृति रज्जु मे जिस समय सर्प प्रतीति होती है, उस समय यथार्थ ज्ञान रूपी बाधा तो उपस्थित होती नही जिससे रज्जु की रज्जुता का ज्ञान हो सके उस समय तो रज्जु मे सर्प की ही यथार्थ प्रतीति होती है जो कि तात्कालिक भ्रान्तिमात्र है) पर घट आदि वस्तुओ मे जो भिन्नता की प्रतीति होती है वह तो नितान्त अबाधित है (अर्थात इसमे तो रज्जु मे सर्प प्रतीति की भांति कोई दूसरी प्रकार की प्रतीति होती नही जो बाध्य होने पर भ्रान्त सिद्ध हो सके' यहाँ तो प्रारंभ से अ त तक घट मे घट की ही प्रतीति होती है) इसलिए इन पदार्थों की भेद प्रतीति को कैसे मिथ्या कहते है ? उच्यते-घटादौ दृष्टा व्यावृत्तिः सा किंरूपेति विवेचनीयम् । किं घटोऽस्तीत्यत्र पटाद्यभावः ? सिद्धं तर्हि घटोऽस्तीत्यनेन पटा- दीनां बाधितत्वम्; अतो बाधफलभूता विषयनिवृत्तिर्व्यावृत्तिः । सा व्यावर्तमानानामपारमार्थ्यं साधयति । रज्जुवत्सन्मात्रमबाधितम- नुवर्त्तते । तस्मात्सन्मात्रातिरेकि सर्वमपरमार्थः । प्रयोगश्च भवति- सत् परमार्थः, अनुवर्त्तमानत्वात्, रज्जुसर्पादौ रज्ज्वादिवत् , घटाद- योऽपरमार्थाः व्यावर्तमानत्वात्, रज्जवाद्यधिष्ठान सर्पादिवत् इति । एवं सति अनुवर्त्तमानाऽनुभूतिरेव परमार्था, सैव सती । (उक्त आपत्ति का निराकरण) घट आदि में दीखने वाली भिन्नता किस प्रकार की है,यह विवेचनीय विषय है । "घट है" ऐसी प्रतीति में, क्या पट आदि के अभाव का बोध होता है? यदि ऐसी बात है तो,,- "घट है" इतना कहने से ही पट आदि के अस्तित्व में बाधा उपस्थित हो जाती है,जिससे निष्कर्ष निकलता है कि-पटादि विषयक निषेधात्मक जो व्यावृत्ति (भिन्नता ) है वह घट आदि की बाधता के फल स्वरूप ही