श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४५ ) सेयं स्वयंप्रकाशाऽनुभूतिर्नित्या च, प्रागभावाद्यभावात् । तदभावश्च स्वतस्सिद्धत्वादेव । न हि अनुभूतेः स्वतस्सिद्धायाः प्रागभावः स्वतोऽन्यतो वाऽवगन्तुं शक्यते । अनुभूतिः स्वाभावमवग- मयन्ती, सती तावन्नावगमयति । तस्याः सत्त्वे विरोधादेव तदभावो नास्तीति कथं सा स्वाभावमवगमयति ? एवमसत्यपि नावगमयति, अनुभूतिः स्वयमसती स्वाभावे कथं प्रमाणं भवेत् । नाप्यन्यतोऽव- गन्तुं शक्यते, अनुभूतेरनन्यगोचरत्वात् । अस्याः प्रागभावे साधयत् प्रमाणम् “अनुभूतिरियम्” इति विषयीकृत्य तदभावं साधयेत् । स्वतस्सिद्धत्वेन इयमिति विषयीकारानर्हत्वात्, न तत्प्रागभावोऽन्यतः शक्यावगमः, अतो अस्याः प्रागभावाभावात् उत्पत्तिर्न शक्यते वक्तुम् इति, उत्पत्ति प्रतिबद्धाश्चान्येऽपि भावविकारास्तस्या न सन्ति । ऐसी स्वयं प्रकाशा अनुभूति नित्या है क्योंकि इसमें प्रागभाव आदि अभावों का अभाव है। यह स्वतः सिद्ध है, इसीलिए इसमें किसी प्रकार के अभाव नहीं हैं। स्वतः सिद्ध अनुभूति का प्रागभाव,स्वयं यां किसी अन्य साधन से जाना नहीं जा सकता। अनुभूति अपने अभाव को जानती हुई भी स्वयं उतना नहीं जानती । क्योंकि, अनुभूति के अस्तित्व में तो उसका अभाव रहता नहीं,इसलिए वह अपने अभाव को जाने भी कैसे? इसी प्रकार वह अपने अनस्तित्व को भी नहीं जान सकती। अनुभूति जब स्वयं अस्तित्व हीन होती है उस समय अपने अभाव को प्रमाणित भी कैसे कर सकती है ? उसके अभाव को किसी अन्य साधन से भी नहीं जान सकते, क्यों कि-अनुभूति किसी अन्य से ज्ञेय नहीं है । कोई भी प्रमाण इसके प्राग- भाव को बतलाने के प्रथम “वह अनुभूति है” ऐसा अस्तित्व का अनुभव करके ही उसका अभाव बतला सकता है; पर जो स्वयं सिद्ध वस्तु है, उसे “यह” कहकर संबोधित करना भी शक्य नहीं है । इसलिए अनुभूति के प्रागभाव को अन्य किसी भी प्रमाण से प्रमाणित नहीं कर सकते । इस प्रकार जब इसका प्रागभाव ही नहीं सिद्ध होता, तो इसकी उत्पत्ति की बात भी कैसे कही जा सकती है, और जब इसकी उत्पत्ति असिद्ध हो जाती है, तब अन्य