भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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प्रकाशते ? तदपि हि अन्यस्यैवाहमर्थस्य ज्ञातुरवभासते, अहं सुखी- तिवज्जानाम्यहमिति, अतः स्वस्मै प्रकाशमानत्वरूपजडत्वं संविद्य- सिद्धम्, तस्मात्स्वात्मानं प्रति स्वसत्तयैव सिध्यन्नजडोऽहमर्थ एवात्मा । ज्ञानस्यापि प्रकाशता तत्सम्बन्धायत्ता; तत्कृतमेव हि ज्ञानस्य सुखा- देरिव स्वाश्रयचेतनंप्रतिप्रकटत्वं इतरंप्रत्यप्रकटत्वं च, अतो न ज्ञप्तिमात्रमात्मा अपितुज्ञातैवाहमर्थः । यदि कहो कि-सुख आदि का निरन्तर होने वाला प्रकाश भी दूसरे से प्रकाशमान होने से, घट आदि की तरह जड़ है इसलिए वे अनात्म तत्त्व है । मै पूछता हूँ कि-ज्ञान क्या स्वतः प्रकाशित होता है ? “मै सुखी हूँ” की तरह “मै जानता हूँ” ऐसी ज्ञानात्मक प्रतीति भी, “अहं” पद से विख्यात ज्ञाता द्वारा ही उद्भासित होती है । इसलिए स्वतः प्रकाशता ही संवित् की अजडता है, यह बात असिद्ध हो जाती है । अपनी सत्ता से अपने में स्वयं सिद्ध “अहं” पद वाच्य आत्मा ही अजड है । ज्ञान की प्रकाशता भी उसी से संबद्ध होने से, उसी के अधीन है । इसीलिए ज्ञान, सुख आदि की तरह, अपने आश्रय चेतन आत्मा के समक्ष व्यक्त तथा अन्यों के समक्ष अव्यक्त रहता है । इससे सिद्ध होता है कि ज्ञान ही आत्मा नही है, अपितु ज्ञान करने वाला “अहं” वाच्य ज्ञाता, आत्मा है । अथ यदुक्तम्-“अनुभूतिः परमार्थतो निर्विषया निराश्रया च सती भ्रान्त्या ज्ञातृतयाऽवभासते, रजततयेवशुक्तिर्निरधिष्ठान भ्रमानुपपत्तेः” इति । तदयुक्तम्-तथा सत्यनुभवसामानाधिकरण्ये- नानुभविताऽहमर्थः प्रतीयेत, अनुभूतिरहमिति पुरोऽवस्थित भास्वर द्रव्याकारतया रजतादिरिव अत्रतु पृथगवभासमानैवेयमनुभूतिरर्था- न्तरमहमर्थं विशिनष्टि, दंड इव देवदत्तं, तथा हि अनुभवाम्यहमिति प्रतीतिः, तदेवमस्मदर्थमनुभूतिविशिष्टं प्रकाशयन्ननुभवाम्यहमिति प्रत्ययो दंडमात्रे दंडी देवदत्त इति प्रत्ययवद् विशेषणभूतानुभूति- मात्रावलंबनः कथमिव प्रतिज्ञायेत ?