भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ४२ ) जो कि पट आदि की व्यावर्त्तमान असत्यता को व्यक्त करती है। रज्जु की तरह अबाधित सत्ता मात्र का अनुवर्त्तन (अनुसरण) करती है (कोई नई बात तो करती नही) इससे सिद्ध होता है कि-“सत्” के अतिरिक्त बाकी सब कुछ असत्य है। ऐसा कहा भी जाता है कि-“सत्” ही एक मात्र सत्य है, इसी की हर जगह अनुवृत्ति होती है, जैसे कि रज्जु सर्प में रज्जु सत्ता की अनुवृत्ति है। घट आदि पदार्थ मिथ्या है, क्यो कि वे भी रज्जु आदि आश्रयो मे व्यावर्तितं सर्प की भाति व्यावर्त्तमान है। इस से निष्कर्ष निकलता है कि वस्तु में होने वाली अनुभूति वास्तविक सत्य है, और वही सत् है। ननु च-सन्मात्रमनुभूतेर्विषयतया ततो भिन्नम्। नैवम्; भेदो हि प्रत्यक्षाविषयत्वादुर्निरुपत्वाच्च पुरस्तादेव निरस्तः। अत एव सतोऽनुभूतिविषयभावोऽपि न प्रमाणपदवीमनुसरति; तस्मात्सदनु- भूतिरेव। सा च स्वतः सिद्धा अनुभूतित्वात्। अन्यतः सिद्धौ घटा- दिवदननुभूतित्वप्रसंगः। किं च अनुभवापेक्षा चानुभूतेर्न शक्या कल्पयितुम, सत्तयैव प्रकाशमानत्वात्। न हि अनुभूतिर्वर्त्तमाना घटादिवदप्रकाशा दृश्यते येन परायतप्रकाशाऽभ्युपगम्येत। (आपत्ति) यदि आपके मत से एकमात्रसत् ही अनुभूति का विषय है तब वह भिन्न रूप वाला ही है (क्योकि-जागतिक अस्तित्व वाले पदार्थों मे भिन्नता का प्रत्यक्ष अनुभव होता है) (निराकरण) ऐसी बात नही है; प्रत्यक्ष का अविषय तथा दुर्बोध होने से भेद का निराकरण पहले ही किया जा चुका है। सत् अनुभूति का विषय होते हुए भी प्रमाणित नही किया जा सकता, सत् की अनुभूति ही उसका स्वतः प्रमाण है क्योंकि उसकी अनुभूति होती है यदि सत् की अनुभूति अन्य प्रमाणों से सिद्ध होने लगे तो उसकी घट आदि स्थूलों की सी अनुभूति होगी, जो कि उसके अपने वास्तविक स्वरूप से नितान्त विपरीत होगी। अस्तित्त्व की अनुभूति अपनी सत्ता से ही स्वयं प्रकाशित होती है, इसके लिए अन्य प्रकार की अनुभूति की कल्पना भी शक्य नही है। घट आदि की अनुभूति की तरह, इस अनुभूति का प्रत्यक्ष प्रकाश ankurnagpal108@gmail.com