भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

( ८५ ) तदप्युक्तम्—"उभयत्र न वस्तुतो ज्ञातृत्वमस्ति । अहंकार- स्त्वनुभूतेरभिव्यंजकः स्वात्मस्थामेवानुभूतिमभिव्यनक्ति, आदर्शादिवत् इति । "तदयुक्तम्—आत्मनः स्वयं ज्योतिषो जडस्वरूपाहंकारा- भिव्यंग्यत्वायोगात् । तदुक्तम्—"शान्तांगार इवादित्यमहंकारो जडा- त्मकः, स्वयंज्योतिषमात्मानं व्यनक्तीति न युक्तिमत् ।" स्वयं- प्रकाशानुभवाधीन सिद्धयो हि सर्वेपदार्थाः । तत्र तदायत्तप्रकाशोऽ चिदहंकारोऽनुदितानस्तमितस्वरूप प्रकाशमशेषार्थसिद्धिहेतुभूतमनु- भवमभिव्यनक्ति इति आत्मविदः परिहसंति । उस पर जो कहो कि—"दोनों मे वास्तविक ज्ञातृता नही है । अहकार तो स्वयं अनुभूति का अभिव्यंजक है, जो कि दर्पण आदि की तरह अपने में ही अनुभूति को अभिव्यक्त करता है ।" यह भी नितांत असंगत बात है—स्वयं प्रकाश आत्मा, जड स्वरूप अहंकार से कभी अभिव्यंजित नहीं हो सकता । जैसा कि कहा भी है— "अग्निरहित अंगारे की तरह जड अहंकार, सूर्य की तरह स्वयं प्रकाश आत्मा को व्यंजित करता है, यह बात युक्ति संगत नहीं है ।" सारे पदार्थ स्वयं प्रकाश अनुभव के अधीन सिद्ध हैं । उसका वह स्वाधीन प्रकाश उदय अस्त रहित जड अहंकार से अभिव्यक्त होता है. इस बात को सुनकर, आत्मवेत्ता लोग हंसते हैं । किं च—अहंकारानुभवयोः स्वभावविरोधात् अनुभूतेरननुभूतित्व प्रसंगाच्च नव्यङ्क्तृ व्यंग्यभावः यथोक्तम्— "व्यङ्क्तृव्यंग्यत्वमन्योन्यं न चस्यात् प्रातिकूल्यतः । व्यंग्यत्वे अननुभूतित्वमात्मनि स्यात् यथा घटः ॥" इति न च रविकरनिकराणां स्वाभिव्यंग्यकरतलाभिव्यंग्यत्ववत् संविद्- भिव्यंग्याहंकाराभिव्यंग्यत्वं संविदस्साधीयः, तथापि रविकर- निकराणां करतलाभिव्यंग्यत्वाभावात्, करतलप्रतिहतगतयो हि

( ८६ ) रश्मयो बहुलाः स्वयमेव स्फुटतरमुपलभंते, इति तद्बाहुल्यमात्रहेतु- त्वात् करतलस्य नाभिव्यंजकत्वम् । अहंकार और अनुभव के स्वाभाविक विरोध तथा व्यंग्य होने पर अनुभूति, अनुभूति न रह जायगी, इन दोनों ही बातों से सिद्ध होता है कि—दोनों में व्यंजक व्यंग्य भाव नहीं है। जैसा कि कहा भी गया है— ‘स्वाभाविक विरोध तथा वैलक्षण्य होने से दोनों में परस्पर व्यंग्य व्यंजक भाव नहीं है, यदि व्यंग्य भाव होगा तो, घट की तरह, आत्मा में अनुभूति का अभाव हो जायगा।’ सूर्य किरणें जैसे करतल को अभिव्यक्त करके, स्वयं भी उससे अभिव्यक्त होती हैं, उसी प्रकार संविद् भी अहंकार को अभिव्यक्त करके उससे अभिव्यक्त हो, ऐसा भी संभव नहीं है, क्योंकि—सूर्य रश्मियां करतल से व्यंजित नहीं होतीं, अपितु करतल में प्रतिहत वे रश्मियां, इधर उधर फैलकर अधिक स्पष्ट रूप से प्रत्यक्ष दीखने लगती हैं, उनकी विस्तृति के आधार पर ही, करतल को उनकी अभिव्यक्ति का कारण नहीं कहा जा सकता । किं च—अस्य संवित् स्वरूपस्यात्मनोऽहंकारनिर्वर्त्याभिव्यक्तिः कि रूपा ? न तावदुत्पत्तिः, स्वसिद्धतयाऽनन्योत्पद्यत्वाभ्युपगमात् नापि तत्प्रकाशनम्, तस्या अनुभवान्तराननुभाव्यत्वात्, ततएव च न तदनुभवसाधनानुग्रहः । स हि द्विधाज्ञेयस्येन्द्रिसंबंधहेतुत्वेनवा, यथा जाति निजमुखादिग्रहणे व्यक्ति दर्पणादीनां नयनादीन्द्रिय संबंध- हेतुत्वेन, बोद्धृगतकल्मषापनयनेन वा, यथा परतत्त्वावबोधन, साधनस्य शास्त्रस्य शमदमादिना । यथोक्तम्—“करणानामभूमि- र्त्वान्न तत्संबंध हेतुता” इति । इस संवित् स्वरूप आत्मा की अहंकार द्वारा जो अभिव्यक्ति होती है, उसका क्या रूप है.? वह अभिव्यक्ति, उत्पत्ति रूप है, ऐसा तो कह नहीं सकते, क्योंकि, स्वयंसिद्धता के आधार पर उसकी किसी अन्य के

( ८७ )

  • द्वारा उत्पत्ति नही हो सकती, ऐसा निर्णय कर चुके है । वह अभिव्यक्ति, प्रकाश रूप भी नही हो सकती, क्योकि--संवित् स्वय प्रकाश है, उसे प्रकाश मे किसी अन्य की अपेक्षा नही होती । इससे सिद्ध होता है कि-- ज्ञानानुभूति मे, अहकार द्वारा अभिव्यक्ति की सहायता अपेक्षित नही है । सहायता दो ही प्रकार से हो सकती है (१) ज्ञेय की, इन्द्रिय सबंधी कारणो से होने वाली, जैसे कि--मनुष्य आदि जाति के जानने के लिए, उस जाति के साथ चाक्षुष सबध वाले व्यक्ति द्वारा दी गई अथवा अपनी आकृति की जानकारी मे दर्पण की सहायता, (२) ज्ञाता के (हृदयगत) दोषों के अपनयन द्वारा दी जाने वाली, जैसे कि--परतत्त्व परमेश्वर को बतलाने वाले शास्त्रो से सम्मत, शम दम आदि उपायो द्वारा दी जाने वाली सहायता । जैसा कि--कहा गया है--‘‘वह अधोक्षज है (इन्द्रिय गम्य नही है) इसलिए इन्द्रियो की उससे कोई सबध हेतुता नही है ।’’ किंच-अनुभूतेरनुभाव्यत्वाभ्युपगमेऽप्यहमर्थेन न तदनुभव साध- नानुग्रहः सुवचः, स हि अनुभाव्यानुभवोत्पत्तिप्रतिबंधनिरसनेन भवेत् । यथा रूपादिग्रहणोत्पत्तिनिरोधितमसनिरसनेन चक्षुषो दीपादिना । न चेह तथाविधं निरसनीयं संभाव्यते । न तावत्सविदा- त्मगतं तज्ज्ञानोत्पत्तिनिरोधि किंचिदप्यहंकारापनेयमस्ति । अस्तिहि अज्ञानमिति चेत्, न अज्ञानस्याहंकारापनोद्यत्व अनभ्यु- पगमात् । ज्ञानमेव हि अज्ञानस्य निवर्त्तकम् । अनुभूति की अनुभाव्यता मान लेने पर भी, अहकार को, अनुभूति का सहयोगी साधक नही कहा जा सकता । ऐसा तो तभी सभव है, जब कि--अनुभाव्य के, अनुभवोत्पत्ति के अन्य प्रतिबन्धकों का, निराकरण कर दिया जाय । जैसे कि--प्रदीप आदि का आलोक, रूप आदि प्रत्यक्ष के विरोधी घने अधकार का निराकरण कर, नेत्रों का सहायक होता है । अनुभूति की अभिव्यक्ति में उस प्रकार के निवारण की संभावना ही नही है, अर्थात् ज्ञानस्वरूप आत्मा की ज्ञान प्रतिबन्धक ऐसी कोई वस्तु नहीं हैं, जिसे अहंकार दूर कर सके यदि कहो कि-अज्ञान, ज्ञान का प्रतिबंधक है; सो अज्ञान का निराकरण, अहंकार से हो नहीं सकता । ankurnagpal108@gmail.com

