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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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की कर्तृता निश्चित है, पर वह कर्तृता आत्मा का स्वाभाविक धर्म नहीं है, अपितु कर्मानुसार उसके साथ संलग्न है, आत्मा तो निर्विकार ही है। उक्त प्रकार की विकारात्मक ज्ञातृता ज्ञानस्वरूप आत्मा की ही है, जड़ अहंकार की ज्ञातृता कभी भी संभव नहीं है ।

जडस्वरूपस्याप्यहंकारस्य चित्संनिधाने न तच्छायापत्या तत्संभव इति चेत्, केयं चिच्छायापत्तिः ? किमहंकारच्छायापत्तिः संविदः ? उत् संविच्छायापत्तिरहंकारस्य ? य तावत् संविदः, संविदि ज्ञातृत्वानभ्युपगमात् । नाप्यहंकारस्य उक्तरीत्या तस्य जडस्य ज्ञातृत्वायोगात् द्वयोरप्यचाक्षुषत्वाच्च न हि अचाक्षुषाणां छाया दृष्टा । अथ-अग्नि संपर्कात् अयः पिंड औष्ण्यवत् चित् संपर्कात् ज्ञातृत्वोपलब्धिरिति । नैतत् संविदि वास्तव ज्ञातृत्वान- भ्युपगमादेव तत्संपर्कादहंकारे ज्ञातृत्वं तदुपलब्धिर्वा । अहंकारस्यतु अचेतनस्य ज्ञातृत्वासंभवादेव सुतरां न तत्संपर्कात् संविदि ज्ञातृत्वं तदुपलब्धिर्वा ।

यदि कहो कि—जड स्वरूप अहंकार का चित् से संपर्क होने से चित् की छाया पड़ने से अहंकार में ज्ञातृता हो सकती है, तो विचारना होगा कि यह चित् छाया किसकी है ? अहंकार की छाया संवित् पर पड़ती है, या संवित् की छाया अहंकार पर पड़ती है ? संवित् की तो हो नहीं सकती, क्योंकि संवित् में ज्ञातृता आपको ही स्वीकार नहीं है । अहंकार की छाया भी संभव नहीं है, क्योंकि पूर्वोक्त नियमानुसार जड़ अहंकार का ज्ञातृता से कोई सम्बन्ध नहीं है । दोनों ही अप्रत्यक्ष वस्तु है, अप्रत्यक्ष वस्तु की छाया पड़ती देखी नहीं जाती । अग्नि संपर्कित लोहे की उष्णता की तरह, चित् संपर्क से ज्ञातृता की उपलब्धि होती हो, सो भी नहीं है; जब संवित् में ही वास्तविक ज्ञातृता का अभाव है तो उसके संपर्क से अहंकार में ज्ञातृता की उपलब्धि होगी ही कैसे ? जड़ अहंकार में तो ज्ञातृता असंभव ही है, इसलिए उसके संपर्क से संवित् की ज्ञातृता हो, इसका कोई प्रश्न ही नहीं है ।

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