श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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(वृद्धिक्षय आदि) होने वाले विकार भी इसमें नहीं है यह भी निश्चित बात है । अनुत्पन्नेयमनुभूतिरात्मनि नानात्वमपि न सहते, व्यापक- विरुद्धोपलब्धेः । न हि अनुत्पन्नं नानाभूतं दृष्टम् । भेदादे. ।मनुभा- व्यत्वेन च रूपादेरिवानुभूतिधर्मत्वं न संभवति, अतोऽनुभूतेरनुभव- स्वरूपत्वादेवान्योऽपि कश्चिदनुभाव्यो नास्या धर्मः यतो निद्धू ्तनि- खिलाभेदा संवित् । अतएव नास्याः स्वरूपातिरिक्त आश्रयो ज्ञाता नाम कश्चिदस्तीति स्वप्रकाशरूपा सैवात्मा अजडत्वाच्च । अना- त्मत्वव्याप्तं जडत्वं संविदि व्यावर्तमानमनात्मत्वमपि हि संविदि व्यावर्तयति । जन्म रहित यह अनुभूति अपने मे अनेकता भी नही सह सकती' क्योकि अनेकता होने से उसकी व्यापक उपलब्धि से विरुद्धता होती है । जन्म रहित वस्तु की अनेकता देखी भी नही जाती । अनुभव से होने वाले भेद आदि की, रूप रस आदि की