श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५२ ) शब्दस्य तु विशेषेण सविशेष एवं वस्तुनि अभिधान सामर्थ्यम् पदवाक्यरूपेणप्रवृत्तेः। प्रकृति प्रत्यययोगेन हि पदत्वम् । प्रकृतिप्रत्ययोरर्थ भेदेन पदस्यैव विशिष्टार्थप्रतिपादमवर्जनीयम् । पदभेदश्चार्थभेदनिब- न्धनः, पदसंघातरूपस्य वाक्यस्यानेकपदार्थसंसर्गविशेषाभिधायित्वेन निर्विशेष वस्तु प्रतिपादनासामर्थ्यात् न निर्विशेषवस्तुनि शब्दः प्रमाणम् । शब्द की, विशेष रूप से, सविशेष वस्तु के प्रतिपादन में ही, अभि- धा शक्ति होती है (अर्थात् शब्द सविशेष वस्तु का ही बोध करा सकता है) क्यों कि-वह पद और वाक्यों के रूप से ही वस्तु का वर्णन करता है । प्रकृति और प्रत्यय के योग से ही शब्द पदरूप प्राप्त करता है । प्रकृति और प्रत्यय में स्वाभाविक अर्थ भेद रहता है, जिससे पद को विशिष्ट अर्थ प्रतिपादकता अनिवार्य हो जाती है (अर्थात् पद विशिष्ट का ही प्रतिपादन करता है, ऐसा निश्चित हो जाता है क्यों कि विशेषण और विशेष्य भाव में दोनों पदों का अर्थ भिन्न होता है, जैसे नील कमल, यहाँ कमल पद विशेष्य और नील पद विशेषण है, दोनों पद क्रमशः पुष्प और वर्ण विशेष के बोधक हैं । "जलज" पद में "जल" प्रकृति और "ज" प्रत्यय है, ये दोनों ही विभिन्न अर्थविबोधक हैं, दोनों प्रकृति के संहित रूप "जलज" पद का अर्थ जल से उत्पन्न होने वाला होता है) अर्थ भेद से ही पद भेद होता है, तथा अनेक पदों का संहित रूप वाक्य होता है जोकि अनेक पदों के अर्थों का बोध कराता है । इससे सिद्ध होता है कि वाक्य भी विशेष अर्थविबोधक होता है, उसमें निर्विशेष वस्तु के प्रतिपादन की क्षमता नहीं है । इसलिए निर्विशेष वस्तु में शब्द प्रभाव नहीं है; यह निश्चित बात है । प्रत्यक्षस्य निर्विकल्पकसविकल्पकभेदभिन्नस्य न निर्विशेष वस्तुनि प्रमाणभावः । सविकल्पकं जात्यादि अनेकपदार्थविशिष्ट विषयत्वादेव सविशेष विषयम् । निर्विकल्पकमपि सविशेषविषयमेव, सविकल्पके स्वस्मिन्ननुभूतपदार्थविशिष्टप्रतिसंधान हेतुत्वात् । निर्विकल्पकं नाम केनचिद् विशेषेण वियुक्तस्य ग्रहणम् , नसर्वविशेष ankurnagpal108@gmail.com