भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ६१ ) वस्तु को यदि किसी थोथी युक्ति से निर्विशेष सिद्ध किया जाय तो वैसा करने में भी अस्तित्व हीन उस वस्तु को अपने से विलक्षण स्वभाव विशेष विशेषित मानना पड़ेगा और तब वह अस्तित्वहीन वस्तु अपने से विलक्षण स्वभाव विशेष से विशेषित होने पर स्वतः ही सविशेष सिद्ध हो जायगी । वस्तु के, किसी भी विशेषण से विशेषित होने पर उस वस्तु की अन्य विशेषतायें निरस्त हो जाती हैं इसलिए किसी भी प्रकार निर्विशेष वस्तु की सिद्धि नहीं हो सकती [अर्थात् वस्तु की सत्ता मानने पर, उसमें कोई न कोई विशेषता तो स्वीकारनी ही पड़ेगी अन्यथा उसकी सत्ता सिद्ध न हो सकेगी, सत्ता मानना ही उसे सविशेष स्वीकारना है] धियो हि धीत्वं स्वप्रकाशता च ज्ञातुर्विषय प्रकाशनस्वभावतयोप- लब्धेः । स्वापमदमूर्च्छासु च सविशेषएवानुभवः इति स्वावसरे निपुणतरमुपपादयिष्यामः । स्वाभ्युपगताश्च नित्यत्वादयो हि अनेके विशेषाः सन्त्येव । ते च न वस्तुमात्रम् इति शक्योपपादनाः, वस्तु- मात्राभ्युपगमे सत्यपि विधाभेद विवाददर्शनात् स्वाभिमततद् विधा- भेदैश्च स्वमतोपपादनात्, अतः प्रामाणिक विशेषैर्विशिष्टमेव वस्तु इति वक्तव्यम् । ज्ञातव्य विषय को प्रकाशित करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति के कारण, ज्ञाता की ज्ञातव्यता और स्वप्रकाशता सदा बनी रहती है । निद्रा मद मूर्च्छा आदि में जो अनुभूति होती है वह भी सविशेष ही होती है, इन विषयों के विवेचन के अवसर में भलीभाँति सतर्क विवेचन करेंगे । वस्तु में अपनी अभिन्न नित्यता आदि अनेक विशेषतायें तो रहती ही हैं । वे विशेषतायें वस्तुमात्र में ही नहीं रहतीं (सभी जगह रहती हैं) ऐसा प्रतिपादन करने की चेष्टा करोगे तो सामान्य वस्तुओं में जो विभिन्नभेद देखे जाते हैं वे सभी भेद तुम्हारी स्वीकृत अपनी वस्तु में भी घटित होंगे जिससे यह सिद्ध हो जायगा कि तुम अपने मत में विभिन्न भेदों को भी स्वीकारते हो । फिर तो तुम्हें "वस्तु प्रामाणिक विशेषताओं से विशिष्ट है" ऐसा भी कहना पड़ेगा ।