( ८८ )

ज्ञान ही अज्ञान का निवर्त्तक हो सकता है, अज्ञान, ज्ञान का निवर्त्तक नहीं है। न च संविदाश्रयत्वमज्ञानस्य सम्भवति, ज्ञानसमानाश्रयत्वात्- त्समानविषयत्वाच्च ज्ञातृभाव विषयभाव विरहिते, ज्ञानमात्रेसाक्षिणि नाज्ञानं भवितुमर्हति । यथा ज्ञानाश्रयत्वप्रसक्तिशून्यत्वेन घटादेर्ना- ज्ञानाश्रयत्वम् तथा ज्ञानमात्रेऽपि ज्ञानाश्रत्वाभावेन नाज्ञानाश्रयत्वं स्यात् । संविदोऽज्ञानाश्रयत्वाभ्युपगमेऽपि आत्मतयाऽभ्युपगतायास्त- स्याज्ञानविषयत्वाभावेन ज्ञानेन न तद्गता ज्ञान निवृत्तिः । ज्ञानं हि स्वविषय एवाज्ञानं निवर्त्तयति, यथारज्ज्वादौ, अतो न केनापि कदाचित्संविदाश्रयमज्ञानमुच्छिद्येत् । अस्य च सदसदनिर्वचनीय- स्याज्ञानस्य स्वरूपमेव दुर्निरूपमित्युपरिष्टाद् वक्ष्यते । ज्ञान प्रागभाव रूपस्यचाज्ञानस्य ज्ञानोत्पत्ति विरोधित्वाभावेन न तन्निरसनेन तज्ज्ञानसाधनानुग्रहः अतो न केनापि प्रकारेण अहंकारेणानुभूतेर- भिव्यक्तिः । और न; संविद्, अज्ञान का आश्रय हो सकता है, क्योंकि— अज्ञान के आश्रय और विषय, ज्ञान के समान ही होते हैं। ज्ञातृता और विषय- भाव रहित, साक्षि स्वरूप शुद्ध ज्ञान में, अज्ञान का प्रवेश हो ही नहीं सकता । जैसे ज्ञानाश्रयता की संभावना से शून्य घट आदि में अज्ञान का आश्रय नहीं होता, वैसे ही ज्ञानाश्रय की संभावना से रहित अज्ञान के आश्रय में, ज्ञान की संभावना भी नहीं है। संविद् को अज्ञान का आश्रय मान भी लें, पर संवित् को ही जब आत्मा मान चुके हो, इस लिए संवित् कभी ज्ञान का विषय ( ज्ञेय ) तो हो नहीं पावेगा, जिसके फलस्वरूप, संवित् के आश्रित अज्ञान की निवृत्ति का होना कठिन हो जायगा ( क्योंकि—ज्ञेय वस्तु ही, स्वाश्रित भ्रांति रूप अज्ञान की निवारक होती है ) ज्ञान ही स्वविषयक अज्ञान की निवृत्ति करता है, जैसे कि— रज्जु में हुई सर्प की भ्रांति की निवृत्ति स्वतः ज्ञान से ही होती है। इस प्रकार अज्ञान को ज्ञानाश्रित मान लेने पर, कभी भी, किसी उपाय से ज्ञानाश्रित उस अज्ञान की निवृत्ति न हो सकेगी। सद् असद् अनिर्वच- ankurnagpal108@gmail.com

( ५६ )

नीय अज्ञान के स्वरूप का निरूपण दुर्बोध है, इसे आगे बतलावेंगे। ज्ञान के प्रागभाव रूप अज्ञान को ज्ञानोत्पत्ति का प्रतिबंधक नही कह सकते, इसलिए अज्ञान द्वारा ज्ञान का निराकरण भी साध्य नही है। इसलिए किसी भी प्रकार अहंकार को, अनुभूति का अभिव्यंजक नही कह सकते। न च स्वाश्रयतयाभिव्यंग्याभिव्यंजनमभिव्यंजकानां स्वभावः, प्रदीपादिष्वदर्शनात्। यथावस्थितपदार्थ प्रतीत्यनुगुणस्वाभाव्याच्च ज्ञानतत्साधनयोरनुग्राहकस्य च। तच्च स्वतः प्रामाण्य न्यायसिद्धम्। यह भी नही कह सकते कि—अभिव्यंजक पदार्थों का यह स्वा- भाविक गुण है कि, वे, स्वाश्रित अभिव्यंग्य वस्तु की ही अभिव्यक्ति करते है। प्रदीपादि मे तो ऐसा गुण देखा नही जाता। ज्ञान और ज्ञान की साधक अनुकूल वस्तुओ का तो ऐसा स्वाभाविक गुण होता है कि, वह, यथार्थवस्तु की प्रतीति मे सहायक होती है। यह, स्वतः प्रामाण्य की, न्यायसिद्धबात है। न च दर्पणादि मुखादेरभिव्यंजकः, अपितु चाक्षुषतेजः प्रति फलं न रूपदोष हेतुः, तद्दोषकृतश्च तत्रान्यथावभासः। अभिव्यंजकस्तु आलोकादिरेव। और न दर्पण आदि, मुख आदि के अभिव्यंजक है, अपितु चाक्षुष तेज ही उस अभिव्यक्ति का कारण है, यदि नेत्र की ज्योति मे किसी प्रकार की विकृति होती है, तो विपरीत अवभास होता है। मुखादि के अभिव्यंजक तो आलोक आदि ही है। न चेह तथाऽहंकारेण संविदि स्वप्रकाशायां तादृशदोषोपपादनं संभवति। व्यक्तेस्तु जातिराकार इति तदाश्रयतया प्रतीतिः, नतु व्यक्ति व्यंग्यत्वात्। अतोऽन्त.करणभूताहंकारस्थतया स वि दुपलब्धेर्व- स्तुतो दोषतो वा न किंचिदिह कारणमिति, नाहंकारस्य ज्ञातृत्वं तथोपलब्धिर्वा। तस्मात्स्वत एव ज्ञातृतया सिद्ध्यन्नहमर्थ एव प्रत्य- गात्मा, न ज्ञप्तिमात्रम्। अहम्भावविनिगमे तु ज्ञप्तेरपि न प्रत्यक्त्व- सिद्धिः इत्युक्तम्।

