श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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पहले हो चुकी हैं, उन स्वानुभूतियों का अभाव कभी नहीं होता । घट आदि पदार्थ स्वयं अनुभूति नहीं कर पाते, वे सब जीव रहित जड़ हैं, पर वे अनुभाव्य तो हैं ही। अनुभूति स्वयं अनुभाव्य नहीं हैं, फिर भी उसकी अनुभूति नहीं होती, ये नहीं कहा जा सकता। आकाश पुष्प आदि असंभव वस्तुएँ तो अनुभाव्य ही नही है, इसलिये उनका अनुभव नहीं होता। गगनकुसुमादेरननुभूतित्वमसत्त्वप्रयुक्तम् नानुभाव्यत्वप्रयुक्त- मिति चेत्, एवं तर्हि घटादेरप्यज्ञानाविरोधित्वमेवाननुभूतित्वनिबन्ध- नम् नानुभाव्यत्वमित्यास्थीयताम् । अनुभूतेरनुभाव्यत्वे अज्ञाना- विरोधित्वमपि तस्याः घटादेरिव प्रसज्यते इति चेत्, अननुभाव्य- त्वेपि गगनकुसुमादेरिवाज्ञानाविरोधित्वमपि प्रसज्यते एव अतोऽनु- भाव्यत्वेऽननुभूतित्वमिति उपहास्यम् । गगन कुसुम आदि में जो अनुभूति राहित्य है, वो तो, असत् प्रयुक्त है, अनुभाव्य प्रयुक्त नहीं है, यदि ऐसा मानते हो तो घट आदि की जो अननुभूतिता है, वह अज्ञान के कारण है, अनुभाव्यता से नहीं है, ऐसा भी मानना पड़ेगा। यदि कहो कि— अनुभूति की अनुभाव्यता स्वीकारने से, घट आदि को तरह उसमें भी अज्ञान की बात लागू हो सकती है [ तो मैं कहता हूँ कि अनुभूति कोई „गगनकुसुम की तरह असंभव वस्तु नही है जो उसकी अनुभाव्यता न मानी जाय ] यह कथन नितान्त हास्यास्पद है कि अनुभूति अनुभाव्य है, इसलिए अनुभूति नाम की कोई वस्तु नहीं है। यत्तु संविदः स्वतस्सिद्धायाः प्रागभावाद्यभावात् उत्पत्तिर्निरस्यते । तदन्धस्य जात्यन्धेन यष्टिः प्रदीयते । प्रागभावस्य ग्राहकाभावाद- भावो न शक्यते वक्तुम्, अनुभूत्यैव ग्रहणात् कथमनुभूतिस्सती तदानीमेव स्वाभावं विरुद्धमवगमयतीति चेत्; न हि अनुभूतिः स्व समकालवर्त्तिनमेव विषयीकरोतीत्यस्ति नियमः अतीतानागतयोर- विषयत्वप्रसंगात् ।