भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 130, कुल 696 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 130

विगमाद्वेति शक्यते वक्तुम् । अर्थान्तरानुभवस्यार्थान्तराभावस्य चानुभूतार्थान्तरास्मरण हेतुत्वाभावात् । तास्वपि दशासु अहमर्थोऽ- नुवर्त्तत इति न वक्ष्यते । ( शंका ) अनुभूत पदार्थों का स्मरण सदा रहे ही ऐसा तो कोई नियम है नहीं, और जिस वस्तु की स्मृति ही नही रहेगी, तो अनुभव हुआ ही नहीं, ऐसा निर्णय कैसे किया जा सकता है ! ( उत्तर ) निद्रा आदि अवस्थाओं में देह आदि से असंबद्ध होने के कारण सारे संस्कार तिरोहित हो जाते है, उससे भी विस्मृति होती है इससे भी अनुभव का अभाव सिद्ध होता है । केवल स्मरणाभाव के नियम से ही अनुभव का अभाव ज्ञात होता हो, ऐसी बात नहीं है अपितु “मुझे इतनी देर कुछ भी ज्ञात नहीं रहा” ऐसे सोकर उठे हुए व्यक्ति के कथन से भी अनुभव का अभाव सिद्ध होता है । यह भी नहीं कह सकते कि—निद्रा आदि अवस्थाओं में अनुभव तो होता है, पर विषय निर्धारण के अभाव और अहंकार के विगम ( प्रतीति न होने ) से विस्मृति हो जाती है । अन्य वस्तु की अनुभूति का अभाव और अन्य वस्तु का विनाश कभी अन्य अनुभूत पदार्थ के विस्मरण का हेतु नहीं हो सकता । निद्रा आदि दशाओं में भी अहंकार रहता है, ऐसा आगे बतलावेंगे । ननु—स्वापादिदशास्वपि सविशेषोऽनुभवोऽस्तीति पूर्वमुक्तम् । सत्यमुक्तम्, सत्वात्मानुभवः । स च विशेष एवेति स्थापयिष्यते । इह तु सकलविषयविरहिणी निराश्रया च संविद् निषिध्यते । केवलैव संविदात्मानुभव इति चेत् न, सा च साश्रयेतिर्हि उपपाद- यिष्यते । अतोऽनुभूतिः सती स्वयं स्वप्राग्भावं न साधयति इति प्राग्भावासिद्धिर्नशक्यते वक्तुम् । अनुभूतेरनुभाव्यत्वसंभवोपपादने नान्यतोऽप्यसिद्धिर्निरस्ता; तस्मात् न प्राग्भावाद्यासिद्ध्या संविदोऽनु- त्पत्तिरुपपत्तिमती ।