( ६० ) स्वयं प्रकाश संविद् मे, अहंकार के द्वारा उस प्रकार के दोष का उपपादन संभव नही है। जाति या आकार व्यक्तिगत वस्तु है, जिससे उसकी तदाश्रित प्रतीति होती है, व्यक्ति द्वारा उसकी अभिव्यक्ति नही होती। इसी प्रकार अन्तःकरण भूत अहंकार मे स्थित होने से संवित् की उपलब्धि, वस्तुगत या दोष हेतुक नही है, क्योकि—अहंकार में स्वयं ही ज्ञातृता और उस प्रकार की उपलब्धि का अभाव है। इसलिए स्वयं ज्ञातृरूप से प्रसिद्ध "अहं" पदवाच्य ही जीवात्मा है, "अहं" का अर्थ केवल ज्ञप्ति नही है। अहं भाव के अभाव मे तो ज्ञप्ति की भी जीवात्मता सिद्ध नही हो सकती। तमोगुणाभिभवात् परागर्थानुभवाभावाच्चाहमर्थस्य विविक्त स्फुट प्रतिभासाभावेऽप्याप्रबोधादहमित्येकाकारेणात्मनः स्फुरणात् सुषुप्तावपि नाहम्भावविगमः। भवदभिमता या अनुभूतेरपि तथैव प्रथेति वक्तव्यम् । सुषुप्ति अवस्था मे तमोगुण से अभिभूत होने तथा किसी भी बाह्य पदार्थ की प्रतीत न होने से, अहम्भाव की सुस्पष्ट प्रतीति नही होती यह दूसरी बात है, पर अहं का एकदम लोप ही हो जाता हो, ऐसा नही है, जागरण होने तक अह आकार वाली आत्मस्फूर्त्ति रहती है। तुम्हे भी स्वाभिमत ( आत्मारूप से स्वीकृत ) अनुभूति के ऐसे स्फुरण को स्वीकारना होगा। न हि सुप्तोत्थितः काश्चिदहंभाववियुक्ताथर्न्तरप्रत्यनीकाकारा ज्ञप्तिरहमज्ञानसाक्षितयाऽवतिष्ठत इत्येवंविधां स्वापसमकालानुभूतिं परामृशति। एवं हि सुप्तोत्थितस्य परामर्शः सुखमहमस्वाप्समिति अनेन प्रत्यवमर्शेन तदानीमप्यहमर्थस्यैवात्मनः सुखित्वं ज्ञातृत्वं च ज्ञायते। कोई भी व्यक्ति सोकर उठने पर ऐसा नहीं सोचता कि—"अहं- भाव या अन्य पदार्थों के सम्बन्ध से रहित हूं" अर्थात् ज्ञातृ ज्ञेय आदि विशेष भावों से रहित, ज्ञान स्वरूप वाला मैं, अज्ञान के साक्षी रूप से

( ६१ )

सो रहा था । अपितु सोकर उठा हुआ व्यक्ति, यही कहता है कि—"मैं बडे सुख से सोया ।" जागने वाले व्यक्ति की इस प्रतीति के आधार पर निश्चित होता है कि—निद्राकाल में भी अहं पदवाची आत्मा की सुख प्रतीति और ज्ञातृता विद्यमान रहती है । न च वाच्यम्, यथेदानीं सुखंभवति, तथा तदानीमस्वाप्स- मित्येष!प्रतिपत्तिरिति, अतद्रूपत्वात्प्रतिपत्तेः । न चाहमर्थस्यात्मनो- ऽस्थिरत्वेन तदानीमहमर्थस्य सुखित्वानुसंधानानुपपत्तिः, यतः सुषुप्तिदशायां प्रागनुभूतंवस्तु सुप्तोत्थितो—"मयेदंकृतं मयेदमनुभूतम- हमेतदवोचम्" इति परामृशति "एतावंतंकालं न किंचिदहमज्ञा- सिषम्" इति च परामृशतीति चेत्; ततः किम् ? न किंचिदिति- कृत्स्न प्रतिषेध इति चेत् न, नाहमवेदिषमितिवेदितुरहमर्थस्यैवानुवृत्तेः वेद्यविषयो हि स प्रतिषेधः । न किंचिदिति निषेधस्य कृत्स्न विषयत्वे भवदभिमतानुभूतिरपि प्रतिषिद्धास्यात् । सुसुप्तिसमयेत्वनुसंधीय मानमहमर्थमात्मानं ज्ञातारमहमिति परामृश्य न किंचिदवेदिषमिति वेदने तस्य प्रतिषिध्यमाने तस्मिन काले निषिध्यमानाया वित्तोः सिद्धिमनुवर्त्तमानस्य ज्ञातुरहमर्थस्य चासिद्धिमनेनैव "न किंचिद- हमवेदिषम्" इति परामर्शेन साधयंस्तमिममर्थ देवानामेव साधयतु । यह नहीं कह सकते कि—जागरित अवस्था में जैसा सुख होता है, वैसा निद्रा अवस्था में भी हुआ होगा, ऐसी अनुभूति मात्र होती है ( स्मृति नहीं ) सो यह प्रतीति का स्वरूप नहीं है, ( स्मृति का ही है ) और न यही कह सकते हैं कि--अहं पदार्थ आत्मा ही जब क्षणभगुर है, तब जागने के बाद उसे सुख की स्मृति हो ही कैसे सकती है ? सो सोकर उठा हुआ व्यक्ति सोने के पूर्व जिन वस्तुओं की अनुभूति किये रहता है, उन्हें ही "मैंने ही अमुक कार्य किया था--मैंने ऐसा अनुभव किया था— मैंने ही अमुक बात कही थी" विचार करता है । यदि कहो कि-"मैंने अब तक कुछ भी नहीं जाना" ऐसा परामर्श भी तो करता है तो क्या इस परामर्श से उक्त परामर्श की बात कट जायगी ? यदि कहो कि "मैंने अब ankurnagpal108@gmail.com

( १२ ) तक कुछ भी नहीं जाना'' इस परामर्श का तात्पर्य "कुछ नही जानता" ऐसा निषेधात्मक है, सो बात नहीं है, अपितु उक्त परामर्श करने वाला ज्ञाता, अहं पदार्थ की ही अनुवृत्ति है, इसलिए उक्त परामर्श केवल ज्ञेय विषयक ही है, सर्वविषयक नहीं । सर्वविषयक मानने से तो तुम्हारी अभिमत अनुभूति का ही प्रतिषेध हो जायगा । अर्थात् सुषुप्ति के समय ज्ञाता आत्मा को अहं पद वाची मानकर "मैने कुछ नही जाना" इस परामर्श से यदि उसी अह पदार्थ का प्रतिषेध स्वीकारोगे तो तुम्हारे स्वाभिमत निराकृत ज्ञान के अनुगत अनुभूति स्वरूप आत्मा का भी प्रतिषेध हो जायगा आपका उक्त कथन तो ( मिट्टी के ) देवताओ के समक्ष ही शोभित हो सकता है ( जो कि—उत्तर नही दे सकते) मामप्यहं न ज्ञातवानित्यहमर्थस्यापि तदानीमननुसंधानं प्रतीयत इति चेत्, स्वानुभवस्ववचनयोर्विरोधमपि न जानंति भवन्तः । अहं मा न ज्ञातवानितिहि अनुभववचने । मामिति किं निषिध्यत इति चेत्, साधुपृष्टं भवता । तदुच्यते-अहमर्थस्य ज्ञातुरनुवृत्तेर्न स्वरूपं निषिध्यते, अपि तु प्रबोध समयेऽनुसंधीयमानस्य अहमर्थस्य वर्णा- श्रमादि विशिष्टता । अहं मां न ज्ञातवानित्युक्ते विषयोविवेचनीयः । जागरितावस्थानुसंहितजात्यादिविशिष्टो अस्मदर्थो मामित्यंशस्य विषयः । स्वाप्यावस्थाप्रसिद्धाविशदस्वानुभवैकतानश्चाहमर्थोऽ- हमित्यंशस्य विषयः । अत्र सुप्तोऽहं ईदृशोऽहमिति च मामपि न ज्ञातवानहमित्येव खल्वनुभवप्रकारः । यदि कहो कि—सुषुप्ति के समय "अपने को भी मै नही जान सका" इस कथन मे तो अह पदार्थ आत्मा की प्रतीति का अभाव भी प्रतीति होता है ? ( उत्तर ) वाह ! आप अपने अनुभव और उक्ति के विरोध को भी नही समझते, "मै अपने को भी न जान सका" इस कथन में अनुभव और उसकी अभिव्यंजक उक्ति ही है ( अर्थात् यदि अहं पदार्थ आत्मा न होता तो "न जान सका" ऐसी अनुभूति की बात कैसे कहता ) यदि कहो कि—फिर "माम्" से किसका निषेध किया गया है ? (उत्तर) यह तो आपने अच्छा प्रश्न किया ? सुनिये—सुषुप्ति दशा में अहं पद

