भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ४७ ) पिण्डात्माभिमानवत् ज्ञातृत्वमपि अध्यस्तम् । ज्ञातृत्वं हि ज्ञानक्रिया- कर्तृत्वम्, तच्च विक्रियात्मकं जडं विकारिद्रव्याहंकारग्रन्थिस्थम् अविक्रिये साक्षिणि चिन्मात्रात्मनि कथमिव संभवति ? (शं०- "मैं जानता हूं" ऐसी ज्ञातृता तो प्रतीति सिद्धा है (फिर कैसे कहते हैं कि-अनुभूति स्वयं सिद्ध वस्तु है, किसी अन्य से ज्ञेय नहीं है ?) (समाधान) बात ऐसी नहीं है सीप के टुकड़े में जैसी चांदी की भ्रांति होती है, वैसी ही" मैं जानता हूं" इस प्रतीति में आत्मज्ञान की भ्रांति होती है । आत्मा में स्वतंत्र अनुभूति करने का अभाव है । मैं मनुष्य हूं" ऐसी जो प्रतीति होती है, वह आत्मा से अत्यन्तभिन्न, मनुष्यता आदि विशिष्ट गुणों से युक्त पांचभौतिक शरीर में होती है जो कि वस्तुतः आत्मा नहीं है; शरीर में अहं की प्रतीति आत्माभिमान मात्र है जो कि भ्रांति है । उसी तरह" मैं जानता हूं" यह प्रतीति भी मिथ्या भ्रांति है । ज्ञान क्रिया कर्तृत्व ही तो ज्ञातृता है, जो कि विक्रियात्मक, जड, विकारी द्रव्य अहंकार ग्रन्थि में स्थित है, अविकृत साक्षिस्वरूप चिन्मात्र आत्मा में ऐसी विकृत ज्ञातृता कैसे संभव है ? (अर्थात विकारी अहंकार ग्रन्थि में स्थित ज्ञातृता अनात्म है, इसलिए वह भ्रांत और अप्रामाणिक है । अनुभूति आत्म स्वरूप है अतः वही सत्य और प्रामाणिक है) दृश्याधीनसिद्धित्वादेव रूपादेरिव कर्तृत्वादेर्नात्मधर्मत्वम् सुषुप्ति- मूर्च्छादौ अहं प्रत्ययापाये अपि आत्मानुभवदर्शनेन नात्मनोऽहंप्रत्यय- गोचरत्वम् । कर्तृत्वेऽहंप्रत्ययगोचरत्वे चात्मनोऽभ्युपगम्यमाने देहस्येव जडत्वपराक्त्वानात्मकत्वादिप्रसङ्गो दुष्परिहरः । अहंप्रत्यय- गोचरात् कर्तृतया प्रसिद्धात् देहात् तत्क्रियाफलस्वर्गादेः भोक्तुः आत्मनोऽन्यत्वं प्रामाणिकानां प्रसिद्धमेव । तथाऽहमर्थात् ज्ञातुरपि विलक्षणः साक्षी प्रत्यगात्मेति प्रतिपत्तव्यम् । ज्ञानाधीन रूप रस आदि की प्रतीति जैसे आत्मा का धर्म नहीं है वैसे ही ज्ञानाधीन प्रतीति के विषय कर्तृत्व आदि भी आत्मा के धर्म नहीं है । सुपुप्ति, मूर्च्छा आदि अवस्थाओं में "अहं" प्रत्यय का अभाव रहने ankurnagpal108@gmail.com