श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५३ ) रहितस्य, तथाभूतस्य कदाचिदपि ग्रहणादर्शनादनुपपत्तेश्च केनचिद् विशेषेण इदमित्थमिति हि सर्वा प्रतीतिरूपजायते, त्रिकोण सास्नादि संस्थान विशेषेण विना कस्यचिदपि पदार्थस्य ग्रहणायोगात्- अतोनिर्विकल्पकमेकजातीय द्रव्येषु प्रथम पिण्ड ग्रहणम् । द्वितीयादि पिण्डग्रहणं सविकल्पमित्युच्यते । तत्र प्रथम पिण्डग्रहणे गोत्वादेरनु- वृत्ताकारता न प्रतीयते । द्वितीयादि पिण्डग्रहणेष्वेवानुवृत्तिप्रतीतिः प्रथम प्रतीत्यनुसंहितवस्तुसंस्थानरूपगोत्वादेरनुवृत्तिधर्मं विशिष्टत्वं द्वितीयादि पिण्ड ग्रहणावसेयमिति, द्वितीयादि ग्रहणस्य सविकल्पकत्वं सास्नादिवस्तुसंस्थानरूप गोत्वादेरनुवृत्तिर्न प्रथम पिण्ड ग्रहणे गृह्यत इति, प्रथम पिण्ड ग्रहणस्य निर्विकल्पकत्वम् । नपुनः संस्थानरूप जात्यादेरग्रहणात् संस्थान रूप जात्यादेरपि-ऐन्द्रियकत्वाविशेषात् , संस्थानेन विना संस्थानिनः प्रतीत्यनुपपत्तेश्च प्रथम पिण्ड ग्रहणेऽपि ससंस्थानमेव वस्तु इत्थम् इति गृह्यते, अतोद्वितीयादि पिण्ड ग्रहणेषु गोत्वादेरनुवृत्तिधर्मविशिष्टता संस्थानिवत् संस्थानवच्च सर्वदैव गृह्यत इति तेषु सविकल्पकत्वमेव । अतः प्रत्यक्षस्य कदाचिदपि न निर्विशेष विषयत्वम् । निर्विकल्पक सविकल्पक भेद वाले प्रत्यक्ष की निर्विशेष वस्तु में प्रमाणता नहीं हो सकती । सविकल्प प्रतीति, जाति आदि अनेक विशेष- ताओं से विशिष्ट विषय वाली होती है, इसलिए वह तो सविशेष विषयक ही है । निर्विकल्पक भी सविशेष विषयक ही है क्यों कि -सविकल्पक प्रतीति में जात्यादि विशिष्ट विषयों की, निर्विकल्पक प्रतीति, की स्मृति होती है । किसी एक विशिष्ट विशेषता से रहित वस्तु, संबंधी ज्ञान को निर्विकल्पक ज्ञान कहते हैं, समस्त सामान्य विशेषताओं से रहित को नहीं । समस्त सामान्य विशेषताओं से रहित वस्तु तो कभी उपलब्ध हो ही नहीं सकती । “अमुक वस्तु” ऐसी प्रतीति में किसी न किसी प्रकार की विशेषता से युक्त वस्तु की ही उपलब्धि होती है । सास्ना आदि चिन्ह् विशेष के बिना गो पदार्थ की प्रतीति नहीं हो सकती । एक जातीय द्रव्य