श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्वभावविरहेसति स्वयंप्रकाशत्वासिद्धेः अनुभूतेरनुभावन्तराननु- भाव्यत्वाच्च संविदस्तुच्छतैव स्यात् । न च स्वापमदमूर्च्छादिषु सर्वविषयशून्या केवलैव संवित्परिसफुरतीति वाच्यम्, योगानुपलब्धि- पराहतत्वात् । तावपि दशास्वनुभूतिरनुभूता चेत्, तस्याः प्रबोध समयेऽनुसंधानं स्यात् न च तदस्ति । इसी प्रकार अनुमान आदि जन्य संविद् भी यदि काल से अन- वच्छिन्न प्रतीत होती तो अपने विषयों को भी काल से अनवच्छिन्न ही प्रकाशित करती, जिससे वे सारे ही विषय काल से अनवच्छिन्न (अबाध्य) नित्य होते, क्योंकि विषयों का स्वरूप संविद के अनुरूप ही होता है। कोई भी संवित् निर्विषयक नहीं होती; ऐसा प्रमाण भी नहीं मिलता। विषय प्रकाशन से ही उपलब्धि होती है तथा संविद् की स्वयम्प्रकाशिता सिद्ध होती है। संविद का विषय प्रकाशनता का स्वभाव यदि समाप्त हो जाय तो, उसकी स्वयं प्रकाशता ही असिद्ध हो जायगी। तथा अनुभूति के