श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४८ ) से आत्मानुभूति नहीं होती, इससे स्पष्ट है कि “अहं” प्रतीति का विषय आत्मा नही है । आत्मा में कर्तृंता, अहं प्रतीति विषयता, मानने से देह की तरह जडता, वाह्यपदार्थता और अनात्मता आदि दोष उसमें घटित हो जावेंगे, जिन्हें उसमें से अलग करना कठिन हो जायेगा अहं बुद्धि के विषय, कर्त्ता रूप से प्रसिद्ध देह से, उसकी क्रियाओं के फलस्वरुप प्राप्त होने वाले स्वर्गादि फलो के भोक्ता आत्मा का, जो प्रभेद है, उसे प्रमाग ज्ञाता लोग जानते ही है उसी प्रकार "अह" अर्थात ज्ञाता(अहंकार)से भी विलक्षण, साक्षी प्रत्यगात्मा (जीव) है, ऐसा जानना चाहिए । एवमविक्रियाऽनुभवस्वरूपस्यैवा।भिव्यंजको जडोऽप्यहंकारः स्वाश्रयतयातमभिव्यनक्ति । आत्मस्थतयाऽभिव्यंग्याभिव्यंजनमभिव्यं- जकानां स्वभावः । दर्पणजलखंडादिर्हि मुखचंद्रबिंबगोत्वादिकं आत्मस्थतयाऽभिव्यनक्ति । तत्कृतोऽयंजानाम्यहमिति भ्रमः । स्वप्रकाशाया अनुभूतेः कथमिव तदभिव्यंग्यजडरूपाहंकारेण अभि- व्यंगत्वमिति मावोचः, रविकरनिकराभिव्यंग्यकरतलस्य तदभिव्यं- जकत्वदर्शनात् जालकरंध्रनिष्क्रान्त द्युमणिकरणानां तदभिव्यंगेनापि करतलेन स्फुटतरप्रकाशो हिद्रष्टचरः । यतोऽहं जानामीति ज्ञाताऽय- महंमर्थः चिन्मात्रात्मनो न पारमार्थिको धर्मः । अतएव सुषुप्ति- मुक्त्योः न अन्वेति । तत्र हि अहमर्थोल्लेखविगमेन स्वाभाविका- नुभवमात्ररूपेण आत्माऽवभासते । अतएव सुप्तोत्थितः कदाचिन्मा- मप्यहं न ज्ञातवानिति परामृशति, तस्मात् परमार्थतो निरस्त- समस्तभेद विकल्पनिर्विशेष चिन्मात्रैकरसकूटस्थ नित्य संविदेव भ्रान्त्या ज्ञातृज्ञेयज्ञान रूप विविध विचित्रभेदा विवर्त्तत इति, तन्मूलभूता अविद्या निवहंणाय नित्य शुद्धबुद्धमुक्त स्वभाव- ब्रह्मात्मैकत्व विद्या प्रतिपत्तये सर्वे वेदान्ताः आरभ्यन्ते इति । इसी प्रकार अविकृत अनुभव के स्वरूप का अभिव्यंजक, अहंकार स्वयं जड होते हुए भी, अपने आश्रय से उस अनुभव को, अभिव्यक्त ankurnagpal108@gmail.com