श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६६ ) किञ्च प्रत्यक्षज्ञानं स्वविषयं घटादिकं स्वसत्ताकाले संतं साध- यत्तस्य न सर्वदा सत्तामवगमयद् दृश्यत इति घटादेः पूर्वोत्तरकाल- सत्ता न प्रतीयते । तदप्रतीतिश्च संवेदनस्य कालपरिच्छिन्नतया प्रतीतेः । घटादिविषयमेव संवेदनं स्वयंकालानवच्छिन्नं प्रतीत चेत्; संवेदन विषयो घटादिरपि कालानवच्छिन्नः प्रतीयेतेति नित्यः स्यात् । नित्यं चेत् संवेदनं स्वतःसिद्धं नित्यमित्येव प्रतीयेत, न च तथा प्रतीयते । देखा जाता है, कि—प्रत्यक्ष ज्ञान के विषय घट आदि जब तक रहते हैं तभी तक उनका अस्तित्व रहता है, प्रत्यक्ष ज्ञान ही उस अस्तित्व का ज्ञापक होता है, फिर भी वह, उनकी सत्ता को सर्वकालीन नहीं बतलाता, इसी से घट आदि की अतीत और आगत सत्ता की प्रतीति नही होती । संवेदन ( अनुभव ) की कालपरिच्छिन्नता से ही उस प्रतीति का भान होता है [ अर्थात् संवेदन कालान्तर में बदलता रहता है इसी से पदार्थों की अप्रतीति होती है अर्थात् घट बनने के पूर्व का अनुभव और घटध्वंस के बाद का अनुभव, घटस्थिति के अनुभव से भिन्न होता है, जिससे अभाव की प्रतीति होती है, अतः मनुष्य की प्रतीति घटनाओं के आधार पर समय-समय पर बदलती रहती है ] घट आदि विषयक संवेदन यदि स्वयं ही, काल से अनवच्छिन्न हों, तो संवेदन के विषय घट आदि भी काल से अनवच्छिन्न प्रतीत हों, इस प्रकार नित्य हो जाएं । स्वतः सिद्ध संवेदन यदि नित्य होता तो, उसकी प्रतीति भी नित्य होती, पर वैसा होता नहीं [ इससे सिद्ध होता है कि संवित् नित्य वस्तु नहीं है ] एवं अनुमानादि संविदोऽपि कालानवच्छिन्नाः प्रतीताश्चेत् स्व- विषयानपि कालानवच्छिन्नान् प्रकाशयन्तीति, तेच सर्वेकालानवच्छिन्ना नित्याः स्युः, संविदनुरूपस्वरूपत्वात् विषयाणाम् । न च निर्विषया काचित् संविदस्ति, अनुपलब्धेः । विषय प्रकाशनतयैवोपलब्धेरेव हि संविदः स्वयम्प्रकाशता समर्थिता । संविदो विषयप्रकाशनता ankurnagpal108@gmail.com