( ६३ )

वाच्य ज्ञाता की अनुवृत्ति रहती है, इसलिए उसके स्वरूप का निषेध नहीं हो सकता, अपितु जागरित दशा में वर्णाश्रम आदि विशेष धर्मों की जो प्रतीति होती है, सुषुप्ति में उन्हीं का अभाव हो जाता है। "मैं स्वयं को न जान सका" इस उक्ति का विषय विवेचनीय है। जागरितावस्था में अनुभूत जाति वर्णाश्रम आदि धर्म युक्त अहं पदवाच्य आत्मा ही "माम्" अंश का विषय है, तथा निद्रावस्था में प्रसिद्ध अस्फुट अनुभवमात्रगम्य "अहं" पदार्थ ही "अहं" अंश का विषय है। इसलिए उक्त उक्ति में "मैं सोया", मैं ऐसा हूँ, "मुझे भी भान न हुआ" इतने प्रकार के अनुभव निहित है। किंच सुषुप्तावात्माऽज्ञानसाक्षित्वेनास्त इति हि भवदीया प्रक्रिया। साक्षित्वंच साक्षाज्ज्ञातृत्वमेव। न हि अजानतः साक्षित्वम्। ज्ञातैव हि लोकवेदयोः साक्षीति व्यपदिश्यते, न ज्ञानमात्रम्। स्मरति च भगवान् पाणिनिः "साक्षाद्द्रष्टरि संज्ञायाम्" इति साक्षा- ज्ज्ञातर्येव साक्षिशब्दम्। स चायं साक्षी जानामीति प्रतीयमानोऽस्मदर्थ एवेति कुतस्तानीमहमर्थो न प्रतीयेत। आत्मने स्वयमवभासमानो ऽहमित्येवावभासत इति स्वाप्याद्यवस्थास्वप्यात्मा प्रकाशमानो ऽहमित्येवावभासत इति सिद्धम्। आत्मा सुप्तावस्था में अज्ञान के साक्षी के रूप में रहता है ऐसा आपको अभिमत है। साक्षात् ज्ञातृत्व ही साक्षित्व है, अज्ञातवस्तु का साक्षित्व संभव नहीं है। ज्ञातवस्तु को ही लोक और वेद में साक्षी कहा जाता है, केवल ज्ञान को साक्षी नहीं कहते। जैसा कि भगवान पाणिनि "साक्षाद् दृष्टरि संज्ञायाम्" सूत्र में साक्षात् दृष्टा की साक्षी का ही निर्देश करते हैं। "मैं जानता हूँ" ऐसी प्रतीति रूप साक्षी अस्मत् पदार्थ (आत्मा) के अतिरिक्त किसी और की नहीं है, इसलिए सुप्तावस्था में "अहं" अर्थ की प्रतीति क्यों न होगी ? स्वयं प्रकाशमान आत्मा "अहं" रूप में ही अवभासित होता है, सुषुप्ति आदि अवस्थाओं में, सोने वाला आत्मा, प्रकाशमान "अहं" के रूप में ही अवभासित होता है। यत्तु मोक्षदशायां अहमर्थो नानुवर्त्तते इति, तदपेशलम्। तथा सत्यात्मनाशएवापवर्गः प्रकारान्तरेण प्रतिज्ञातः स्यात्। न च ankurnagpal108@gmail.com

( ६४ ) अहमर्थो धर्ममात्रम्, येन तद्विगमेप्यविद्यानिवृत्ताविव स्वरूप- मवतिष्ठेत । प्रत्युत स्वरूपमेवाहमर्थ आत्मनः ज्ञानं तु तस्य धर्मः, “अहं जानामि, ज्ञानं मे जातम्” इति चाहमर्थधर्मतया ज्ञान- प्रतीतिरेव । मोक्षदशा में अहं अर्थ की अनुवृत्ति नहीं होती; यह भी रुखाई की बात है। ऐसा कहना तो प्रकारान्तर से आत्मविनाश को ही मोक्ष मानना है। अहं अर्थ केवल धर्म ही नहीं है जो, अविद्या की तरह, अहंभाव के अपगम हो जाने पर भी, आत्मा के शुद्ध स्वरूप में स्थित रहा आवे; अपितु अहं पदार्थ आत्मा का ही स्वरूप है, ज्ञान ही उसका धर्म है। “मैं जानता हूँ” मुझे ज्ञान हो गया” इत्यादि प्रतीतियाँ, अहं अर्थ आत्मा के धर्म स्वरूप ज्ञान की ही हैं। अपि च यः परमार्थतो भ्रान्त्या वाऽध्यात्मिकादि दुःखैर्दुःखितया स्वात्मानमनुसंधत्ते “अहं दुःखी” इति। सर्वमेतद् दुःखजातमपुनर्भव- मपोह्य “कथमहमनाकुलः स्वस्थो भवेयम्” इति उत्पन्नमोक्षरागः स एव तत्साधने प्रवर्त्तते । स साधनानुष्ठानेन “यदि अहमेव न भवि- ष्यामि” इत्यवगच्छेत्, अपसर्पेदेवासौ मोक्षकथा प्रस्तावात् । ततश्चा- धिकारिविरहादेव सर्वं मोक्षशास्त्रमप्रमाणंस्यात् । तदहमुपलक्षितं प्रकाशमात्रमपवर्गेऽवतिष्ठत इति चेत्; किमनेन ? मयिनष्टेऽपि किमपि प्रकाशमात्रमपवर्गेऽवतिष्ठत इतिमत्वा न हि कश्चित् बुद्धिपूर्वककारी प्रयतते । अतोऽहमर्थस्यैव ज्ञातृतया सिध्यतः प्रत्यगात्मत्वम् । स च प्रत्यगात्मा मुक्तावप्यहमित्येव प्रकाशते स्वस्मै प्रकाशमानत्वात्, यो यः स्वस्मै प्रकाशते स सर्वोऽहमित्येव प्रकाशते, यथा तथावभासमानत्वेनोभयवादि सम्मत सं सार्यात्मा । यः पुनरहमिति न चकास्ति, नासौ स्वस्मै प्रकाशते, यथा घटादिः । स्वस्मै प्रकाशते चायं मुक्तात्मा, तस्मादहमित्येव प्रकाशते । ankurnagpal108@gmail.com

