भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ७१ ) अतः स्वयं प्रकाशोऽयमात्मा ज्ञातैव, न प्रकाशमात्रम्। प्रकाश- त्वादेव कस्यचिदेव भवेत्प्रकाशः दीपादि प्रकाशवत् तस्मान्नात्मा भवितुमर्हति संवित्, संविदनुभूतिज्ञानादिशब्दाः संबन्धि शब्दा इति च शब्दार्थविदः, न हि लोक वेदयोर्जानाति इत्यादेरकर्मकस्याकर्तृ कस्य च प्रयोगो दृष्टचरः । उक्त शास्त्र वाक्यों से ज्ञात होता है कि— स्वयं प्रकाशमय आत्मा केवल प्रकाश ही नहीं है, ज्ञाता भी है । प्रदीप आदि के प्रकाश की तरह, इसकी प्रकाशता भी अन्याधीन नहीं है, क्योंकि यह स्वयं प्रकाश है, इसलिए आत्मा संवित् नहीं हो सकता । शब्द वेत्ताओं का कथन है कि— संवित्, अनुभूति, ज्ञान आदि शब्द, किसी से संबंध रखने वाले शब्द हैं। लोक या वेद में कहीं भी “जानता है” इत्यादि पदों का कर्म रहित या कर्त्ता रहित प्रयोग नहीं देखा जाता । यच्चोक्तम्—अजडत्वात् संविदेवात्मेति, तत्रेदं प्रष्टव्यम् अजड- त्वमिति किमभिप्रेतम् ? स्वसत्ताप्रयुक्तप्रकाशत्वमिति चेत्, तथासति दीपादिष्वनैकान्त्यम्, संविदतिरिक्तप्रकाशधर्मानभ्युपगमेनासिद्धि- विरोधश्च । अव्यभिचरितप्रकाशसत्ताकत्वमति सुखादिषु व्यभि- चारान्निरस्तम् । जो यह कहा कि—जड न होने से संवित् ही आत्मा है; उस पर प्रश्न यह है कि, अजडता से आपका क्या तात्पर्य है ? यदि कहें कि— स्वयं प्रकाशता ही अजडता है, सो तो दीप आदि अनेकों में विद्यमान है। जब तक संवित् · से भिन्न, प्रकाश नामक किसी धर्म विशेष को नहीं मानोगे, तब तक तुम्हारा अभिप्राय सिद्ध नहीं हो सकेगा अपितु विरोध ही होगा । यदि कहो कि जिसकी कभी भी प्रकाश रहित सत्ता नहीं होती, वही अजडता है, सो यह बात भी सुख दुःख आदि के विनाश से कट जाती है । यदि उच्येत, सुखादिरव्यभिचरितप्रकाशो अपि अन्यस्मै प्रकाशमानतया घटादिवज्जडत्वेन अनात्मेति । ज्ञानंवा किं स्वस्मै ankurnagpal108@gmail.com