भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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तदनुरूप अपने व्यवहार का भी ज्ञापन करते हैं, इससे तो आपको यह मानना ही पड़ेगा कि प्रत्यक्ष, भेद को भी प्रमाणित करता है। इस प्रकार भेद ग्रहण में न तो अनवस्था दोष होता है और न अन्योन्याश्रय दोष। प्रत्यक्ष ज्ञान एक क्षणवर्त्ती होते हुए भी, उसी क्षण में उस वस्तु का भेद, आकृति, धर्म आदि सभी वस्तुओं का ग्राहक होता है, दूसरे क्षण उसके लिए ग्रहण करने को कुछ भी शेष नहीं रह जाता । अपि च—सन्मात्र इति ग्राहित्वे घटोऽस्ति पटोऽस्तीति विशिष्ट विषयाप्रतीतिर्विरुध्यते । यदि च सन्मात्रातिरेकवस्तुसंस्थानरूप जात्यादिलक्षणोभेदः प्रत्यक्षेण गृहीतः किमित्यश्वार्थी महिष दर्शने निवर्त्तते , सर्वासुप्रतिपत्तिषु सन्मात्रमेव विषयश्चेत् तत् तत्प्रतिपत्तिविषयसहचारिणः सर्वे शब्दाः एकैकप्रतिपत्तिषु किमिति न स्मर्य्यन्ते ? तथा प्रत्यक्ष को सन्मात्र ग्राही मानेंगे तो "घट है" "पट है" ऐसी विशिष्ट विषयक प्रतीति के विरुद्ध होगा । यदि सन्मात्र के अतिरिक्त, वस्तु संस्थान रूप जाति आदि लक्षण भेदों की प्रतीति, प्रत्यक्ष से संभव न होती तो, घोड़ा को चाहने वाला कोई व्यक्ति घुड़साल में बंधे भैंसे को देखकर लौट नहीं सकता । यदि कहो कि—सभी प्रतीतियाँ सन्मात्र विष- यक हो होती है ; तो फिर भिन्न भिन्न प्रतीति विषयक शब्द, हर प्रति- पत्ति में स्मृत क्यों नहीं होजाते ? किं च अश्वे हस्तिनि च संवेदनयोरेक बिषयत्वेनोपरितन- स्य गृहीत ग्राहित्वात् विशेषाभावाच्च स्मृति वैलक्षण्यं न स्यात् । प्रति संवेदनं विशेषाभ्युपगमे प्रत्यक्षस्य विशिष्टार्थ बिषयत्वमेवभ्युपगतं भवति सर्वेषां संवेदनामनेकविषयतायामेकेनैव संवेदनेनाशेषग्रहणा दंधबधिराद्यभावश्च प्रसज्येत् । घोड़ा और हाथी की प्रतीतियं यदि एक प्रकार ही मानली जाएं तो गृहीत, ग्राहिता तथा विशेषता के अभाव से किसी प्रकार की स्मृति विलक्ष- णता न रह जाएगी [अर्थात् घोड़ा संबंधी प्रतीति के समान ही यदि हाथी ankurnagpal108@gmail.com