( ४५ ) यथार्थ में या भ्रान्तिवश जो लोग आध्यात्मिक आदि दुःखों से कातर होकर “मैं दुःखी हूँ” ऐसा अनुभव करते हैं, वे लोग पुनः ये दुःख प्राप्त न हों, कैसे इन दुःखों का नाश कर सकूँ, ऐसा विचार कर मुक्त होने के लिए, मोक्ष प्राप्ति के साधनों में संलग्न होते हैं। उन साधना- नुष्ठानों से यदि उन्हें यह प्रतीति होने लगे कि “मैं ही समाप्त हो जाऊँगा” तो वे लोग ऐसे मोक्ष की बात को सुनकर ही भाग खड़े होंगे इस तरह कोई मोक्ष का अधिकारी दृष्टिगत ही न होगा, सारे मोक्ष के उपदेशक शास्त्र जहाँ के तहाँ रखे रह जावेंगे। यदि कहो कि—मोक्षदशा में ( अहं के नष्ट हो जाने पर भी ) अहंकारोपलक्षित आत्म प्रकाश विद्यमान रहता है। तो इससे क्या होता है ? मैं नष्ट होकर केवल प्रकाशमान रह जाऊँगा, ऐसा जानकर भी कोई बुद्धिमान मोक्ष मार्ग की ओर उन्मुख नहीं हो सकता। इसलिए मानना होगा कि—ज्ञाता रूप से प्रसिद्ध अहं पदार्थ, जीवात्मा ही है। जो कि मुक्ति दशा में भी “अहं” रूप से प्रकाशित रहता है, क्योंकि वह स्वयं प्रकाश है, जो जो वस्तुएं स्वयं प्रकाश होती हैं वे सब अहं से ही प्रकाशित होती हैं, जैसे कि संसारी आत्मा “अहं” आकार में ही अवभासित होता है, यह बात तो हम आप दोनों को ही स्वीकार्य है। जो अहं रूप से प्रकाशित नहीं होते, वे स्वप्रकाश नहीं हैं, जैसे कि घट आदि जड़ पदार्थ। मुक्तात्मा स्वप्रकाश है, इसका प्रकाश अहं रूप में ही प्रकाशित रहता है। न चाहमिति प्रकाशमानत्वेन तस्याज्ञत्व संसारित्वादि प्रसङ्गः। मोक्षविरोधात् अज्ञत्वाद्यहेतुत्वाच्चाहंप्रत्ययस्य । अज्ञानंनाम स्वरूपाज्ञानमन्यथाज्ञानं विपरीत ज्ञानं वा । अह्मित्येवात्मनः स्वरूप- मिति स्वरूप ज्ञानरूपोऽहंप्रत्ययो नाज्ञत्वमापादयति, कुतः संसारित्वं, अपितु तद् विरोधित्वात् नाशयत्येव । अहंरूप से प्रकाशमान रहने से ( मुक्तात्मा में ) संसारी आत्माओं की सी अज्ञता हो सकती है, ऐसा संशय भी नही कर सकते। मोक्षदशा स्वयं ही अज्ञता की विरोधी स्थिति है ( जब तक अज्ञता है तब तक मोक्ष ankurnagpal108@gmail.com

( ६६ ) नहीं हो सकता, मोक्ष की स्थिति में अज्ञता संभव नहीं है ) तथा अहं प्रत्यय अज्ञता का हेतु भी नहीं है। स्वरूप का अज्ञान, अन्यथा या विपरीत ज्ञान ही अज्ञान है। अहं प्रत्यय आत्मा का ही स्वरूप है ऐसा स्वरूप- ज्ञान रूपी अहं प्रत्यय, अज्ञानता को प्राप्त नहीं हो सकता, उसमें संसारी- पन कैसे संभव है, अपितु उसका विरोधी होने से वह सांसारिकता का नाश ही करता है। ब्रह्मात्मभावापरोक्ष्यनिर्धूतनिरवशेषाविद्यानामपि वामदेवादि नामहमित्येवात्मानुभवदर्शनाच्च। श्रूयते हि—"तद्वैतत्पश्यन् ऋषि- र्वामदेवः प्रतिपेदे अहं मनुरभवं सूर्यश्च" इति "अहमेकः प्रथममासं वर्त्तामि च भविष्यामि च" इत्यादि। सकलेतराज्ञानविरोधिनः सच्छब्दप्रत्ययमात्रभाजः परस्य ब्रह्मणो व्यवहारोऽप्यमेव—"हन्ताहमि- मास्तिस्रो देवताः—"बहुस्यां प्रजायेय"—स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति"; तथा "यस्मात्क्षरमतीतोऽमक्षरादपि चोत्तमः, अतोऽस्मि लोक वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः"—अहमात्मा गुडाकेश—"नत्वेवाहं जातुनासम्"—अहंकृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा "अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्त्तते"—"तेषामहं समुद्धर्त्ता मृत्यु संसार सागरात्"—"अहंबीजप्रदः पिता"—"वेदाहंसमतीतानि" इत्यादिषु । ब्रह्मात्मभाव की प्राप्ति से जिनकी अविद्या निर्मूल हो चुकी थी, ऐसे वामदेव आदि का भी "अहंकार" युक्त अनुभव पाया गया। श्रुति में कहा है कि—"उन वामदेव ऋषि ने तत्त्व दर्शन करके विचार किया कि, मैं ही मनु और सूर्य हुआ था "तथा" मैं ही पहिले था, इस समय हूँ और भविष्य में भी रहूँगा" इत्यादि। अन्यान्य सभी अज्ञानों के विरोधी "सत्" शब्द प्रत्यय से ही ज्ञात परब्रह्म के लिए भी ऐसा ही व्यवहार किया गया है—जैसे—"मैं ही इन तीनों देवताओ का रूप लूं—मैं बहुत होकर जन्म लें—"उसने सोचा ankurnagpal108@gmail.com

( ६७ ) कि—मैं लोकों का सर्जन करूँ”—“क्षर से अतीत और अक्षर स उत्तम होने से ही मैं लोक और वेद में पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ”—“गुडाकेश ! मैं ही आत्मा हूँ”—ऐसा नहीं है कि—मैं कभी नही था”—“मैं ही समस्त जगत का प्रभव और प्रलय स्थान हूँ”—“मैं ही सबका प्रभव हूँ मुझसे सबका प्रवर्त्तन होता है”—“मैं ही सबको मृत्यु रूपी संसार सागर से पार करने वाला हूँ”—“मैं ही बीज प्रदान करने वाला पिता हूँ”—मैं सभी प्रतीतों का ज्ञाता हूँ” इत्यादि । यद्यहमित्येवात्मनःस्वरूपम्, कथंतर्हि अहंकारस्य क्षेत्रान्त- र्भावो भगवतोपदिश्यते—“महाभूतान्यहंकारोबुद्धिरव्यक्तमेव च” इति । (संशय)—यदि अहं ही आत्मा का स्वरूप है, तो भगवान ने अहंकार का क्षेत्रान्तर भाव क्यों बतलाया ?“—महाभूत, अहंकार, बुद्धि और मन” इत्यादि । उच्यते—स्वरूपोपदेशेषुसर्वेष्वहमित्येवोपदेशात् तथैवात्म स्वरूपपतिपत्तेश्च अह्रदित्येव प्रत्यगात्मनः स्वरूपम् । अव्यक्त परिणामभेदस्याहंकारस्य क्षेत्रान्तरभावो भगवतैवोपदि‍श्यते । स तु नात्मनि देहेऽहंभावकरण हेतुत्वेन अहंकार इत्युच्यते । अस्यतु अहंकार शब्दस्य अभूततद्भावेऽर्थेच्चिवप्रत्ययमुत्पाद्य व्युत्पत्तिर्द्रष्टव्या । अयमेव तु अहंकारः, उत्कृष्टजनावमानहेतुर्गर्वापरनामा शास्त्रेषु बहुशो हेयतया प्रतिपाद्यते । ( समाधान ) —जहाँ जहाँ भी आत्मा के स्वरूप का उपदेश है, वहाँ सभी जगह, अहं रूप से ही आत्मा का निर्देश किया गया है, उसी प्रकार जीवात्मा के स्वरूप के विश्लेषण में जीवात्मा का भी “अहं” स्वरूप बतलाया गया है । अव्यक्त ( प्रकृति ) के परिणाम विशेष अहंकार का क्षेत्रान्तर भाव भगवान ने ही बतलाया है । अनात्म देह में अहम्भाव ankurnagpal108@gmail.com

