श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६४ ) और जो, प्रागभाव आदि के न होने से, स्वयं सिद्धा अनुभूति, की उत्पत्ति का खंडन किया, वह भी ऐसी ही बात है जैसे कोई जन्मान्ध, दूसरे अन्धे को लाठी का सहारा दे । प्रागभाव इसलिए अभाव है, कि उसमें ग्राहकता का अभाव है, ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि अनुभूति का ग्रहण उसमें होता है (अर्थात् अनुभूति अतीत भी होती है) अनुभूति स्वयं स्थित रहकर उसी समय अपने अभाव को कैसे बतला सकती है, यह विरुद्ध भाव है ? ऐसी शंका भी नहीं कर सकते क्योंकि—अनुभूति सम- कालीन विषयक ही हो ऐसा कोई नियम नहीं है। यदि ऐसा मान लेगें तो अतीत और अनागत विषयक अनुभूति की बात तो एक दम ही समाप्त हो जायगी । अथमन्यसे—अनुभूति प्रागभावादेः सिद्ध् यतः तत् समकाल- भावनियमोऽस्तीति; किं त्वयाक्वचिदेवं दृष्टं ? यन्नियमं ब्रवीषि । हन्त तर्हि तत् एव दर्शनात् प्रागभावादिः सिद्ध इति, न तदपह्नवः । तत् प्रागभावं च तत् समकालवर्त्तिनं, अनुन्मत्तः कोब्रवीति ? यदि अपने बचाव के लिए यह मानों कि—उपलब्धि के बिना किसी वस्तु की प्रतीति नहीं होती, इसलिए अनुभूति प्रागभाव आदि सभी में रहती है ऐसा नियम है; तो क्या तुमने कहीं ऐसा देखा है ? जो नियम बतला रहे हो। यदि देखा है, तो बड़ी प्रसन्नता की बात है, तुम्हारे उस दर्शन से ही अनुभूति के प्रागभाव आदि सिद्ध हो जाते हैं, जिन्हें तुम छिपा नहीं सकते । अभाव और उसके साथ उस अनुभूति का भाव, दोनों एक साथ रहते हैं, ऐसा पागल के अतिरिक्त दूसरा और कौन कह सकता है ? इन्द्रिय जन्मनः प्रत्यक्षस्य हि एष स्वभाव नियमः, यत् स्वसम- कालवर्त्तिनः पदार्थस्य ग्राहकत्वम्, न सर्वेषांज्ञानानां प्रमाणानाञ्च, स्मरणानुमानागमयोगिप्रत्यक्षादिषु कालान्तरवर्त्तिनोऽपि ग्रहणदर्श- नात् । अतएव च प्रमाणस्य प्रमेयाविनाभावः, नहि प्रमाणस्य स्वसमकालवर्त्तिनाऽविनाभावोऽर्थ संबंधः, अपितु यत् देशकालादि ankurnagpal108@gmail.com