श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६५ ) संबन्धितया योऽर्थोऽवभासते, तस्य तथाविधाकारमिथ्यात्वप्रत्यनीकता, अत इदमपि निरस्तम् “स्मृतिर्नवाह्यविषया” नष्टेत्यर्थे स्मृति दर्शनात् इति । इन्द्रियजन्य प्रत्यक्ष का ही यह स्वाभाविक नियम है कि, उसमें समकालीन पदार्थ की प्रतीति होती है, सभी ज्ञानों और प्रमाणों का ऐसा नियम नहीं है; स्मरण, अनुमान, आगम, योगिप्रत्यक्ष आदि में काला- न्तरवर्ती वस्तु का साक्षात्कार भी होता है। इसी से प्रमाण का प्रमेय के साथ अविनाभाव ( नियत संबंध ) सिद्ध होता है। अपनी समकालीन वस्तु के साथ ही प्रमाण का अविनाभाव संबंध होता हो ऐसा कोई नियम नहीं है, अपितु जिस किसी भी देश काल आदि से संबंधी जो भी पदार्थ प्रतिभासित होता है, उसकी उसी प्रकार के मिथ्यात्व की निवृत्ति करना प्रमाण का कार्य है। इससे बौद्धों का यह मत भी निरस्त हो जाता है कि—“स्मृति वाह्य पदार्थ विषयक नहीं होती” नष्ट पदार्थ कीं भी स्मृति हुआ करती है। अथोच्येत, न तावत् संवित् प्रागभावः प्रत्यक्षावसेयः लिंगाद्यभा- वात् । न हि संवित् प्रागभावव्याप्तिमिहलिंगमुपलभ्यते, न चागमस्तद् विषयो दृष्टचरः । अतस्तत्प्रागभावः प्रमाणाभावात् एव न सेत्स्यति, इति । यद्येवं स्वतस्सिद्धत्वविभवं परित्यज्य प्रमाणाभावेऽवरूढश्चेत् योग्यानुपलब्ध्यैवाभावः समर्थितः इत्युपशाम्यतु भवान् । यदि कहो कि—संवित् का प्रागभाव, लिंग आदि के अभाव के कारण, प्रत्यक्ष प्रमाण द्वारा निरूपित नही हो सकता। न प्रागभाव में संवित् की व्याप्ति ही रहती है जिससे उसका लिंग उपलब्ध हो सके, और न उसके विषय में कोई शास्त्र वचन ही मिलता है। इसलिए संवित् का प्रागभाव, प्रमाणों के अभाव से सिद्ध नहीं होता [उत्तर] यदि ऐसा ही है कि आप अनुभूति की स्वतः सिद्धता को छोड़कर प्रमाणों के अभाव पर ही अड़ गये हैं तो प्रमाणों की अनुपलब्धि ही ऐसा प्रमाण है, जिससे अभाव का समर्थन हो जाता है, अतः आपका चुप रहना ही हितकर है।