( ६८ ) का उत्पादक होने से उसे अहङ्कार कहते हैं, अहंकार शब्द, अभूततद्भाव अर्थ मे “च्वि” प्रत्यय के सयोग से निष्पन्न बतलाया गया है। यह अहंकार ही श्रेष्ठ मनुष्यों के अपमान का हेतु, शास्त्रों में प्रायः गर्व के नाम से हेय रूप से दिखलाया गया है, तस्मात् बाधकापेताऽहंबुद्धिः साक्षात् आत्मगोचरैव । शरीर- गोचरा तु अहं बुद्धिः अविद्यैव । यथोक्तं भगवता पराशरेण— “श्रूयतां चाप्यविद्यान्या; स्वरूपं कुलनन्दन ! अनात्मन्यात्मबुद्धिर्या” —इति । यदि ज्ञप्तिमात्रमेवात्मा तदाऽनात्मन्यात्माभिमाने शरीरे ज्ञप्तिमात्र प्रतिभासः स्यात् न ज्ञातृत्व प्रतिभासः । तस्मात् ज्ञाताऽ- हमर्थ एवात्मा—यदुक्तम्—“अतः प्रत्यक्ष सिद्धत्वादुक्त न्यायागमा- न्वयात्, अविद्यायोगतश्चात्मा ज्ञाताऽहमितिभासते ।”--“देहेन्द्रि- यमन. प्राणधीभ्योऽनन्य साधन. नित्यो व्यापी प्रतिक्षेत्रमात्मा भिन्न- स्त्वतस्सुखी ।” इति अनन्यसाधन. स्वप्रकाशः । व्यापी अति सूक्ष्मतया सर्वाचेतनांत. प्रवेशन स्वभावः । किसी भी समय जिसकी बाधा न हो सके ऐसी अहं बुद्धि निश्चित ही साक्षात् सबंध से आत्म विषयक है, तथा शरीर विषयक अह बुद्धि अविद्या है। जैसा कि भगवान पराशर ने कहा है—“अनात्म मे जो आत्म बुद्धि होती है, उस अविद्या के स्वरूप को सुनो ।” यदि आत्मा ज्ञप्ति मात्र ही है तो, अनात्म शरीर मे आत्माभिमान के समय केवल ज्ञप्ति की ही प्रतीति होनी चाहिए, ज्ञातृता की प्रतीति नही होनी चाहिए, सो तो होती नही, इससे निश्चय होता है कि—“अहं” पदवाच्य ही ज्ञाता आत्मा है। जैसा कि कहते भी है—“प्रत्यक्ष, न्याय ( युक्ति ) और शास्त्र प्रमाण के अनुसार तथा अविद्यावश, ज्ञाता आत्मा, अहं रूप में ही भासित होता है”—“देह, इन्द्रिय, मन, प्राण और बुद्धि से पृथक् अनन्य साधन, नित्य और व्यापी आत्मा प्रतिदेह मे भिन्न, स्वभाव से सुखी है ।” यहाँ अनन्य साधन शब्द स्वप्रकाश अर्थ का बोधक है। अतिसूक्ष्म रूप से समस्त जड़ पदार्थों मे जो अनुस्यूत है उसे व्यापी कहते है । ankurnagpal108@gmail.com

( ६६ ) यदुक्तम्-“दोषमूलत्वेनान्यथासिद्धिंसंभावनाया, सकलभेदावलं बिप्रत्यक्षस्य शास्त्रबाध्यत्वम्” इति। कोऽयं दोषवक्तव्यम्, यन्मूल- तया प्रत्यक्षस्यान्यथासिद्धिः ? अनादिभेदवासनैव हि दोष इति चेत्; भेदवासनाया. तिमिरादिवत् यथावस्थितवस्तु विपरीतज्ञानहेतुत्वं किमन्यत्र ज्ञातपूर्वम् ? अनेनैवशास्त्र विरोधेन ज्ञास्यत इतिचेत्; न अन्योन्याश्रयणात्, शास्त्रस्यनिरस्तनिखिलविशेषवस्तुबोधित्व निश्चये सति भेदवासनाया. दोषत्वनिश्चय, भेदवासनायां दोष- त्व निश्चिते सति शास्त्रस्यनिरस्तनिखिलविशेषवस्तुबोधित्व निश्चय इति । किंच यदि भेदवासनामूलत्वेन प्रत्यक्षस्य विपरीता- र्थत्वं शास्त्रमपि तन्मूलत्वेन तथैव स्यात् । जो यह कहा कि-“दोषमूलक, भ्रम, आशंकापूर्ण, भेदावलंबी समस्त प्रत्यक्ष, शास्त्रबाध्य हैं” तो बतलाइये कि वे दोष कौन से हैं जिनसे प्रत्यक्ष की भ्रातता संभावित होती है ? यदि कहें कि, अनादिभेदवासना ही वह दोष है; ऐसा मानने से तो, नेत्रों के तिमिर आदि दोषों की तरह, भेदवासना भी, प्रकृति वस्तु से विपरीत भान कराने वाली हो जायगी । आपने ऐसी वासना कहीं देखी भी है क्या ? यदि कहो कि-शास्त्र विरोध से ही ऐसी वासना का ज्ञान होता है; सो बात नहीं है, क्योंकि शास्त्र का उससे अन्योन्याश्रय संबंध है । शास्त्र, समस्त विशेषताओं से रहित वस्तु के प्रतिपादक हैं', ऐसा निश्चित होने से भेदवासना दोषपूर्ण निश्चित हो जाती है, तथा भेदवासना की दोषपूर्णता निश्चित होने से, शास्त्र की समस्त विशेषताओं से रहित, वस्तु प्रतिपादकता निश्चित हो जाती है । यदि भेदवासनामूलक होने से ही प्रत्यक्ष की विपरीतार्थता होती है तब तो शास्त्र भी, तन्मूलक होने से वैसे ही सिद्ध हो जावेंगे । अथोच्येत-दोषमूलत्वेऽपि शास्त्रस्य प्रत्यक्षावगत सकलभेद- निरसनज्ञान हेतुत्वेन परत्वात्तत्प्रत्यक्षस्य बाधकम् इति । तन्न दोषमूलत्वेज्ञाते सति परत्वमकिंचित्करम् । रज्जुसर्पज्ञाननिमित्त भयेसति भ्रांतोऽयमिति परिज्ञातेन केनचित् “नायं सर्पो मा भैषीः”

