भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

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( ५६ ) निर्विशेष सन्मात्र को प्रत्यक्ष से ही ग्राह्य प्रमाणित करने वाला, शास्त्र अनुवादक मात्र ही है, क्योंकि—उक्त विषय की प्राप्ति की जान- कारी तथा सन्मात्र ब्रह्म का प्रमेय भाव, उसमें बतलाया गया है। उक्त शास्त्र को सही मान लेने से, उस सन्मात्र ब्रह्म में जड़ता क्षीणता आदि दोष तुम्हीं बतलाने लगोगे । इससे सिद्ध होता है कि, वस्तु संस्थान रूप जाति आदि लक्षण भेदों वाला विशिष्ट विषय ही प्रत्यक्ष द्वारा प्रमाणित है । भिन्न आकृति वाली अनेक वस्तुओं में एकाकार बुद्धि विषयक ज्ञान नहीं हुआ करता, तभी गोत्व आदि जातियों का व्यवहार उपपन्न होता है । संस्थान से अतिरिक्त जातिवाद मानने से भी संस्थान की स्थिति पूर्व वत् रहती है, इसलिए संस्थान ही एक जाति होती है। अपने असाधारण विशिष्ट रूप को ही संस्थान कहते हैं। वस्तु के स्वरूपानुसार उसके संस्थान को जानने की चेष्टा करनी चाहिए । जाति संबंधी ज्ञान से ही भिन्नता के व्यवहार का परिज्ञान होता है। संस्थान के अतिरिक्त वस्तु को जाति मानने पर भी; संस्थान के अतिरिक्त, जाति नामक किसी वस्तु की प्रतीति न होने से तथा एक मात्र संस्थान में ही जाति की प्रतीति होने से गोत्व आदि भेदों की प्रतीति होती है । ननुच जात्यादिरेव भेदश्चेत्, तस्मिन् गृहीते तद्व्यवहार- वद् भेदव्यवहारः स्यात् । सत्यम् भेदश्च व्यवह्रियत एव गोत्वादि व्यवहारात् । गोत्वादिरेव हि सकलेतरव्यावृत्तिः , गोत्वादौ गृहीते सकलेतरसजातीयबुद्धिव्यवहारयोर्निवृत्तेः । भेदग्रहणेनैव हि अभेद निवृत्तिः । "अयम् अस्मात् भिन्नः,, इति व्यवहारे प्रतियोगी निर्देशस्य तदपेक्षत्वात् प्रतियोगी अपेक्षा भिन्न इति व्यवहार इत्युक्तम (शंका) जाति आदि ही भेद हैं ऐसा मनाने से तो यह भी मानना पड़ेगा कि जाति आदि व्यवहार की तरह, भेद का भी व्यवहार होता है। (समाधान) ठीक है; गोत्व आदि के व्यवहार से ही भेद व्यवहृत होता है। गोत्व आदि ज्ञान ही अन्य वस्तुओं से उसकी विभिन्नता बत- लाता है ; गोत्वादि में जानकारी हो जाने पर अन्यान्य समस्त वस्तुओं में, सजातीय बुद्धि और व्यवहार की निवृति हो जाती है। भेद ज्ञान से ही अभेद भाव की निवृत्ति होती है। "यह वस्तु अमुक वस्तु से भिन्न