श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५० ) महासिद्धान्त ( शांकरमत निरसन ) उपनिषद प्रतिपाद्य परम पुरुष की प्राप्ति हेतु उनके गुण ही है' अनादि पाप वासना से दूषित' खोखली बुद्धि वाले लोग ही उन्हें 'निर्गु ण मानकर' शास्त्र वचनों की साररहित, कुतर्क पूर्ण काल्पनिक व्याख्या करते है; उन्हें शास्त्र के प्रकृत पद, वाक्य, वाक्यार्थ तात्पर्य, प्रत्यक्ष आदि प्रमाण और तज्जन्य ज्ञान के रूप और उनकी इतिकर्त्तव्यता आदि का यथार्थ ज्ञान नहीं रहता । जो लोग न्यायानुसार समस्त वाक्य और प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से लब्ध ज्ञान के यथार्थ मर्म को जानते है, उनकी दृष्टि मे उनका मत अनादरणीय है । तथा हि निर्विशेषवस्तुवादिभिर्निविशेषे वस्तुनि इदं प्रमाणम् इति न शक्यते वक्तुम् । सविशेषवस्तु विषयत्वात् सर्व प्रमाणानाम् । यस्तु स्वानुभवसिद्ध इति स्वगोष्ठी निष्ठः समयः सोऽप्यात्मसाक्षिक सविशेषानुभवादेव निरस्तः । इदमहमदर्शमिति केनचिद् विशेषेण विशिष्टविषयत्वात् सर्वेषामनुभवानां स विशेषोऽप्यनुभूयमानोऽनुभवः केनचिद् युक्त्याभासेन निर्विशेष इति निष्कृष्यमाणः सत्ताऽतिरेकिभिः स्वासाधारणैः स्वभावविशेषैः निष्कृष्टव्यः, इति निष्कर्ष हेतुभूतैः सत्ताऽतिरेकिभिः स्वासाधारणैः स्वभावविशेषैः सविशेष एवाव- तिष्ठते । अतः कैश्चिद् विशेषैर्विशिष्टस्यैववस्तुनोऽन्ये विशेषा निर- स्यंत इति न क्वचिन्निर्विशेषवस्तु सिद्धिः । निर्विशेष वस्तु का प्रतिपादन करने वाले, निर्विशेष की वस्तु सिद्धि में" अमुक प्रमाण है" ऐसा नही कह सकते । क्यों कि-शास्त्र के समस्त प्रमाण सविशेष वस्तु परक ही हैं। और जो उस निर्विशेष वस्तु को" स्वानुभव सिद्ध" ही अपने मत का परम्परित सिद्धान्त बतलाते हैं, वह भी आत्म प्रतीति सिद्ध सविशेष के अनुभव से निरस्त हो जाता है। "मैंने इसे देखा है" ऐसे अनुभव में किसी विशेषण से विशिष्ट वस्तु की ही प्रतीति होती है (अर्थात अनुभव सगुण वस्तु पर ही आधारित रहता है, जो वस्तु कभी भी दृश्य संभव नहीं है' उसके लिए" अनुभवसिद्ध" कैसे कह सकते हैं) अनुभव गम्य सविशेष