( १०० ) इत्युक्तेऽपि भयानिवृत्तिदर्शनात् । शास्त्रस्य च दोषमूलत्वं श्रवणवे- लायामेव ज्ञातम् । श्रवणावगतनिखिलभेदोपमर्दिब्रह्मात्मकत्व- विज्ञानाभ्यासरूपत्वात् मननादेः । जो यह कहो कि—शास्त्र दोषमूलक होते हुए भी, प्रत्यक्ष दृष्ट समस्त भेदों का निवारक ज्ञान उत्पन्न करते हैं; सो तो हो नहीं सकता, क्योंकि दोषमूलकता के निश्चित हो जाने पर उसका परत्व बल अकिंचित्कर हो जाता है । जैसे कि—रज्जु में सर्प की भ्रांति होने पर, किसी के द्वारा कहा जाय कि "यह सर्प नहीं है मत डरो" इतना कहने पर भी भय दूर नहीं होता । शास्त्र की दोषमूलकता तो श्रवण के समय ही ज्ञात होती है । शास्त्र श्रवण के बाद संपूर्ण भेदों के उन्मूलक ब्रह्मात्मकत्व ज्ञान के पुनः पुनः अनुशीलन रूप मनन आदि की व्यवस्था ही उक्त बात की पुष्टि करती है । अपि च इदं शास्त्रम्, एतच्चासंभाव्यमानदोषम्; प्रत्यक्षंतु संभाव्यमान दोषमिति केनावगतं त्वया ? नतावत् स्वतःसिद्धा निर्धूतनिखिलविशेषानुभूतिरिममर्थमवगमयति, तस्याः सर्वविषय विरक्तत्वात् शास्त्रपक्षपात विरहाच्च । नाप्यैन्द्रियिकंप्रत्यक्षं, दोष मूलत्वेन विपरीतार्थत्वात् । तन्मूलत्वादेव नान्यान्यपि प्रमाणानि । अतः स्वपक्ष साधन प्रमाणानभ्युपगमात् न स्वाभिमतार्थ सिद्धिः ये शास्त्र, दोषों की संभावना से रहित हैं तथा प्रत्यक्ष प्रमाण में दोष संभाव्य है; यह बात तुम्हें कहाँ से ज्ञात हुई ? स्वयं सिद्ध निर्विशेष अनु- भूति तो उक्त अर्थ बतला नहीं सकती, क्योंकि वह समस्तविषयों से विरक्त है, तथा उसे शास्त्र का कोई पक्षपात भी नहीं है । किसी इन्द्रिय से उक्त बात जानी हो ऐसा भी संभव नहीं है, क्योंकि जब प्रत्यक्ष ज्ञान दोषमूलक ही है, उसकी तो विपरीत ही प्रतीति होगी । अनुमान आदि अन्यान्य प्रमाण सब प्रत्यक्ष सापेक्ष ही होते हैं, अतः उनसे भी जानना कठिन है । तुम्हें अपने उक्त मत के साधन में कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है, इसलिए तुम्हारे अभिमत की सिद्धि नही हो सकती ।

ननु व्यावहारिक प्रमाणप्रमेयव्यवहारो अस्माकमपि अस्ति एव; कोऽयं व्यावहारिक नाम ? आपात् प्रतीतिसिद्धो युक्तिभिर्निरु- पितो न तथावस्थित इति चेत्; किंतेन प्रयोजनं ? प्रमाणतया प्रतिपन्नेऽपि यौक्तिकबाधादेव प्रमाणकार्याभावात् । अथोच्येत- शास्त्र-प्रत्यक्षयोः द्वयोरप्यविद्यामूलत्वेऽपि प्रत्यक्षविषयस्य शास्त्रेण बाधोदृश्यते; शास्त्रविषयस्य सद्वितीयब्रह्मणः पश्चात्तनबाधा- दर्शनेन निर्विशेषानुभूतिमानं ब्रह्मैव परमार्थः इति । तदयुक्तम् अवा- धितस्यापि दोषमूलस्यापारमार्थ्यनिश्चयात् । आपके मत में व्यावहारिक प्रमाण प्रमेयभाव तो स्वीकृत ही है, तो आप का वह व्यावहारिक स्वरूप क्या है ? यदि कहें कि—हर प्रकार से प्रतीतिसिद्ध, युक्तियों से जो भलीभाँति निरूपित न हो सके । वाह ! ऐसी वस्तु का प्रयोजन ही क्या है ? जो वस्तु प्रमाण से सिद्ध हो जाय, फिर भी युक्तियों से सिद्ध न हो सके, वस्तुतः वो प्रमाणित नही मानी जायगी । यदि कहें कि—‘‘शास्त्र और प्रत्यक्ष दोनों के अविद्यामूलक होते हुए भी, प्रत्यक्ष विषय का शास्त्र से बाध दिखलाई देता है । शास्त्र विषय के प्रतिपाद्य सत् स्वरूप अद्वितीय ब्रह्म के विषय में कोई बाधा नहीं दीखती, इसलिए निर्विशेष अनुभूतिमान ब्रह्म ही परमार्थ है ऐसा निश्चित होता है । ‘‘आपका यह कथन भी असंगत है--जो दोषप्रसूत वस्तु है, वह निर्वाध होते हुए भी अपरमार्थ ही मानी जाती है । एतदुक्तं भवति—यथा सकलेतरकाचादिदोष रहित पुरुषां तरागोचरगिरिगुहासु वसतः तैमिरिकजनस्याज्ञातस्वतिमिरस्य सर्वस्य तिमिरदोषाविशेषेण द्विचन्द्रज्ञानमविशिष्टं जायते । न तत्र बाधक प्रत्ययोऽस्तीति न, तन्मिथ्या न भवतीति, तद्विषय भूतं द्विचेदत्वमपि मिथ्यैव । दोषो हि, अयथार्थज्ञानहेतुः । तथा ब्रह्मज्ञानं अविद्या मूलत्वेन बाधतज्ञानरहितमपि स्वविषयेण ब्रह्मणा सह मिथ्यैव इति । भवंति चात्र प्रयोगाः :—‘‘विवाध्यासितं ब्रह्ममिथ्या

( १०२ ) अविद्यावत् उत्पन्न ज्ञानविषयत्वात् प्रपंचवत् “ब्रह्मज्ञानविषयत्वात् प्रपंचवत्” ! ब्रह्ममिथ्या असत्यहेतुजन्य ज्ञान विषयत्वात् प्रपंचवदेव । कथन यह है कि--जैसे, समस्त नेत्र रोग विहीन, पर्वत गुहावासी कोई व्यक्ति, गुहा के घोर अंधकार में निरन्तर रहने के कारण तिमिर रोग (रतौंधी) से ग्रस्त हो जाता है; पर अपने उस रोग को नहीं जान पाता उसके लिए वह सामान्य सी बात है; उस व्यक्ति को दो चन्द्र दिखलाई देते है, उसके लिए उस जानकारी में वहाँ कोई बाधक ज्ञान भी नहीं है (क्योंकि उसे गुहा के अतिरिक्त बाहर का कुछ भी ज्ञान नहीं होता) इसलिए वह अपने द्विचन्द्र ज्ञान को मिथ्या नहीं मानता; पर उसका वह ज्ञान है तो मिथ्या ही । दोष तो तभी हो, जब कि वह अयथार्थ ज्ञान हेतुक हो । इसी प्रकार ब्रह्मज्ञान अविद्या मूलक होने से बाधक के न रहते हुए भी ब्रह्म ज्ञान सहित मिथ्या ही है । ऐसे प्रयोग भी किये जाते हैं—“ब्रह्म, मिथ्या ज्ञान का विषय होने के कारण, प्रपंचमय जगत की तरह मिथ्या है--“जो विवा दास्पद है वह ब्रह्म मिथ्या है”--“असत्य के हेतु शास्त्र ज्ञान का विषय होने के कारण, प्रपंचमय जगत की तरह, ब्रह्म मिथ्या है ।” (इत्यादि चार्वाक, जैन, बौद्ध आदि कहते हैं) । न च वाच्यं स्वाप्नस्य हस्त्यादिविज्ञानस्यासत्यस्य परमार्थ शुभाशुभप्रतिपत्ति हेतु भाववदविद्यामूलत्वेनासत्यस्यातिशास्त्रस्य परमार्थभूतब्रह्मविषयप्रतिपत्तिहेतुभावो न विरुद्धः इति । स्वप्नज्ञान स्यासत्यत्वाभावात् । तत्र हि विषयाणामेव मिथ्यात्वम् तेषामेव हि बाधोदृश्यंते, न ज्ञानस्य, न हि मया स्वप्नवेलायामनुभूत ज्ञानमपि न विद्यत इति, कस्यचिदपि प्रत्ययो जायते । दर्शनं तु विद्यते, अर्था न संतीति हि बाधक प्रत्ययः । मायाविनो मंत्रौषधादिप्रभवं मायामयं ज्ञानं सत्यमेवप्रीतिर्भयस्य च हेतुः । तत्रापि ज्ञानस्य अबाधितत्वात् विषयेन्द्रियादि दोषजन्यं रज्ज्वादौ सर्पादिविज्ञानं सत्यमेव, भयादि हेतुः । सत्येवादष्टेऽपि स्वात्मनि सर्पसन्निधानात् दष्ट बुद्धिः सत्यैव ankurnagpal108@gmail.com

