श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७८ ) यथाहि श्रुतयः—“सयथां सैन्धवघनोऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नो रसघन एव, एवं वाअरेऽयमात्माऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एव”—विज्ञानघन एव”—अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवति” “न विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपोविद्यते”—“अथयोवेदेदं जिघ्राणीति स आत्मा—“कतम आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः—‘‘एष द्रष्टा श्रोता रसयिता घ्राता मंता बोद्धा कर्त्ता विज्ञानात्मा पुरुषः”—‘‘विज्ञातारमरे केन विजानीयात्”—‘‘जानात्येवायं पुरुषः” “न पश्यो मृत्युं पश्यति न रोगं नोत दुःखताम्”—‘‘स उत्तमः पुरुषः” “नोपजनं स्मरन्निदं शरीरम्”—“एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडशकलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति”—“तस्माद् वा एतस्माद् मनोमयादन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः”—इत्याद्याः । वक्ष्यतिच “ज्ञोऽत एव” इति । श्रुतियाँ भी उक्त विषय का प्रतिपादन करती हैं—“जैसे सेंधे नमक की डली बाहर से भीतर तक रसघन है, वैसे ही यह आत्मः बाहर से भीतर तक प्रज्ञानघन (ज्योतिर्मय) है ।” यह विज्ञान घन ही है । यह पुरुष स्वयं ज्योतिरूप होता है । इस विज्ञाता का विज्ञान कभी लुप्त नहीं होता । जो ऐसा अनुभव करता है कि सूं घ रहा हूँ वही आत्मा है । आत्मा कौन है ? जो विज्ञानमय, प्राणों में स्थित, हृद्यन्तर्ज्योति है । वह विज्ञान मय आत्मा ही, मनन करने वाला, कर्त्तव्य निर्धारक, स्वाद लेने वाला, सूं घने वाला और कर्त्ता है । अरे ! उस विज्ञाता को और कैसे जानोगे । जो जानता है वही आत्मा है । जो उसे देख लेता है, वह मृत्यु को नहीं देखता और न रोग तथा दुःखों को भोगता है । वह उत्तम पुरुष है । उसे जानकर निकटस्थ इस शरीर का भी भान नहीं रहता । आत्मदर्शी पुरुष के आश्रित इस सोलह कला वाले पुरुष को प्राप्त कर तृप्त हो जाता है । इस मनोमय कोष का अन्तरवर्त्ती विज्ञानमय आत्मा है” इत्यादि । सूत्रकार भी “ज्ञोऽत एव” सूत्र में उक्त तथ्य की ही पुष्टि करते हैं । ankurnagpal108@gmail.com