भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 120, कुल 696 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 120

( ५७ ) की भी प्रतीति हो जाय तो घोड़ा के समान हाथी को भी चाबुक से हाँकने की चेष्टा हो सकती है तथा घोड़े को अंकुश से । क्यों कि भिन्न प्रकार की स्मृति तो रहेगी नही] यदि प्रत्येक संवेदन को एक विशेष संवे- दन मानेंगे तो प्रत्यक्ष की विशिष्टार्थ विषयता माननी पड़ेगी । सभी प्रतीतियों की एक विषयता मानने में एक ही प्रतीति से सभी विषयों की प्रतीति हो जानी चाहिए जिसके फलस्वरूप अंधे, बहरे आदि भेदों का अभाव हो जाना चाहिए [पर ऐसा होता नहीं, इसलिए उक्त सभी संभावनाये शक्य नहीं हैं] न च चक्षुषा सन्मात्रं गृह्यते, तस्यरूपरूपिरूपैकार्थ ग्राहित्वात् नापि त्वचा, स्पर्शवद् वस्तुविषयत्वात् । श्रोत्रादीन्यपि न सन्मात्र विषयाणि; किन्तु शब्दरसगंधलक्षणविशेषविषयान्येव । अतः सन्मात्रस्य ग्राहकं न किंचिदिह दृश्यते । शुद्ध सद् वस्तु नेत्र से तो देखी नहीं जा सकती क्यों कि नेत्र रूप और रूप युक्त वस्तु को ही देख पाते हैं । त्वचा से भी ग्राह्य नहीं है क्यों कि त्वचा स्पर्शवान