( १०३ ) शंकाविषबुद्धिर्मरण हेतुभूता । वस्तुभूत एव जलादौ मुखादि प्रति- भासो वस्तुभूत मुखगत विशेष निश्चय हेतुः । एषां संवेदनानां उत्प- त्तिमत्वात् अर्थक्रियाकारित्वाच्च सत्यत्वमवसीयते । हस्त्यादी- नां अभावेऽपिकथं तद्बुद्धयः सत्याभवंतीति चेत् नैतत् बुद्धीनां सालम्बनत्वमात्र नियमात् । यह नहीं कह सकते किं—“स्वप्न में दृष्ट, हस्ति आदि ज्ञान, असत्य होते हुए भी, शुभाशुभ वास्तविक फलदायी होते हैं, उसी प्रकार अविद्या मूलक असत्य होते हुए भी, शास्त्र का ब्रह्मविषयक फल वास्तविक ही होता है । “स्वाप्न ज्ञान असत्य नहीं होता, अपितु स्वप्न में देखे गए पदार्थ ही मिथ्या होते हैं क्योंकि जागने पर वे दीखते नहीं ऐसा तो कोई नहीं कह सकता कि, स्वप्न में मुझे प्रतीति नहीं हुई । स्वप्न में दीखता तो निश्चय ही है, पर स्वप्नदृष्ट विषय नहीं होते यही बाधकता है । मायावी (जादूगर) मंत्र और औषधि के प्रभाव से जो चमत्कार दिखलाता है, वह प्रीति और भयोत्पादक होता है, वह ज्ञान भी सत्य है क्योंकि वह ज्ञान भी अबाधित होता है । विषय और इन्द्रियादि जन्य रस्सी में होने वाली सर्प प्रतीति भी भयोत्पादक होने के कारण सत्य ही है, उस रस्सी रूपी सर्प से दंशित न होते हुए भी, दंशन का भय तो होता ही है, क्योंकि- उसमें मरण के हेतु विष की शंका रहती है । जल दर्पण आदि में मुख आदि का जो प्रतिबिम्ब दीखता है, वह मुखगत वास्तविकता का निर्णा- यक होता है । इस प्रकार की प्रतीतियों में उत्पत्तिशीलता और कार्य संपादन शक्ति होने से सत्यता निश्चित होती है । यदि कहो कि-“स्वप्न दृष्ट हस्ति आदि जब रहते नहीं तो तद्विषयक बुद्धि ही कैसे सत्य हो सकती है ?” बुद्धि को तो एक अवलम्बन चाहिए, वह तो वस्तु के प्रति- भासित होने मात्र से उस पर आधारित हो जाती है । अर्थस्य प्रतिभासमानत्वमेव हि आलम्बनत्वेऽपेक्षितम्, प्रति भासमानता च अस्त्येव दोषवशात् । सतु बाधितोऽसत्य इत्यवसी- यते अबाधिता हि बुद्धिः सत्यैवेत्युक्तम् । हस्ति आदि विषय की प्रतीति होती तो है ही, क्योंकि वह आलम्बन सापेक्ष होती है, इसलिए उसकी प्रतिभासमानता होती है । जागने पर ankurnagpal108@gmail.com

( १०४ ) उस प्रतीतिगत वस्तु की असत्यता ज्ञात हो जाती है, पर उस प्रतीति बुद्धि का तो बाध होता नहीं, इसलिए उसे तो सत्य ही कहना होगा। रेखायावर्णप्रतिपत्तावपि नासत्यात्सत्यबुद्धिः, रेखायास्सत्यत्वात् ननु वर्णात्मनाप्रतिपन्नारेखा वर्णबुद्धिहेतुः, वर्णात्मतात्वसत्या । मैवम् वर्णात्मताया असत्याया उपायत्वायोगात्। असतो निरूपा- ख्यस्य हि उपायत्वं न दृष्टमनुपपन्नं च । अथतस्या वर्णबुद्धे रुपाय- त्वं एवंतर्हि असत्यात् सत्यबुद्धिर्नस्यात् बुद्धेः सत्यत्वादेव । उपायो पेययोरेकत्वप्रसंगश्च उभयोर्वर्णबुद्धित्वाविशेषात् । रेखाया अविद्य मानवर्णात्मनोपायत्त्वे चैकस्यामेव रेखायामविद्यमानसर्ववर्णात्मक त्वस्य सुलभत्वादेकरेखादर्शनात्सर्ववर्णप्रतिपत्तिस्स्यात् । रेखाओं से जो वर्ण बनते हैं उनमें भी सत्यता की ही प्रतीति होती है असत्यता से सत्य बुद्धि नहीं होती, क्योंकि रेखायें तो सत्य हैं हीं। रेखा वर्ण का स्वरूप मानकर ही रेखा में वर्णबुद्धि होती है, वस्तुतः रेखा तो वर्ण है नहीं ऐसा संशय भी नहीं करना चाहिए, क्योंकि—यदि रेखा की वर्णात्मकता को असत्य मान लेगें तो, वह वर्ण बोध की उपाय नहीं रह जायगी असत् वस्तु की निरूपण शक्ति और उपायता कहीं भी देखी नहीं जाती और न होती ही है। यदि रेखा में होने वाली वर्णबुद्धि को ही वर्ण बोध का उपाय मान लें तो, बुद्धि तो सत्य ही है, फिर असत्य से सत्य बुद्धि हो रही है, ऐसा नहीं कह सकते। साथ ही रेखा और वर्ण दोनों में ही वर्णबुद्धिता मानने से, उपाय और उपेय दोनों एक हो जावेंगे। रेखा यदि वस्तुतः वर्णात्मक न होकर केवल उपाय मात्र ही हैं तो, प्रत्येक रेखा से, सारी वर्णमाला का सरलता से ज्ञान हो जाना चाहिए, तथा एक ही रेखा को देखने से वर्णमाला की प्रतीति हो जाती चाहिए। सो तो होती नहीं। अर्थपिण्डविशेषे देवदत्तादिशब्द संकेतवत् चक्षुग्राह्यरेखा विशेषे श्रोत्रग्राह्यवर्णविशेषोसंकेतवशाद् रेखाविशेष वर्णविशेष बुद्धि हेतुरिति । हन्त तर्हि सत्यादेव सत्यप्रतिपत्तिः रेखायाः संकेत ankurnagpal108@gmail.com