भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 105, कुल 696 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 105

( ४३ ) भी नहीं होता, जिससे उसके प्रकाश को परायत (पराश्रित) कहा जा सके। अथैवं मनुषे—उत्पन्नायामप्यनुभूतौ विषयमात्रमवभासते घटो- ऽनुभूयते इति। न हि कश्चिद् घटोऽयमिति जानन् तदानीमेवाविषय- भूतामनिदम्भावामनुभूतिमप्यनुभवति । तस्माद् घटादिप्रकाशानि- ष्पत्तौ चक्षुरादिकरणसन्निकर्षवदनुभूतेः सद्भाव एव हेतुः । तदन- न्तरमर्थगतकादाचित्कप्रकाशातिशयलिंगेनानुभूतिरनुमीयते । यदि ऐसा मानें कि—अनुभूति के होने पर केवल विषय की ही प्रतीति होती है, जैसे कि घट अनुभूत होता है, सो तो है नहीं। घट की अनुभूति में नेत्र आदि इन्द्रियों का संपर्क रहता है वैसा इस अलौकिक सद् अनुभूति में तो होना नहीं यह तो अतीन्द्रिय अनुभूति है, इसका अस्तित्व मात्र ही अवभासित होता है। घट आदि अनुभूतियों से विल- क्षण, जागतिक पदार्थों के क्रियाकलापों के अन्दर ही आकस्मिक अलौकिक प्रकाश के रूप में सत् की अनुभूति की अनुमिति होती है। एवं तर्हि अनुभूतेरजडाया अर्थवज्जडत्वमापद्यत इति चेत्; किमिदमजडत्वं नाम ? न तावत् स्वसत्तायाः प्रकाशाकाभिचारः, सुखादिष्वपि तत्संभवात्, नहि कदाचिदपि सुखादयस्सन्तो नोपल- भ्यन्ते, अतोऽनुभूतिः स्वयमेव नानुभूयते, अर्थान्तरं स्पृशतोऽङ्गुल्यग्रस्य स्वात्मस्पर्शवदशक्यत्वादिति । यदि कहो कि उक्त मत स्वीकारने से, घट आदि विषयों की तरह, चिन्मय अनुभूति भी जड़ हो जायगी तो उसकी अजड़ता (चिन्मयता) का स्वरूप क्या है ? स्वयं प्रकाशित शुद्ध अस्तित्व को तो चिन्मयता कह नहीं सकते, यदि ऐसा मानेंगे तो सुखादि में भी चिन्मयता की संभावना हो जायेगी; सुख आदि अनुभूतियाँ कभी भी अनुपलब्ध तो होती नहीं (उनकी तो सदा उपलब्धि होती है) अनुभूति स्वयं ही अपना भान नहीं कर पाती जैसे कि-अंगुली के अग्रभाग से समस्त पदार्थों की स्पर्शानुभूति होती है, पर स्वयं अपने को स्पर्श करने की क्षमता अंगुली में नहीं होती । ankurnagpal108@gmail.com