भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 147, कुल 696 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 147

( ८५ ) तदप्युक्तम्—"उभयत्र न वस्तुतो ज्ञातृत्वमस्ति । अहंकार- स्त्वनुभूतेरभिव्यंजकः स्वात्मस्थामेवानुभूतिमभिव्यनक्ति, आदर्शादिवत् इति । "तदयुक्तम्—आत्मनः स्वयं ज्योतिषो जडस्वरूपाहंकारा- भिव्यंग्यत्वायोगात् । तदुक्तम्—"शान्तांगार इवादित्यमहंकारो जडा- त्मकः, स्वयंज्योतिषमात्मानं व्यनक्तीति न युक्तिमत् ।" स्वयं- प्रकाशानुभवाधीन सिद्धयो हि सर्वेपदार्थाः । तत्र तदायत्तप्रकाशोऽ चिदहंकारोऽनुदितानस्तमितस्वरूप प्रकाशमशेषार्थसिद्धिहेतुभूतमनु- भवमभिव्यनक्ति इति आत्मविदः परिहसंति । उस पर जो कहो कि—"दोनों मे वास्तविक ज्ञातृता नही है । अहकार तो स्वयं अनुभूति का अभिव्यंजक है, जो कि दर्पण आदि की तरह अपने में ही अनुभूति को अभिव्यक्त करता है ।" यह भी नितांत असंगत बात है—स्वयं प्रकाश आत्मा, जड स्वरूप अहंकार से कभी अभिव्यंजित नहीं हो सकता । जैसा कि कहा भी है— "अग्निरहित अंगारे की तरह जड अहंकार, सूर्य की तरह स्वयं प्रकाश आत्मा को व्यंजित करता है, यह बात युक्ति संगत नहीं है ।" सारे पदार्थ स्वयं प्रकाश अनुभव के अधीन सिद्ध हैं । उसका वह स्वाधीन प्रकाश उदय अस्त रहित जड अहंकार से अभिव्यक्त होता है. इस बात को सुनकर, आत्मवेत्ता लोग हंसते हैं । किं च—अहंकारानुभवयोः स्वभावविरोधात् अनुभूतेरननुभूतित्व प्रसंगाच्च नव्यङ्क्तृ व्यंग्यभावः यथोक्तम्— "व्यङ्क्तृव्यंग्यत्वमन्योन्यं न चस्यात् प्रातिकूल्यतः । व्यंग्यत्वे अननुभूतित्वमात्मनि स्यात् यथा घटः ॥" इति न च रविकरनिकराणां स्वाभिव्यंग्यकरतलाभिव्यंग्यत्ववत् संविद्- भिव्यंग्याहंकाराभिव्यंग्यत्वं संविदस्साधीयः, तथापि रविकर- निकराणां करतलाभिव्यंग्यत्वाभावात्, करतलप्रतिहतगतयो हि